Thursday, 28 December 2017

अधूरी कविताएँ

नया सा
कोई पुराना दिन
पुरानी सी एक नई धुन
ता तई तई ता धित तई तई ता
ता का धी मी

कितना कितना कितना चाहा
कि आख़िर छोड़ दिया

तुम बनो कविता अंतिम
अनंतिम।   


Monday, 27 November 2017

आकाश में तारों से बनाते एक चेहरा
दो आँखों वाला
देखकर मुस्कुराता वो हमें
अपने बनाए चेहरे को तोड़ना चाहते रहे हम उम्र भर
बग़ैर जाने कि उसका टूटना
बिखराव है

एक एक कर सब तारें टूट रहे हैं
चिंगारियों से आँखों की रोशनी कुछ हल्की हुई जा रही है
कि देखो आ जाओ
तुम आए और मैं न देख सकी
तो उसे मेरा ना देखना समझा जाएगा

चेहरा मुस्कुराता नहीं
मुस्कुराने की कोशिश में कुछ अटपटा विकृत सा हो जाता है
और हाथ बढ़ा आकाश से
मेरा गला जकड़ लेता है

ये हाथ किस चेहरे से हैं?
क्या तुम्हारे?
नहीं न?

हमारी नज़रों ने जिसे रूप आकार दिया
वह हमारे प्रति इतना क्रूर कब हुआ?
क्यारी ग़लत चुनी या बीज?
या सींच नहीं पाए ईमानदारी से?

कुछ कहो
ये तारें बोलते नहीं।

Saturday, 25 November 2017

बच्चें अपराधी नहीं होते
जो होता है
वह दरअसल कुछ नहीं
उनका परिवेश है
जिसे हम ही ने रचा

विद्या की कसमें सच्ची थी
क़िताब में रखा पँख भी
सवाल थे बहुत
आँखें आकाश में

इतना हौव्वा सहमा देगा
बचपन को
मत चौंकिए
जिस भी ईश्वर को मानते हो
उसके लिए ही सही
पर इतना मत चौंकिए

चार साल का बच्चा
तमाम बहसों के बाद भी
एक बच्चा ही रहेगा।



Tuesday, 14 November 2017

चलो अब मुस्कुराओ

सबको बताओ कि क्या चाहिए
उनसे या खुद से
ज़रा मुस्कुरा के

थोड़ा गुनगुना के शायद
या नन्ही सी गिड़गिड़ाहट मिलाकर
पर ऐसे कहो
कि न कहना बचा रहे

रुको
थोड़ा सा और सोचो
अरे इतनी जल्दी नहीं रे
ज़रा हिम्मत और

ना समझने दो
फ़र्क़ नहीं पड़ा?
पड़ना ही नहीं था
बस कहना ज़रूरी था

मौक़ा जो खुद को दिया
उनके नाम पर

तस्वीरों में तलुए थे
कैसे जानोगे
जब देखोगे ही नहीं तो

देखो
धुँधली आँखों से ही सही
पोंछों अब ये भाप
नज़र साफ़ करो

क्या दिखा
बेवकूफियाँ और नादानियाँ ही ना
यही तो बचाना तय था

चलो अब मुस्कुराओ।

Monday, 30 October 2017

हदें

कौन सी शक्ति थी 
जो हमें गिरने से पहले जी भर दौड़ने से रोकती थी
दौड़ इतनी लंबी होती कि आग खत्म हो जाती
गिरना इतना लंबा और धीमा होता कि
हवा ख़त्म हो जाती
खिड़की कोई या ईमारत होती
यूँ तमाशा ना होता जीना
और मृत्यु बीच सड़क लटके हुए
पड़ोसियों की इकट्ठा भीड़ के बीच
कुछ जाने पहचाने चेहरे देख सकती

हम हदों में रहे और जिए लोग
हदें तोड़ सकते
और अति ना होती।


Monday, 9 October 2017

नन्हा सिपाही

ऐसे बहुत से महीने थे
जिन्हें बीत जाने के लिए ही आना था
पर वे ठहरे रहे
हमेशा हमारे बीच
कुछ चुनिंदा दिनों की तरह
जैसे चुन लिए जाते हैं
दुःख.

पिता की हत्या के बाद
हाथ धुलाती और मूँह पोंछती माँ
नहीं बताती कि हाथ पर लगा रंग खून है
उँगलियों में दौड़ती कंपकंपी डर है
तुम्हारे गुनाह सारे मेरे पूण्य हैं.

महीनों को मौसमों से पहचानना गलत साबित हुआ
दिसंबर में हथेली भीगी रही
जून में देह सिकुड़ी रही
कई रंगों को मिलाने पर भी नया रंग नहीं बना

चौथे माले पर चढ़ते हुए पिता की
घुटती आवाज़, झुके हुए कंधे, लाल चेहरा,
गहरी साँसें
इतनी गहरी जैसे मेरी छाती में कोई फूंकनी से अंगारों को और भड़काए

तय हुआ कि इस व्यक्ति से युद्ध नहीं किया जाएगा
ये नन्हा सिपाही इसका रक्षक होगा
सदा सदा के लिए
सिपाही जिसे बस युद्ध की शिक्षा मिली
अपने पाठ खुद पढता गया

रास्ते में मिली उपेक्षा को
एक उंह से उड़ाकर आगे बढ़ा
आगे बहुत लंबा रास्ता था
सिपाही डरा
साँप सा लंबा रास्ता
उसे अपने कंधे पर बहुत बोझ मालूम हुआ
कन्धों पर बोझ हो तो लंबा हो जाता है कोई भी रास्ता
उसने बन्दूक उतारी और झाड़ियों में फेंक दी
अब हल्का सा लगा कुछ
कुछ फलाँगें लगाई
मानो अभी उड़कर सूरज की गोद में जा बैठेगा

सिपाही रास्ता तय करता रहा
कैलेंडर छूट गए
घडी, तारीख, महीनों और मौसमों का हिसाब छूट गया
उन सब पैमानों को,
जिनसे आंका जाता है
इंसान के वजूद को
वो कब का झाड़ियों में फेंक आगे बढ़ चुका था,

कंधे का बोझ.

Saturday, 30 September 2017

पछतावें

अनंत काल तक एक परछाई भटकेगी
हमारे संयुक्त पछतावों की परछाई
एक अर्थ हो सकता था प्यार का
एक दुनिया तोड़कर एक और दुनिया बनाई अपने आस-पास
अपने लिए
बना पाते एक दुनिया
एक-दूसरे के लिए भी

जहाँ आँसू भी खिल्ली उड़ाते हों
वहाँ डर ख़ुद-ब-ख़ुद चला आता है

अपने होने की तमाम जगहों को कम किया
अपने होने को कुछ और घटाया

जुड़े हुए हाथ अब तलक़ सलामत थे
बस प्रार्थनाएँ घायल हो चुकी थीं

खुशियों में खुशी ढूँढ़ी तो याद आया
आज छुट्टी थी,

ख़ैर !


Tuesday, 29 August 2017

लौट आओ!

एक लड़की, जो एम.ए. में पढ़ रही थी। बहुत चुलबुली, दिलखुश लड़की। फिर महीनों हॉस्पिटल के चक्कर लगाते बीते। बीच में जो हुआ वो जानना मेरे लिए खुद बेहद डिप्रेसिंग रहा। लड़की किसी से बात नहीं करती, रिएक्ट ही नहीं कर पाती। कुछ दोस्त हैं जो बस उसे इस डॉक्टर से उस डॉक्टर तक दिखाते फिरते हैं। 

दरअसल लड़की लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप में थी। लड़का किसी एम.एन. सी. में काम करता था। लड़की अपने कॉलेज के दोस्तों के साथ जब भी कहीं घूमने जाती, लड़के को भी बुलाती। वहाँ वो उसी लड़के के साथ रहती। दोनों ने शादी का फ़ैसला कर लिया था, बात घरवालों तक पहुँची। हरयाणा की लड़की। लड़की के घरवालों ने मारा-पीटा उसे। वो नहीं झुकी। वापस दिल्ली आई, और फोन पर घरवालों को कह दिया कि दोबारा घर नहीं आएगी। परिवार ने सारे रिश्ते तोड़ दिए। शायद दुख हुआ होगा उसे, लेकिन भविष्य को लेकर आश्वस्त थी कहीं न कहीं। लड़का छुट्टियाँ लेकर दिल्ली आता और दोनों एक साथ घूमते-फिरते। हमेशा की तरह लड़की जब अपने दोस्तों के साथ शिमला गई तो लड़का भी वहीं पहुँचा। दोनों एक अलग होटल में ठहरे । फिर लड़का अपने शहर और लड़की वापस दिल्ली। फिर कुछ महीने तक दोनों नहीं मिले। फ़ोन पर बातें होती। लड़की को धीरे-धीरे लगा कि लड़का बात करना अवॉयड कर रहा है। और जैसे अक्सर होता है, लड़की उसे मनाने खुश रखने की कोशिशें करती। वो लड़ता गालियाँ देता। उसके साथ एक ही होटल में ठहरने को लेकर वेश्या तक कह दिया। फिर फ़ोन उठाना तक बंद कर दिया। सब तरफ से निराश लड़की ने उससे मिलने जाने और उसका अंतिम फैसला जानने की सोची। घर की ख़बर तो थी नहीं सो ऑफिस पहुँची। वहाँ समय गवाएँ बिना ही लड़के ने साफ़ बता दिया कि उसकी शादी हो चुकी है। घरवालों ने ज़बरदस्ती की थी जैसे बहाने बनाए। लड़की ने पूछा कि उसने अपने घर पर या अपनी पत्नी से उसके बारे में कभी ज़िक्र किया क्या? लड़के ने कहा हाँ हाँ सबको पता है, मैंने किसी से कुछ नहीं छिपाया। लड़की लौट आई। वापस अपने हॉस्टल। उसी कमरे में। क्या हुआ है समझने की कोशिश सी करती हुई। यक़ीन करना मुश्किल रहा होगा। लेकिन उसके लिए बात यहाँ ख़त्म नहीं हुई। फिर जैसे अमूमन हम सोचते हैं, उसने भी मामले की स्क्रूटनी करनी शुरू की, सोशल मीडिया से आसान क्या हो सकता था। उसने जो कभी नहीं किया था प्यार में, वो अब किया। एक-एक कर उसकी फ़्रेंडलिस्ट की सभी लड़कियों के प्रोफाइल चेक किए। देखते-देखते वो वहाँ पहुँची जहाँ पहुँचना चाहती थी, पर शायद जहाँ पहुँचना नहीं चाहिए था। लड़के की अब हो चुकी पत्नी। उसकी सगाई (गोट एंगज्ड) लड़की और लड़के की आखिरी शिमला ट्रिप से पहले हो चुकी थी। शिमला से लौटने के दो महीने के अंदर शादी भी। लड़के और पत्नी के कुछ फ़ोटोज़ उस समय के भी थे जब वह लड़का इस लड़की के साथ भी रिश्ते में था। लड़की के परिवारवालों ने अपना फ़र्ज़ निभाया और ख़ूब ताने दिए। जिसके लिए इतने हूँकार भर रही थी उसी के पास जा। यहाँ तुझे रोने को कोई नहीं बैठा। लड़की रात-रात भर बड़बड़ाती रहती। उसकी बातें कुछ ऐसी थी कि बहुत घिनौने ढंग से उसका इस्तेमाल किया गया। इंसान भी नहीं समझा। इस बात को वक़्त बीत चुका कुछ, बेहतर तो है पर पूरी तरह से उबरी नहीं है वह। (जानती हूँ कि ये सब मुझे बताया गया है मैंने दोनों पक्षों को भी नहीं सुना है, किसी एक के पक्ष में बोलने का भी शायद हक़ नहीं, पर छल और धोखे को दिल कैसे झेल पाता होगा, मुझे सोचकर ही घबराहट होती है, एक पत्थर सा गले में अटक जाता है)

इस बात का ज़िक्र इस दुआ के साथ आज, कि लड़कियाँ जो ब्रेकअप के बाद हॉस्पिटल पहुँची या डीएक्टिवेट हो गईं, कहीं खो गईं, लौट आएँ।

Tuesday, 22 August 2017

क्या सब करना है तय करते
एक लंबा वक्त गुज़ारा
कुछ किताबें
कुछ शहर
कई पहाड़ और समंदर
बहुत से छोटे सुख
और बहुत कम बड़े दुःख

फिर
क्या नहीं करना है तय करना चाहा
वो सब होता गया जो नहीं करना तय था
वहाँ खड़े थे हम
जहाँ सब थूकते मुँह पर
दीवार समझकर

अब पता नया है
घर कोई और।

Monday, 21 August 2017

कुछ बातें समय रहते दर्ज करना बेहद ज़रूरी होता है
एक वक़्त के बाद जब वे अपना अर्थ खो देंगी
तब भी किसी और कालखंड का अमिट सत्य रहेंगी
हम उस वक़्त में नहीं उन शब्दों और उन भावों में लौट सकेंगे शायद
या शायद नहीं
कुछ सवाल बदलेंगे
कुछ जवाब
या शायद नहीं
वक़्त सब तय करेगा
तुम्हारे अपराध
और मेरे गुनाह भी
एक ही सफ़र में जब पीछे भेड़िया हो
और रात एक दौड़ में बदल जाए
फिर दिन में बस घबराहटें
किसी को ना कह पाना
कि तुम जानते नहीं कि मेरी आत्मा छीलने से
तुम्हें हासिल कुछ नहीं होगा
एक दिन बस वो ख़त्म हो जाएगी
शायद नहीं
तुम्हारे लिए
मेरे लिए भी शायद
फिर जो होगा उसे हम पहचानेंगे नहीं
या शायद एक नई पहचान के साथ पहचान सकें
पर पुराना नहीं होगा वह चाहे जो हो
शायद इतने अच्छे लोग
जीने नहीं देंगे
दुनिया को थोडा और बदतर होना था
मेरी दुनिया को
या माँगने की फितरत ना होती अपनी
या अपना कोई छिपा हुआ अर्थ
या स्टूल के नीचे थोड़ी ज़्यादा जगह
और थोडा ज़्यादा अँधेरा
थोड़ी ठण्ड कम होती
थोडा ये होता
और थोडा वो भी
या फिर कुछ ना होता

क्या ऐसा हो सकता है कि कुछ ना हो?



Tuesday, 15 August 2017

सीढ़ी

बहुत तेज़ी से आस-पास लोग गुज़र रहे थे
सभी को कहीं पहुँचना था
सभी का ध्यान अपने अँगूठे पर था
उसकी एक छाप के इर्द-गिर्द थी सारी सुबहें

अँगूठा नहीं गिना
जब भी गिनी सेकंड्स
गिनती
एक दो तीन.....दस..पचास..सौ
समय का यूँ बीतना
जेबों का भरते जाना
ये कब हुआ
सोचने को ज़रा देर रुक पाते
कुछ सांस आती

एक सीढ़ी पर कई पायदान चढ़ने पर भी
ऊँचाई में फ़र्क नहीं पड़ता
बस दम उखड़ता जाता.

एक थी टुनटुन…

मुट्की! टुनटुन कहीं की”, “इतना खाएगी तो टुनटुन हो जायेगी” ,मेरी एक दोस्त की दादी उसे अक्सर यही कहती हुई पायी जाती थी. टुनटुन नाम से मेरा पहला परिचय यही रहा. इस लेख को लिखने का मकसद अगर कुछ है तो बचपन में मिले इस परिचय को खारिज करना. बतौर गायिका हिंदी सिनेमा में कदम रखने वाली उमा देवी खत्री को मोटापे की मिसाल नहीं बल्कि बतौर कलाकार देखने की कोशिश….


11 जुलाई 1923 को उत्तरप्रदेश में जन्मी उमा देवी महज़ तेइस वर्ष की उम्र में गायन के क्षेत्र में हाथ आजमाने मायानगरी में आ गई थी. यहाँ तक पहुँचने के अपने सफ़र को उमा ने बताया “मुझे याद नहीं कि मेरे माता-पिता कौन थे और कैसे दिखते थे. मैं कोई दो-ढाई बरस की रही होंगी जब वे गुज़रे थे. मुझसे बड़ा एक भाई था जिसका नाम हरि था, वह मेरा बेहद ख्याल रखता था लेकिन एक रोज़ वह भी गुज़र गया और दो वक्त की रोटी के एवज़ में रिश्तेदारों के लिए 24 घंटे की नौकरानी छोड़ गया. अब रिश्तेदारी-बिरादरी में जहां कहीं भी शादी-ब्याह, जीना-मरना हो काम के लिए मुझे भेजा जाने लगा. गाने का शौक मुझे बचपन से था, लेकिन गुनगुनाते हुए भी डर लगता था क्योंकि उन लोगों में से अगर कोई सुन लेता था तो मार पड़ती थी. सन 1947 में काम की तलाश में मैं कारदार के स्टूडियो पहुंची और बेरोक-टोक उनके कमरे में घुस उन्हीं से पूछ बैठी, कारदार कहाँ मिलेंगे मुझे गाना गाना है. दरअसल ना तो मैं कारदार को पहचानती थी ना फ़िल्मी तौर-तरीकों से वाकिफ थी. शायद मेरा यही बेतकल्लुफ्फी अंदाज़ कारदार को पसंद आया जो बिना ना नुकुर किये उन्होंने नौशाद साहब के असिस्टैंट गुलाम मोहम्मद को बुलाया और मेरा टेस्ट लेने को कहा. गुलाम मोहम्मद ढोलक लेकर बैठे तो मैंने उनसे ठीक से बजाने को कहा. मेरे बेलाग तरीके से वे भी हक्के-बक्के थे. बहरहाल मैंने फिल्म जीनत का नूरजहाँ का गाया गीत “आंधिया गम की यूँ चली..” गाकर सुनाया जो सबको बहुत पसंद आया और मुझे 500 रुपये महीने की नौकरी पर रख लिया गया.”
उमा देवी माने टुनटुन ने कई बेहतरीन गीत गाये, उनका पहला गाना फिल्म दर्द से ‘अफसाना लिख रही हूं दिले बेकरार का‘ इतना बड़ा हिट साबित हुआ कि आज भी टुनटुन को इसी से पहचाना जाता है , आज भी गुनगुनाया जाता है. तकरीबन 40-45 गीत गाने के बाद पारिवारिक समस्याओं के चलते उनके करियर में एक ब्रेक आ गया, इस बात से अनजान कि यह अल्पविराम उनके गायन के लिए पूर्णविराम भी साबित हो सकता है उमा देवी जब लौटी तो उन्हें बतौर गायक काम नहीं मिल सका. ऐसे में उन्हें अभिनय की सलाह मिली और यहाँ से उमा का नया सफ़र शुरू हुआ जिस सफ़र को हम टुनटुन का सफ़र मानते हैं.
हास्य के लिए टुनटुन हों, या मुकरी अपने शरीर को अपनी ताकत बना लिया. वर्तमान में भारती सिंह भी मानो उन्ही पद-चिह्नों पर चल रही हैं. दरअसल सिनेमा आसमान सरीखा एक अनंत कैनवास है. जिसपर अलग-अलग रंग और बेरंग पेंटिंग्स की गई हैं. बेमतलब और अर्थहीन कुछ नहीं. जैसे एब्सर्ड पेंटिंग्स से गहरे अर्थबोध निकल आते हैं वैसे ही सिनेमा में भी सबकुछ का मतलब है. कहते भी हैं कि सिनेमा सभी कलाओं का संगम है. ज़रुरत है तो बस इसके सदुपयोग को समझने की. एक ऐसे समाज में जहां मोटा व्यक्ति केवल हंसी का पात्र हो सकता है वहाँ टुनटुन उर्फ़ उमा इसी को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लोगों के मनोरंजन के लिए प्रस्तुत हो गई.
हास्य कलाकार जब आपको हंसाते हैं तो सोचिये कि कहीं मेरा नाम जोकर की तरह आप उनके जीवन कि ट्रेजेडीज़ पर तो नहीं हंस रहे! देखा जाए तो यह विडम्बना ही है कि फिल्मों में मोटा, बेडौल, छोटा, नाटा, गोरा, काला, हकलाता व्यक्ति, बहरा व्यक्ति, नेत्रहीन व्यक्ति और विकलांग सब हंसी का पात्र हो गए. परिस्थितिजन्य हास्य बिरला ही देखने को मिलता है. ऐसे में बिना किसी झिझक और शर्म के अपने शरीर को स्वीकार कर कला के प्रति टुनटुन का समर्पण काबिल-ए-तारीफ़ तो है ही. जो ख्याति टुनटुन को मिली वह शायद उमा देवी को नहीं मिल पायी जबकि जबकि खुद टुनटुन कि पसंद गायिका उमा देवी थीं. खूबसूरत और हरफनमौला टुनटुन को उनकी पुण्यतिथि पर नमन.

आख़िर तुम ब्राह्मण हो !

नॉर्थ कैम्पस, दिल्ली विश्वविद्यालय का हिंदी विभाग! मौक़ा था हमारे एम. फिल इंटरव्यू का, लिखित परीक्षा अच्छे अंकों से पास कर लेने पर अपनी पांच सालों की पढ़ाई पर थोड़ा भरोसा लेकर हम इंटरव्यू हॉल में पहुंचते हैं। वहां पांच पुरुष-प्रोफेसर्स के बीच सुशोभित अकेली महिला-प्रोफेसर आश्वस्त करती है कि संख्या कम है लेकिन है। उनकी मेज़ पर चाय बिस्कुट और समोसे ! वे इतने भूखे थे कि सवालों के बीच ही में समोसा खाते और चाय सुड़कते।
मुझसे पहला सवाल पूछा रसिक आलोचक महोदय ने ‘आपका स्पेशलाइज़ेशन किसमें है?’ अब सोच रही हूं कि अभी कहां स्पेशलाइज़ेशन! ख़ैर जवाब दिया कि मुझे फलाँ फलाँ लेखक कवि पसंद हैं। ‘अच्छा नागार्जुन! उनकी अकाल और उसके बाद सुनाइए’ सुनाने से पहले ही एक महानुभाव बोले ‘सुबह से बहुत बार यही सुन रहे हैं तुम भी यही सुना दो’ और ज़ोरदार ठहाका ! मैंने बचपन में मम्मी पापा के किसी रिश्तेदार के सामने पोएम सुनाने को कहा जाने पर ‘देखो एक डाकिया आया, चिट्ठी कई साथ में लाया’ वाले अंदाज़ में कविता शुरू कर दी, गलती तब हुई जब नागार्जुन जी की कानी कुतिया को सुलाने के बजाय रुला दिया मैंने। जैसे ही यह पंक्ति गलत बोली मैंने ‘कई दिनों तक कानी कुतिया बैठी रोई उसके पास’ पूरा हॉल ठहाकों से गूँज गया। और अभी तक जिस महिला-प्रोफेसर की उपस्थिति आश्वस्त कर रही थी उनकी टिपण्णी आई ‘ये तो डुबो देगी’ और भी ज़ोर से ठहाका लगा। फिर रसिक आलोचक जी ने तफ़री ली ‘अरे नहीं नहीं मैडम! समय के साथ कविता में बदलाव भी ज़रूरी है, हाँ बेटा तुम आगे सुनाओ।’ वे हंसी दबा रहे थे या मुझे सुना रहे थे पता नहीं। इस तरह के अपमान के लिए मैं तैयार नहीं थी लेकिन।
इस घटना के बाद मुझसे पूछे गए सवाल मेरे कानों तक पहुँच ही नहीं पाये। मानो कानों में पिघला हुआ सीसा डाल दिया गया हो। मुझे अंतिम सवाल याद है ‘अन्ना केरेनिना किसने लिखी है?’ यह किताब मैंने इस तरह पढ़ी थी कि अन्ना के साथ सारे द्वंद्व जिए थे। उसकी मौत पर आँसू बहाए थे। लियो टॉलस्टॉय का नाम लेने के लिए भी मेरा मुँह नहीं खुल सका। ‘बच्ची घबरा गई है’ कहकर मुझे इंटरव्यू समाप्ति की सूचना मिली और दरवाज़े के बाहर निकलते हुए भी मेरी पीठ पर उनकी हंसी गूंज रही थी।
ये गूँज कितने दिनों तक मेरे कान में गूंजती रही, वे लोग नहीं समझेंगे। मेरा चयन नहीं होगा इसे लेकर मुझे ज़रा संशय नहीं था। पर गुरुजी के चरणों में नतमस्तक ऐसे शिष्यों का चयन जिन्हें अन्ना केरेनिना नामक कोई पुस्तक भी है की जानकारी ना हो, ने हैरान किया। हिंदी विभाग में जुगाड़ के बिना कुछ नहीं होता ऐसा कहने वाले बहुत लोग मिले लेकिन मैं हमेशा सोचती थी कि काबिलियत को कोई दरकिनार भला कैसे कर सकता है। तब मेरी मुलाक़ात एक ऐसे सज्जन से हुई जिन्हें मुझसे पूरी सहानुभूति थी। ‘अरे रे! तुम तो ब्राह्मण हो फिर भी नहीं लिया? अगली बार इंटरव्यू से पहले मुझे सूचित करना’ मैं उस दिन समझी कि क्या फ़र्क़ पड़ता अगर कानी कुतिया रोई होती या सोई होती ! चयन तो निर्धारित था। सज्जन ने मेरे ज्ञान-चक्षु खोलते हुए यह भी समझाया कि कितनी सीट्स पर उनका कब्ज़ा है (अर्थात् उनके द्वारा भेजी गई कितनी सिफारिशों पर सुनवाई होगी) ‘अपना रोल नंबर और पूरा नाम भेज देना अगर उधर से कोई बड़ी सिफारिश नहीं आई तो हम तुम्हारा करवा देंगे, आखिर तुम ब्राह्मण की संतान हो’ मैंने मेरे जीवन में मेरे घर परिवार दोस्तों में कहीं ब्राह्मण शब्द का ऐसा प्रयोग नहीं सुना था।
मेरे ज़हन में उदय प्रकाश की पीली छतरी वाली लड़की के हिंदी प्रोफेसर साहब आने लगे। ये ब्राह्मणवादी स्वरुप से मेरा पहला आमना-सामना था, मुझे शर्मिंदगी हुई ! मेरे एक मित्र ने एक दिलचस्प मगर दुखद किस्सा सुनाया, हुआ यूँ कि एक छात्र नियमित रूप से प्रोफेसर के घर के काम, उनकी पत्नी के लिए सब्ज़ी तरकारी खरीदना, बीच वार्तालाप में पाँच बार पाँव छूना वगैरह वगैरह करता…प्रोफेसर ने भी कह दिया कि तुम्हारी सीट पक्की है। बस भूल यह हुई कि ‘कैटेगरी’ पूछे जाने पर उसने सकपकाकर ‘जनरल’ कह दिया(संभवतः गुरूजी को वह भी भली-भांति समझ-बूझ गया होगा) लेकिन जब इंटरव्यू लिस्ट में उसके नाम के साथ OBC लिखा देखा तो गुरूजी ने एडमिशन तो नहीं ही दिया डपटा सो अलग !
जाति किस कदर दिल्ली विश्वविद्यालय के अंदर तक खोखले हिंदी विभाग का अंग है ये हिंदी विभाग से जुड़ा कोई भी शख्स जिसके अन्दर लेशमात्र भी ईमानदारी बची है नकार नहीं सकता। लाल झंडे वाले भी अपना कैंडिडेट तैयार रखते हैं। न्याय की बात करने वालों का अपना तर्क है कि उन्हें संख्या-बल चाहिए, अपनी विचारधारा वाले। मेरिट किस चिड़िया का नाम है ! योग्यता गई तेल लेने ! मेरी एक मित्र को अपने चयन पर भरोसा था और चयन हुआ भी। और भरोसा क्यों ना हो आख़िर 10000 रुपये तक के गिफ्ट्स जो महिला-प्रोफेसर के चरणों में अर्पित किये थे। (ध्यातव्य है कि ये डंके की चोट पर वाम सपोर्टर हैं) माने हमाम में सभी नंगे हैं। एक तो करेला उसपर नीम चढ़ा वाली बात यह है कि ऐसी बेशर्मी ये लोग लुक-छिपकर नहीं करते।
ख़ैर, ऐसे अनुभवों के बाद मोहभंग हो जाना स्वाभाविक ही था। फेसबुक के माध्यम से मिली जानकारी है कि इस जूता-चाट चयन-प्रक्रिया पर सवाल उठाया था दिल्ली विश्वविद्यालय के गोल्ड-मेडलिस्ट छात्र अभय मिश्रा ने! उन्होंने हाई-कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसे वे हार चुके हैं। फेसबुक पर 2016 की उनकी एक पोस्ट भी काफी चर्चा में रही थी जिसे यहां लगाया जा रहा है।
अभय मिश्र द्वारा 15 सितम्बर 2016 को फेसबुक पर लिखी गई पोस्ट 

चयन मेरिट पर आधारित हो। मूल्यांकन में पारदर्शिता होनी चाहिए। यह चेतनाविहीन विभाग कितने सपनों के साथ खेलता है और कितने ही छात्रों को अवसाद की गर्त में धकेलता है! कमलानगर और मुखर्जीनगर के उन सीलन भरे कमरों में कितने सपने दम तोड़ते हैं। गाँव में दूर अपने 24-25 वर्षीय बच्चों से आस लगाए बैठे माँ-पिता से महीने का खर्च माँगते हुए कितनी बार गले में फाँस अटकती है, ये असंवेदनशील गुरु-घंटाल क्या भला कभी समझ सकेंगे ! मठ और गढ़ जाने कब टूटें और कब जाने न्याय हो ! छात्र संघर्ष ज़िंदाबाद ! बिना लाल सलाम!

Thursday, 27 July 2017

उल्टियाँ

जो देखा, पढ़ा, सुना,
या जिया
उन सबकी उल्टियाँ

ऐसी भी रातें आई
जब सबसे प्यारे लोग सबसे ज़्यादा क्रूर हुए
ऊँचाइयों पर खड़े होकर
हम रौशनी का एक पेड़ देखेंगे
जो कहीं दूर तेज़ाब की बारिश कर रहा होगा
खिड़की पर खड़े होकर तय करेंगे
सबसे बेहतर रास्ता
उस पेड़ की बारिश है
या यह ऊँचाई
या बस यही एक पल
जिसमें सबसे बड़ा फैसला लिया जाना है

चुप रह जाना ही
शोर को कम करेगा

मुझे इंतज़ार पर छोड़ आओ
तुम जादुई दुनिया में लौट जाओ
वो वक़्त अच्छा था
जब तुम जादूगर
और मैं छोटा बच्चा थे
पेट में ढेर सी मिट्टी है
हाथ में छतरी

बारिश एक कभी ना तय की जा सकने वाली दूरी पर

ये वक़्त मुझे पसंद नहीं

आख़िरी मुलाक़ात
एक दोस्त से
दिवाली से कुछ रोज़ पहले
कुछ दिए, मिठाई
और दरवाज़े पर लटकाने वाली
एक शुभ तोरण
उल्टियाँ

प्यार-प्यार करते हुए चिल्लाने वाले
एक दोस्त का
गाली देकर भाग जाना
उल्टियाँ

एक लड़की की मासूम आँखों पर
खून सने हाथ रखकर
इठलाना कि पहचानो तो ज़रा
उसका घुटने छूते पानी में डूबकर मर जाना
उसपर भी उल्टियाँ

इतनी उल्टियाँ करूँ
कि जो कुछ अन्दर है सब बाहर निकल जाए
नालियों में बह जाए
मुझे खाली कर जाए
मुझमें से मैं निकल जाऊं
बस उल्टियाँ.

Thursday, 29 June 2017

अवस्थाएँ

यूँ काँटों से लदा पेड़ 
आँगन में कोई लगाता है क्या
हर एक काँटे पर चिपका एक लम्हा
एक याद एक टीस
एक खुशबू भी
और एक सपना 

पहली-पहली बार हाथों में लगी मेहंदी
और नाखून कचोटने लगे हथेलियों को
कि तुमने नहीं देखा
रुक जाऊँ कि चलूँ किसी ओर
एक झोंका हवा का दिशा कोई दे जाए

'क्या तुम उल्हाने देना छोड़ नहीं सकती?'
छोड़ दोगी तो देखो कितनी आसानी होगी
थोड़ा खून बहेगा, थोडा सा दर्द होगा
एक पत्थर छाती पर जम जाएगा
गले में जमा मोम पिघल कर 
चीरते हुए पेट में उतर जाएगा
कुछ नसें फड़केंगी, कुछ धड़कने तडपेंगी 
एक कील सी ठुक जाएगी
ठीक बीच एक सपने के
बिखर जाएंगी चिंगारियाँ 
आँखों से होते हुए पूरे शरीर पर
आत्मा पर पड जाएंगे कुछ फफोले
पर खुद ही सोचो, कितनी आसानी होगी 

अपने सच से दूर ला खड़ा कर
तुम्हें दूँ सज़ा 
कि तमाम ताक़तें तुम्हारी 
नाकाफ़ी हों 
मुझे छू सकने में
तुम छुओ मैं गल जाऊँ 
तुम रो'ओ मैं पिघल जाऊँ
अपना आकार खो दूँ
ठोस होना या बने रहना 
पीड़ा का एक स्तर है
तरलता दूसरा
उड़ जाना माने निजात
देह के सभी बंधनों से.

Wednesday, 31 May 2017

हैंडराइटिंग

एक अलग ढंग से सुंदर लिखने की कोशिश
कर्सिव में
हर अक्षर को दूसरे से यूँ जोड़ना कि जैसे
अधूरे हों एक दूसरे के बिना
बढ़ते हुए आगे
एक लय में हो

हर बार बदल देना अपने लिखने का ढंग
कि जो लगे सबसे सुंदर
एक-एक अक्षर को अलग-अलग
मोती सा टांकना

परीक्षा ख़त्म होने से चंद मिनट पहले
लिखे हुए अपने ही अक्षरों को देख
हमेशा लगा कि
हकीक़त ये है मेरी
बाकी सब पाखण्ड

पेन्सिल से लिखे को मिटाने पर
पीछे कोरापन नहीं
कुछ रेखाएँ रह जाती हैं
ऐसी ही कुछ रेखाएँ
माथे पर गुद जाती हैं

बड़े होते समझ आया
कि लिखना एक जालसाजी है
तथ्यों को बदलने का एक तरीका भर
चाहे कितने ही सुंदर हर्फ़ों में पिरोया गया हो भले


एक तारीख  के सामने
तथ्य है कि तुम मर गए
कभी नहीं आओगे
मेरे पन्नों में फूलों की छाप के साथ
टूटे-बिखरे पत्तों के पीछे लिखा है
कि तुम आओगे बार-बार
बनाकर लिखी गई वह बात

कहीं खाल में गोदनी ना पड़े
एक हैंडराइटिंग से
एक चेहरे की झलक मिलती रहे
बस.



Friday, 19 May 2017

सिमोन


बाइबल नहीं तुम्हारा लिखा
क्योंकि धर्म में कुछ श्रेष्ठ नहीं हमारे लिए
कहते हैं एक उम्र के बाद पुरुष की कठोरता टूट जाती है
वह तलाशता है अपने दंभ को सहलाने वाला हाथ
और स्त्रियाँ ना झुकने का फैसला करती है
जिनकी कमर पर आजीवन घन बजा हो

किसी कंस्ट्रक्शन साइट पर
कोई दुर्घटना हो और चौथे माले से 
ढहने लगे सब ईंटें
ऐसे बरसते थे शब्द
जैसे स्वादिष्ट भोजन के बाद
गले में अटका रह गया हो
एक सूक्ष्म-सा रेशा
एक कोमल सी पलक मुड़कर धंस गयी हो आँख में
शूल की तरह
बातों का अंत

यूँ सोच पर बरसते रहे कोड़े लगातार
जो करना था उसे सोच में इतना झुठलाया कि
झूठ सच हो गया

और सच ये है कि
पिता से प्रेम पर चर्चा नहीं हो सकती

रात भर बाथरूम से
पानी के बहने की आवाज़ आई
रात भर खून बहा नालियों में
दो टाँगों के बीच सिमटता रहा अस्तित्व
और मृत्यु फिर मुस्कुराई

तुम जानती हो सिमोन
कॉलेज में तुम्हें पढ़कर
तुम्हारी तस्वीर देखी नेट पर
और अपना कवर लगा लिया
तुम कोई सहेली लगी
तुम्हारे नाम से छद्म नारीवाद के ताने भी सुने
लेकिन गर्व से
तुम मेरा गर्व रही

दुनिया की हर महत्वपूर्ण घटना से दूर
ज़मीं में कहीं भीतर
कहीं भी उपस्थित ना होकर
मैंने खुद को उगते हुए देखा.


वापसी

एक खुशबू की तलाश में
सपने में सब बह जाता
या शायद सपना ही बह जाता
जिसमें प्रवेश या वापसी
कोई चुनाव नहीं

ऐसा बहुत कुछ था
इर्द-गिर्द
जिसे नहीं मिला समय या ध्यान
सबकुछ सोख लिया
बस एक सवाल ने
वो सवाल भी ठीक ठीक कहाँ पता था
वापसी
कभी भी, कहीं से भी हो सकती थी
वापसी कहीं नहीं हो सकती थी.

कोई ठिकाना नहीं था लौटने के लिए

Monday, 24 April 2017

इक तुम ही नहीं तन्हा, उल्फत में मेरी रुसवा...

14 वर्षीय साँवली और भरे गालों वाली एक लड़की भानुरेखा, लाइट्स की चकाचौंध के बीच खड़ी है, दृश्य है 5 मिनट्स लंबे चुम्बन को फिल्माने का. एक नाबालिग से ऐसा दृश्य विवादास्पद घटना थी। हिंदी ना समझने वाली एक लड़की जिसे स्कूल में होना था वह मायानगरी में अपने पैर जमा रही थी. वह छोटी लड़की भानुरेखा आज रोल मॉडल के रूप में खूबसूरती की मिसाल और एक दिलकश अभिनेत्री रेखा के रूप में अपनी काबिलियत साबित कर चुकी है आज 10 अक्टूबर को उनके जन्मदिवस पर उसी सांवली लड़की के सफर को हम सलाम करते हैं जिसने मुश्किलों में भी कभी अपनी मुस्कान फीकी नहीं पड़ने दी।



तेलुगु फिल्मों में बतौर बाल कलाकार काम करने वाली रेखा के लिए बतौर लीड हीरोइन फ़िल्मी सफर की शुरुआत हुई फिल्म ‘सावन भादो’ से। ‘सावन भादो’ के साथ घर, खूबसूरत, सिलसिला,खून भरी मांग, जुबैदा, इजाज़त और उमराव जान जैसी शानदार और यादगार फिल्मों में अपने अभिनय का जादू बिखेरने वाली रेखा ने अपनी शुरुआत को याद करते हुए कहां ” बॉम्बे एक जंगल की तरह था, जहां मैं निहत्थी चल रही थी। यह मेरे जीवन का सबसे भयावह दौर था। मैं इस नयी दुनिया के तौर तरीकों से बिलकुल अनजान थी. लोगों ने मेरी कोमलता और भावुकता का अनुचित लाभ उठाया। मैं सोचती थी ‘मैं क्या कर रही हूँ? मुझे स्कूल में होना चाहिए था, आइस-क्रीम खानी थी, दोस्तों के साथ मज़े करने थे अपनी उम्र के बाकी बच्चों की साथ सामान्य जीवन के बदले मैं यूं काम करने के लिए मजबूर क्यों हूँ? ‘ हर रोज़ मैं रोती थी क्योंकि मुझे वो सब खाना पड़ता था जो मैं पसंद नहीं करती थी, ऊट-पटांग सितारों वाले कपडे पहनने पड़ते थे जो बुरी तरह चुभते थे। पोशाक, गहनों से मुझे एलर्जी होती थी। बालों में लगाया जाने वाला स्प्रे कितनी ही बार बाल धो लेने पर भी नहीं निकलता था। मुझे एक स्टूडियो से दुसरे में धकेला जाता था। एक 13 वर्षीय बच्चे के लिए यह दर्दनाक था। ‘
इससे मुझे याद आती है वह चिट्ठी जो अभिनेत्री बबिता ने अपनी एक प्रशंसिका को लिखी थी -‘जब तुम मीठी नींद लेती हो, मैं अपने चेहरे पर जमा मेकअप निकाल रही होती हूँ.’ मायानगरी की चकाचौंध में चमक रहे सितारे इस चमक तक पहुँचने के लिए बहुत से दर्द छिपा जाते हैं जो परदे पर नज़र आते हुए भी परदे में छिपे रह जाते हैं। सिमी ग्रेवाल को दिए इंटरव्यू में सिमी के यह पूछने पर कि क्या पिता के बिना बचपन बिताने का उन्हें अफ़सोस है पर रेखा बड़ी साफगोई से जवाब देती हैं कि जीवन में पिता का कभी कोई अस्तित्व रहा ही नहीं तो फिर कमी कैसी ! साथ ही वे यह भी कहती हैं कि उनके मन में किसी के लिए कोई कड़वाहट नहीं है और ना कभी रही है।
बचपन की भानुरेखा को याद करते हुए रेखा कहती हैं कि भानुरेखा अभिनेत्री नहीं बनना चाहती थी बल्कि घर बसाना चाहती थी। एक प्यार करने वाला जीवन साथी और बच्चे चाहती थी। भानुरेखा से रेखा तक के सफ़र में हमसफ़र को लेकर हमेशा विवादों में रही रेखा की कहानी। विनोद मेहरा, मुकेश अग्रवाल के साथ असफल शादियों के बाद अमिताभ बच्चन के साथ रेखा के सम्बन्ध चर्चा में रहें। रेखा की खूबसूरत आँखें शिकायत नहीं करती। झुकती है और फिर उतनी ही खूबसूरती से उठती हैं। तमाम विवादों के बीच भी रेखा ने कभी अनर्गल बयानबाज़ी नहीं की. अमिताभ और रेखा के संबंधों पर रेखा का रुख उमराव जान के गीत की तरह कुछ यूँ रहा – ‘तुझको रुसवा ना किया खुद भी पशेमान ना हुए’.
बॉलीवुड के फ़लक पर बहुत से सितारे छाये लेकिन नए कलाकारों के आने पर जगह खाली करते चले लेकिन रेखा के साथ ऐसा नहीं हुआ उम्र का बढ़ना एक खूबसूरत प्रक्रिया रही, उम्र बढ़ने के साथ उनकी चमक बढ़ती रही। उनकी जादूगरी के हम सब आज भी क़ायल हैं। सदाबहार रेखा का आँखों से मय पिलाने का हुनर आज तलक फीका नहीं हुआ। ग्लैमर की चकाचौंध इस 70 के दशक की अभिनेत्री को पीछे नहीं धकेल सकी बल्कि नए दौर की अभिनेत्रियों को भी टक्कर देने का माद्दा है रेखा में।
उमराव जान के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित रेखा का आज तक हर कोई दीवाना है। हाल ही में लॉन्च हुई इनकी बायोग्राफ़ी ‘रेखा : द अनटोल्ड स्टोरी’ रेखा के फैंस के लिए उनके जन्मदिन का रिटर्न गिफ्ट ही है।



Tuesday, 11 April 2017

लाल खूँटी

खूँटी पर खाल का लिबास
टंगा था
मैंने बस एक नज़र देखा
और जल्दी से अपनी नज़रें घुमा ली
कुछ देर सोचा
अब किस और देखूँ
जिस ओर भी
या यूँ कहूँ जिस चीज़ को भी
ज़्यादा देखा
उसी ने पलटकर घूरा
सब कुछ को देखते हुए कुछ भी ना देखना
मैंने पिछले कुछ सालों में ही सीखा
मैंने सीखा न देखना
पाँव के गीले तलुवे तक को मैंने नहीं देखा
बस महसूस हुआ
तरलता नहीं रंग
लाल
गाढा
सुर्ख लाल
मेरे पाँव के नीचे रोज़ बहता है लाल रंग
लाल खूँटी का रंग
आँखों में
खून ज़बान पे
कोई है,
जो लौटता नहीं !

शशि !

Wednesday, 5 April 2017

'पिता' क्या तुम तक मेरा गिडगिडाना कभी पहुंचता है?

वो कोई पहली रात नहीं थी
जब मोम गले का शरीर को जला रहा था
एक ख़त था पिता के नाम
जिसमें माँगा गया था
एक लड़की का लौटकर आना
यूँ ज़िंदा पिता से मैं कभी नहीं कह पाउंगी
कि एक लड़का जब अपनी साँसें मेरे चेहरे पर छोड़ता है
मैं उस अधूरेपन से मर जाती हूँ हर बार
'पिता' क्या तुम तक मेरा गिडगिडाना कभी पहुंचता है?

चाह

एक रात आँगन के पेड़ ने झुककर
पूछा अब भी यकीन है?
यूँ फुसफुसाना उसका मुझे डरा गया
तुम तो नहीं थे
फिर अब?
मैं उग आया हूँ तुम्हारे सपनों में

उस बच्चे ने जो कुछ कहा था
सब सच था
जिसे मुस्कुराकर टाल गयी थी तुम
बसंत के टूटे पत्तों के ढेर के नीचे गड्ढा है
जो बचा सको

ऐसा नहीं कि तुम जानोगी नहीं
या चाहो तो बचा नहीं सकोगी
बल्कि
तुम चाह ही नहीं सकोगी
तुम्हारी चाहना उस क्षण
नहीं रहेगी
तुम्हारी साँसों को
अपराधों के नीचे घोंट देना ही तो काम है मेरा .

बीस रुपये का नोट..

पिछले तीन दिनों से घर से बस स्टैंड बस स्टैंड से मेट्रो और मेट्रो से होते हुए सरकारी दफ्तर तक आपके साथ चक्कर लगा रहा है वो। आपके पर्स की छोटी जेब में वो मैला कुचला फटा नोट 20 रुपये का। खूब कोसा जिसने पकड़ाया और जल्दबाज़ी में आप देख भी नहीं पाये।
जूस वाले को दिया तो बोला क्या साहब दूसरा दीजिये। ‘अरे चल जाएगा भैया’ ‘ सड़ी मोसंबी का जूस आपको चलता क्या?’  ख़ैर एक डरे सहमे दिखने वाले लड़के से लाल बत्ती पर दो पैन खरीदे और नोट आगे बढ़ाया। इससे पहले ट्रैफिक फिर चलता उसने अपने पैन झपट लिए और रास्ते से हट गया। आपने कैंटीन में समोसा खाया, दोस्त से गप्पे मारे, बॉस से फटकार सुनी, सर खुजलाया पर 20 रुपये का नोट दिमाग से नहीं गया। ऐसे ही ज़ाया कैसे हो जाने दें भला। याद हैं न वे तीन दिन? चिंता में डूबे हुए, शाम को काम से छूटते ही जिसको चलाने के लिए खूब मेहनत की थी। खैर अब वो पुरानी बात हो गयी। अब तो रुपयों के आदान-प्रदान में मिलाई-जुदाई तक में मिले भेंट को भी आप अच्छी तरह जाँचना सीख गए हैं।

अब याद करने की कोशिश कीजिये, जून की वो रात जब खूब ढूँढने पर भी ऑटो ना मिलने से आप चिपचिपी गर्मी में पैदल चलने को मजबूर थे। पसीने से भीगी कमीज़ ज़िस्म से चिपकी हुई थी। और काँटो सी चुभन!  ‘ऐं बाबूजी कहाँ जाइयेगा?’  और आप पहले लपककर चढ़े और फिर बोले चावड़ी की तरफ ले लो भैया। रिक्शा में अपनी सारी ताकत झोंकते हुए पैडल मारते हुए वह बोला अबकी बार गर्मी रिकॉर्डतोड़ है भैया, आग बरस रही है आग। आप झुँझलाये से जवाब भी नहीं देते और वो ट्रैफिक, बाइक पर सवार अफ़लातून लड़कों, गर्मी, बारिश सब पर बारी-बारी बोला और आप सोचते रहे  ‘बीस रुपये का नोट’.
 यहाँ से अंदर लेना है क्या बड़े भाई? नहीं नहीं यही उतार दो बस। पोपले मुँह पर बेतहाशा पसीना और धुली हुई हँसी। सच में आग बरस रही है और वह हँस दिया। आपका हाथ पर्स की छोटी जेब में,  चेहरे पर आये संशय को छिपाते हुए आपने नोट दिया और देखे बिना ही अपनी बाजू से माथा पोंछते हुए उसने जेब में रख लिया। वो भरोसा था या जाने क्या। बीस रुपये के नोट से भी गला रेंता जा सकता है,  क़त्ल किया जा सकता है और बिना किसी अखबार में छपे ऐसी घटनाएँ अमूमन रोज़ घट रही हैं. आपके सर से बोझ हटा और आपके पाँव मानो हवा में थे। और एक बेहद हलकी गर्म हवा के झोंके ने माथे पर चमकी पसीने की बूंदों को ठंडक पहुंचाई और मुँह से निकला इस बार तो सच आग बरस रही है।

नोट : बैंकों में दोषपूर्ण नोट बदले जाते हैं और नोट को उसी कीमत पर बदला जाता है . यूँ चूना लगाने की आदत से बाज आएं.  जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए एक छोटा सा कदम !


Monday, 3 April 2017

सूरजमुखी, खरगोश और अँगारें

मुझे बताना था
कि जहां से देख रहे हो,
देख नहीं पाओगे
अँधेरा मेरा
तुम्हारे और मेरे अँधेरे के बीच
एक लकीर
रौशनी की नहीं
फ़र्क की है
कि मैं घुल सकूँ तुम्हारे अंधेरों में
कि रौशनी नहीं तो ना सही
अन्धेरा छुए तुम्हारा गाल
इतने प्यार से
कि खिल उठे मन तुम्हारा
वो स्पर्श हो जाऊं

क्यारी में सजा जो
कभी कोई फूल
मचलकर तोड़ा हो
तो वो फूल मुझे कभी जगह ना दे

कि सूरजमुखी का फूल जो देखा नहीं कभी मैंने
मुझे जगह देगा
कि अपनी आत्मा से भी ज्यादा
कोई चाह सकता है किसी को
ये मैंने जाना
जब तुम्हें चाहा.

2. खरगोश

जन्मदिन
मुझे याद नहीं जन्मदिन का कोई उत्साह 
या बचपन की इससे जुडी कोई याद
एक चलचित्र है 
जब मैं चार साल की थी
और मेरे जन्मदिन पर धूम मची थी
मैं तब भी अनभिज्ञ थी 
कि वह मेरा दिन था

एक ऐसा दिन जिसे मैंने नहीं चुना
उसपर उत्सव जैसा कभी कुछ मुझे महसूस भी नहीं हुआ 
कोई फ़ोन करता बधाई देता मैं झेंप जाती

तुमसे शुरू हुई सब तारीखें
तारीखें जिन्हें तुम्हें चुनकर
मैंने खुद चुना
26 मार्च
प्यार की तारीख
एक खोज है 
जो इसी रास्ते से होकर गुज़रती है
इस रास्ते पर दिल बस दुआओं से भरा होता है
कि मुलायम खाल के नीचे चिहुंकता दिल
कोई शिकारी ना देख ले

बेशक तुम सारी दौडें हार जाना कछुओं से 
पर नहीं बनोगे कभी हार का उदाहरण 
मासूमियत और चपलता ही तुम्हारे गुण होंगे
ये दौडें तुम्हारे लिए नहीं 
बस मेरे पास चले आना

और आज
23 अप्रैल 
प्यार के जन्म की तारीख
तो खरगोश कब जन्में थे तुम?
क्या हमेशा से यहीं थे? 

3. अँगारे

सखा
जब तुम आओगे मेरे द्वार
तब देखना
यहाँ लोहे की जंजीरें नहीं हैं
बस दहकते अँगारें हैं
छोटे से दायरे में नहीं पैदा होने दिया कोई डर 
जुराबों की बदबू से नथुने ना फटें
और टीवी पर होती बहसें नसों से ना करें खिलवाड़
एक छोटा बच्चा जेब में छुरा लेकर ना घूमें
पैर में पाजेब पहने दो रुपए माँगती 6 साल की लड़की
या शायद 8 की
को देखकर बलात्कार का डर 
कोई डर पार नहीं होता अंगारों की दहलीज से
पर दिल पर नहीं इनकी हुकूमत
ये जलता भी है
दहकता भी है और
और
और डरता भी है।

डर के बहुत से रूपों में से 
सबसे खतरनाक है
अनिच्छा

प्यार ना करना
कभी अनिच्छा से

सखा
आत्मा को यूँ चूमना कि बरस जाएँ सृष्टि
अँगारें ना बुझे
डर मरे कभी ना
सबकुछ जिये 
हमेशा।

प्यारे 
तुम जिओ 
मेरे डर जिये
मेरी दुआओं में तुम यूँ हो कि 
आँख झपकूँ जो तो तुम्हारी तस्वीर 
बंद और खुली आँखों में

तुम्हारी भीगी सी डूबी सी आंखें
मेरे सीने पे पत्थर सी गड़ जाती हैं
तुम जिओ मेरे लाल
ये बात मैं कुछ यूं कहना चाहती हूँ कि
छोटे से घोंसलें में समेटकर तुम्हें
तुम्हारे घुँघराले बालों में फिराऊँ उंगलियां
और अपनी गोद के रास्ते तुम्हें गर्भ में भर लूँ

यह कहना कैसी सी शर्म पैदा करता है 
मन दुआओं और प्यार से भरा है
बाबू मेरा
असंख्य लोग, तारें, फूल, कण-कण, क्षण-क्षण 
तुझे दुलारे
ठंडे पड़ जाएं तेरे लिए
सारे अँगारें।








‘अति सूधो सनेह को मारग है’

‘कभी धरती के तो कभी चाँद नगर के हम हैं’ वह कविताएँ लिखता है, प्रेम बुनता है, उसके शब्दों में छिपा अपना ज़िक्र पहचानकर मुस्कुराती भी हूँ| लेकिन मैं इंतज़ार नहीं करती कि अपनी कविताओं में वो मुझे नदी, बहार, बादल या कोई और उपमा दे, मैं बस सोचती हूँ हँसते हुए कितनी मासूमियत से उसकी आँखें मूँद जाती हैं| किसी रीतिकालीन नायिका की तरह मेरी आँखों को झील सी गहरी कहे ऐसी भी कोई उम्मीद मैं नहीं रखती|
मुझे पसंद आता है यूँ ही बीच बात में अचानक उसे कॉम्प्लीमेंट दे देना| रीतिकाल से वर्तमान तक प्रेमिकाओं का रूप वर्णन और प्रेम के कसीदे पढ़े गए हैं, किसी प्रेमिका की नज़र से एक पुरुष(प्रेमी) के रूप सौन्दर्य का वर्णन न के बराबर ही रहा है| मैं कोई स्यूडो फेमिनिस्ट नहीं कि इसे स्त्री उपभोग की वस्तु नहीं कहकर सारे प्रेम पर आधारित साहित्य को हवा में उड़ा दूँ , सच पूछो तो मैं प्रेम को घनानंद की एक काव्य-पंक्ति में परिभाषित मानती हूँ-
‘अति सूधो सनेह को मारग है’
फिर भी सवाल तो उठता ही है ज़हन में कि क्या प्रेम सिर्फ पुरुषों ने किया? या सृष्टि के निर्माण के साथ सारा सौन्दर्य स्त्रियों के हिस्से आया और सारा सौन्दर्य-बोध पुरुषों के| मुझे फूल बहुत पसंद हैं, लेकिन दुकानों में सजे फूल मेरा ध्यान कभी नहीं खींचते| मुझे लगता है फूलों को उनका स्वाभाविक जीवन मिलना चाहिए, उनका वास्तविक सौन्दर्य भी वही है| ठीक वैसे ही मेरा उसके प्रति प्रेम सजावट की वस्तु नहीं, क्यारी में खिला जीवंत फूल है| मैं अनगिनत प्रेम-पत्र लिखना चाहती हूँ, क्योंकि लडकी होकर प्यार करना छिछोरी बात रही है और उसका इज़हार बेहयाई|
प्यार को लेकर समाज से हमारी लड़ाई दोतरफा नहीं चौतरफा है| सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने के लिए संघर्षरत होना अपेक्षाकृत सरल है बनिस्पत इसके कि एक लड़ाई जो निरंतर खुद से लड़ी जानी है. जो डर हमारे भीतर कूट-कूटकर भर दिए जाते हैं, उनसे लड़ना ज़रूरी होता है| दो अलग शहरों में दो जोड़ी नन्हे पैर अपनी पसंद के रंग का आकाश तलाश रहे हैं| मेरी उँगलियों पर जो तेरह शहर उसने गिने हैं, उन्हें बस नक़्शे पर ही नहीं अपनी आँखों से देखना चाहती हूँ| ऊँचे-ऊँचे पहाड़ चढ़ना चाहती हूँ, समंदर की लहरों को घंटों यूँ ही चुपचाप सुनते हुए अपने तलवों तले देर तक महसूस करना चाहती हूँ. बहुत सारी गलतियाँ करना चाहती हूँ, आधी रात किसी चौराहे पर बैठ अन्ताक्षरी खेलना चाहती हूँ, इन सबसे इतर मैं प्यार करना चाहती हूँ| मैं प्यार में दुनिया की सबसे खूबसूरत कविता लिखना चाहती हूँ|
मैं कुछ और नहीं प्यार लिखना चाहती हूँ.

Wednesday, 22 March 2017

अँधेरे और उजाले

"If the feminine issue is so absurd, is because the male's arrogance made it "a discussion”
-Simone de Beauvoir

सभी पुरुष एक जैसे नहीं होते। बिलकुल ठीक. लेकिन सभी स्त्रियों के अनुभव जाने क्यों एक जैसे हो जाते हैं.
सेक्सुअल हैरासमेंट जैसा कभी कुछ मेरे साथ हुआ है ऐसा मुझे नहीं लगता था। बस या भीड़ का फायदा उठाने जैसी हरकतें तो हमें मामूली ही लगती हैं। सड़क के उस पार खड़े कुछ एक मर्दों का भद्दे इशारें या हवा में भौंडे ढंग से चुम्बन उछालना और हमारा मुँह फेरकर गुज़र जाना, ये सब तो हमारी दिनचर्या का हिस्सा हो मानो। यही सिखाया जाता है हमें कि हम एक ख़ास किस्म की बेटियाँ बने जिनपर माता-पिता नाज़ कर सकें. जिनके चरित्र पर विरोध और आवाज़ के छींटें ना हो, भले से सिसकी, घुटन और दबी हुई चीत्कार क्यों ना छिपी रहे.  

मेरी उम्र 24 वर्ष है। मुझे लड़की या युवती जो भी कह लीजिये। पर मेरे अंदर 12 साल की वो लड़की आज भी मौजूद है जिसने घर से स्कूल जाते समय रास्ते में पड़ने वाली सुनसान सड़क पर एक आदमी को अपने सामने पैंट नीचे कर अपना लिंग हिलाते देखा था और भागते-भागते स्कूल गयी थी। कितना भयानक अनुभव था वह। एक सहेली से अपनी घबराहट बतायी तो उसने कहा कि उस आदमी को ठीक उसी जगह उसने भी देखा था और वह रोज़ यही हरकत करता है। उसने अपनी मम्मी को जब यह बात बताई तो उन्होंने कहा कि वह पागल यानी मानसिक रूप से विक्षिप्त है। मुझे भी यह तर्क जँचा, भला कोई सही या भलामानुष अपना ऐसा अंग क्यों सार्वजनिक रूप से दिखाएगा जबतक दिमाग में कोई खराबी ना हो। यह पहली ऐसी घटना थी मैं तयशुदा तौर पर नहीं कह सकती। संभव है इससे पहले मुझे उनकी ओर ध्यान देना सूझा ही नहीं हो। लेकिन इसके बाद मुझे हर नज़र और हर स्पर्श साफ़ समझ आने लगा था। मैं शायद थोड़ी बड़ी हो गयी थी, थोड़ी ज़्यादा सतर्क। चौकन्नी। जैसे सब लड़कियाँ हो जाती हैं। सिमोन ने जैसे कहा है "औरत पैदा नहीं होती बल्कि बन जाती है'' या यूं कहिये कि बना दी जाती है. 

इसके बाद मुझे याद आता है कि मैं ग्यारहवीं क्लास में थी, उन्हीं दिनों हमने नयी जगह शिफ्ट किया था। मैं और मेरी बहन रात को करीब ग्यारह बजे छत पर घूम रहे थे और हमारे घर के सामने वाले घर में किराए पर करीब 35-40 साल का आदमी रहता था। दूर से दिखाई दिया कि वह अपने कमरे में पूरी तरह निर्वस्त्र घूम रहा था। हमारा ध्यान उस तरफ गए कुछ सेकेंड्स ही हुए होंगे कि उसने दरवाज़े पर आकर हस्तमैथुन करना शुरू कर दिया। और एक बार फिर हम घबराकर छत से नीचे उतर आये। दिन के उजाले में भी वह आदमी दिखाई देता था और उसका बर्ताव देखकर खुद पर ही शक़ होता कि जो देखा था वो सच था भी या नहीं। इतना दोहरा चरित्र ! वह उम्र बहुत नाजुक दौर था जब इस तरह के वाकिये बहुत डराते थे। बाहरी दुनिया, रात को घिरता अँधेरा, सुनसान सड़क, भीड़ वाली बस, सँकरे रास्ते यहाँ तक कि बराबर से गुज़रती कार, गाडी, ट्रक भी डराते थे। ट्यूशन जाते हुए ध्यान देते कि कहीं कोई पीछा तो नहीं करता, रोज़ एक ही रास्ते से नहीं जाना चाहिए जैसी सलाह। और भी कितना कुछ। फिर एक वक़्त ऐसा भी आया कि मैंने घूरकर, हाथ झटककर, डपटकर कितनी ही बार अपनी तरफ बढे हुए हाथों को रोका. राजीव चौक की भीड़ में कौन उतरते हुए कमर पर हाथ फेरते हुए निकल गया, पलटकर देखने पर सिर्फ भीड़ ही दिखती है। घुटन और गुस्से से उबलता हुआ चेहरा रोनी सूरत में बदल जाता है। फिर लगता है चारों तरफ साज़िशें हैं, कि हम आगे ना बढ़ पाएँ। ऐसे अनुभव लड़कियों में गहरी घनिष्ठता का कारण भी बनते। हम एक दूसरे के अनुभव सुनते और सहमते हैं।

आँसुओं से भीगा चेहरा। फफसते होंठ। और बचपन की एक भयानक याद। लड़की कोई छः सात साल की रही होगी जब उसके फूफाजी उसे पुचकारते और फुसलाते हुए अकेले में ले जाते और उसके हाथों में अपना शिश्न पकड़ा देते और खुद लड़की को मसलते रहते।

और भी जाने कितनी ही बातें हम एक-दूसरे के अनुभवों में जीते और साथ रोते हैं। बलात्कार की तकलीफ समझने के लिए एक लड़की को ज़रूरी नहीं की ठीक उसी प्रक्रिया से गुज़रना हो बल्कि एक भद्दी नज़र भी उस एहसास तक पहुँचाने के लिए काफी हो जाती है। ये अनंत सिलसिला है. बचपन में खेल-खेल में लड़के कुछ ऐसे खेल ढूंढ निकालते थे जिनमें दबी-छिपी यौन अभिलाषा झांकती थी, वक़्त के साथ कुछ सम्मान और समता का भाव सीख गए तो कुछ  नैतिक दबाव के चलते संभल गए लेकिन ‘लोलिता’ उपन्यास की तरह कितने ही हम्बर्ट हमारे समाज में हैं जो अपनी यौन अभिलाषाओं के वशीभूत हैं. काउंसलिंग की ज़रुरत सिर्फ लड़कियों को ही नहीं बल्कि उससे कहीं ज्यादा लड़कों को है . इस उम्र में उत्तेजना या भावुकता और काम के प्रति उत्सुकता स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है. यहाँ पर सही ढंग से बात ना करना ही भटकाव का कारण बनता है. मैरी कॉम अपने अनुभव बांटते हुए कहती हैं कि वे अपने बेटों को बतायेंगी कि एक औरत के शरीर कि नियति यह नहीं है कि वह अनचाहे ढंग से छुई जाए या मसली जाए बल्कि हम औरतें ठीक तुम्हारे जैसी है बस फर्क है तो शारीरिक बनावट का.

मेरे जीवन का एक और दर्दनाक वाकया यौन उत्पीडन से जुडा है. सामान्य तौर पर यह मान लिया जाता है कि यौन उत्पीडन की शिकार केवल महिलाएँ होती हैं. ऐसा नहीं है. मेरा एक बेहद करीबी दोस्त जो कॉलेज में पढ़ रहा था. हॉस्टल में रोज़ाना इसका शिकार हो रहा था.  हॉस्टल का ही एक अन्य लड़का जबरन उसके साथ अप्राकृतिक सम्बन्ध स्थापित करता. प्रताड़ना इस क़द्र बढ़ गई कि आखिरकार उसने आत्महत्या कर ली. मैं सोचती हूँ वह क्यूँ नहीं कह पाया. क्यों नहीं विरोध कर पाया. क्यों नहीं खुद को बचा पाया. लडकियाँ नहीं बोल पाती, वह भी नहीं बोल पाया. हम क्यों नहीं बोल पाते? क्या है जो हमें रोकता है? 12 साल कि वो लड़की यानी मैं अपनी माँ से इसलिए नहीं कह पायी थी क्योंकि किसी पुरुष का लिंग देख लेना “गंदी बात” थी. हम डरते हैं, ये डर हमारे अन्दर कौन छोड़ जाता है. किससे डरते हैं हम? हम सब भीड़ में छूट गए वे बच्चे हैं जो घर ढूंढते हुए ज़ख़्मी हो चुके हैं. और घर कहीं नज़र नहीं आता. नज़र आता है बीहड़. और इस बीहड़ में निहत्थे हम. इस हिंसक दौर में सोच पर हमला करोगे तो शायद चुप हो जायेंगे लेकिन इस देह को किस तालाब में डुबोकर जिएँ!

यौनिकता पर इतना पाखण्ड है हमारे बीच कि एक तरफ स्त्री देह को ऑब्जेक्ट बना दिया है हर तरफ दीवारों पर यौन क्षमता बढाने वाले दवाखानों के इश्तिहार छपे हैं. हमारी देह कोई एक चीज़ नहीं है बल्कि एक ऐसी स्थिति है जो बाहरी दुनिया को लेकर हमारी समझ और हमारा खुद को प्रस्तुत करने का तरीका है. यही कारण है कि स्त्रियाँ अपनी देह, अपने शरीर के प्रति अत्याधिक सजग हैं. वहीँ दूसरी तरफ अपने दम्भी पौरुष के साथ खड़ा पुरुष स्त्रियों के लिए, आक्रामक और तिरस्कारपूर्ण दृष्टि रखता है.   

Thursday, 2 March 2017

आवाज़ें

जैसे पुराने बंद पड़े मकानों में
क़ैद रह गयी
आवाज़ों को पकड़ने की कोशिश
या शायद कसकर कर लेना कानों को बंद
कुछ कहते कहते अचानक जीभ का
दाँतों के बीच कुचला जाना
और धत्त बताना खुद को
कि अच्छा हुआ जो नहीं कहा
दुखाया जो दिल किसी का
सज़ा मिली.

Monday, 20 February 2017

अतिथियों लौट जाओ

अनुत्तरित सवालों पर खेद जताया

कई दोस्तों को व्हाट्सएप्प किया
कईयों की नाराज़गी उठायी 
अपनी लगातार अनुपस्थिति 
के कारण गिनवाएं
बेहिसाब सच के साथ कई झूठ बोले

जो कहती कि 
नहीं थी उपस्थित खुद अपनी देह में भी 
तो नहीं करते यकीन
सो गिनवाई व्यस्तताएँ

फिर एक रोज़ जब वे सब लौट आए
मैंने ताला लगा लिया भीतर से
और खूब हँसी
किस पर?
खुद में एक और शख्स का उग आना
वे दरवाज़े पीट रहे थे
मैं खुद को बचा रही थी

मैं बंद अँधेरे कमरे में 
अवांछित उपस्थितियों से घिरी थी
वे बाहर भीतर सब जगह थे
वे कहीं नहीं थे

ये मेरा निमंत्रण था
अतिथियों लौट जाओ।  

Saturday, 18 February 2017

हर उस जगह से खुद को हटाया
कि करो मुझे याद
याद नाम प्यार का

डिअर मैं और मेरी तुम

तुम हमेशा वैसी लड़की रही हो जैसी मैं होना चाहती हूँ, मैं तुम्हें बहुत पसंद करती हूँ इसीलिए जब भी परेशान होती हूँ तुम्ही को चिट्ठी लिखती हूँ। तुम्हे सारे जादू आते हैं, तुम कन्धों पर पंख लगाना जानती हो। मैंने हमेशा ही तुम्हें अपने सबसे करीब पाया है। आज फिर कुछ अजीब हुआ, तुम्हारे सिवा कौन है जिसे यह बता सकती हूँ। जानती हूँ कि जानकार तुम परेशान हो जाओगी लेकिन जानोगी नहीं तो मुझे बचाओगी कैसे। एक मामूली सी घटना है लेकिन जाने क्यों मैं घबरा गयी हूँ बहुत।
आज चलते-चलते ठोकर लगी और पाँव का नाखून उखड गया। खून भी बहा लेकिन दर्द नहीं हुआ। सच देखने में चोट जितनी गहरी थी उतना दर्द नहीं हुआ। फिर भी मैं फफककर रोई। मुझे ठोकरें खाने पर, बस के पीछे दौड़ते हुए और बाज़ार से सामान लाते हुए बोझ से उँगलियों में होने वाले असहनीय दर्द के बाद रुलाई फूटती है। कभी कभी गुस्सा आता है उन लड़कियों पर जो कहती हैं पति के पैसों पर मौज उड़ायेंगी, और सच कहूँ अपनी हालत देखकर घर बैठी गृहिणियों से भी रश्क़ होता है कि कितनी सुलझी और तयशुदा ज़िन्दगी है इनकी। रोज़ की वही एक दिनचर्या।
मैं नहीं चाहती ऐसे सोचना, मुझे मैं कमज़ोर भी लगती हूँ। एक पैर पर खड़े होकर मोची से चप्पल सिलवाते हुए सोचती हूँ कब उतना खाली वक़्त होगा जब घंटें गिनकर नहीं सोना होगा। जब समय निकालकर किताबें नहीं पढ़नी होगी बल्कि किताबों के बीच से ही रास्ते गुज़रेंगे। फिर तुम्हें देखती हूँ, कैसे तुम फाइल्स के बीच छिपाकर अपने मन की करती हो, कैसे आँख झपकते ही जंगल, पहाड़ और समंदर देख आती हो। तुम पंख लगाती हो और मैं अपने नाजुक कंधों को सहलाती हूँ। ये चिट्ठी किसी लाल डब्बे के हवाले नहीं करुँगी, अपने तकिये के नीचे रखकर सो जाऊँगी, ताकि जब सुबह तुम उठो तो मेरे रात के आँसू तुम्हारी सुबह की मुस्कान बन सकें।
यूँ खुद को भी तो कभी चिट्ठी लिखी जानी चाहिए कि बता सकें उस शख्स को जो हमेशा हमारे साथ है और हमें सबसे अच्छी तरह समझता है उसे हम कितना प्यार करते हैं।
तुम हमेशा याद रखना मैं तुम्हें, तुम्हारी ताक़त के साथ साथ तुम्हारी कमज़ोरियों को भी उतनी ही शिद्दत से चाहती हूँ क्योंकि तुम दुनिया में सबसे ताक़तवर होने की होड़ में नहीं हो।

-तुम और तुम्हारी मैं


कसैला स्वाद प्यार का

झुकती कमर पर
घन बजता रहा
लगातार
धम धम धम
सर पर होते वार कई
कि झुके कमर
आंसू नहीं दिखे जिन्हें,
कवि थे
दुःख एक कविता था
आसमान उड़ान सपने
कुल मिला कर
जिंदा रहने का सारा सामान था उनके पास
जो कुछ नहीं था वह होगा
तो क्या सज़ा मुकम्मल हो उन्हें
जो हो गए दुनिया
काम बहुत था
वक्त ज़रा कम
और प्यार
वह शायद नहीं था
प्यार ना मिलने की शिकायतें थी बहुत
प्यार से चिढ के साथ
एक बैग भरा था प्यार से
काँटे उसके चुभते थे आँख में
खूँटी पर टांगकर उसे
उसी दीवार को ताका
आँख से बहता है ख़ून
प्यार नहीं रे बाबा
मैंने पढ़े हैं वे प्रेम पत्र
जहाँ पत्र ना पात्र रूप
एक पत्र का इंतज़ार
मांगी हर चीज़ हाथ फैलाकर
भीख मिली किश्तों में
देने के हर भाव से भरी
लेना यूँ खला बहुत
तुम्हारी बात भीख
तुम्हारी आवाज़ भीख
तुम्हारा समय भीख
तुम्हारा प्यार भीख
अपने से आँखें उठाकर मैंने जब जब देखा
वहाँ ध्यान था, लाड-प्यार था
कैसे कमाते हैं लोग प्यार इतना
मैं झुकी यूँ हर बार
कि हाथ ना छूटे
चाहा तो यूं था कि
हर सपने को सुन तुम उसका हिस्सा बन जाते
हिस्सा मैंने बनाया
तुमने बस तोड़ा
दुख टकटकी लगाए देखता है
कि उसके हिस्से आई सिर्फ और सिर्फ  वितृष्णा
प्यार की उदात्तता जो पाखण्ड हो सकती है
से इनकार है
ईमान को बचा ले जाएँगे
कि दोष सारा तुम्हारा
कि प्यार सारा मेरा

स्त्री नहीं थी मैं
देह बचाती आत्मा खोकर
एक लड़की प्यार में
बिछती रही
आत्मा बचाने को
आँसू जिन्हें दिखते नहीं
स्तन उनसे छिपा लिए गए

कसैला स्वाद प्यार का
हलक पे पत्थर
ना
प्यार नहीं रे बाबा। 

Wednesday, 8 February 2017

जैसे शाम

दिन का उजाला
सृजन को बेधता था
रातें काले सांप सी
मुझे
एक लंबा सांप
लिपटकर मेरी देह से
नापता हर इंच
कि निगल सके
समूचा

यूं रातें आती
और दिन चढ़ता

मैं निगलती बेबसी को
करती इंतज़ार
कि सुकून चलकर आए मेरे पास

वे सारी पीठें जो हर रोज़ रगड़ खाती हैं मुझसे
घिन्न भी उतनी तीक्ष्ण नहीं अब तो
कहीं आदत तो नहीं

आदतें एक दिन पैटर्न बन जाती हैं
उनका कोई ख़ास मतलब हो ज़रूरी नहीं
वे बस होती हैं
और हम ढलते जाते हैं
जैसे शाम .  

Thursday, 2 February 2017

ओ नदी, बीच सड़क

मत रोना दोस्त
स्पर्श के अभाव में
उस ओर 
सुना है
दरवाजें नहीं होते 
जो रोक सकें 
होते हैं पर बंधन 
न पहुँच सकने के 
ऐसे अज्ञात में
जैसे हो आकाश बिना पंख 

खो देना पंख 
चुनाव भी तो सकता है हो 
मृत्यु हो सहेली
एक सखी चाँद की 
रहती है 
बहती है
सहती है 
ओ नदी, बीच सड़क 

मायने हैं कुछ जीवन के क्या 
मृत समक्ष 
 जीत के 
या सफलता के 
स्वयं समक्ष रिरियाते जीवन भी क्या 
'मृत्यु' से नहीं कोई आशा 
'अंत' से है जुडी
सब कुछ अंततः ख़त्म होगा 
आगे पडा शेष जीवन 
पीछे होगा 

जिसे दबे पाँव आना था 
डरते हुए 
कि है ये अपराध 
उसे यूँ पाला गोद में 
पुचकारा जैसे बेटी 
मैंने हर उस शख्स की हत्या की स्वप्न में 
जिसे चाहा कि वो रहे 

बर्फ पर लिखा जीवन 
रात भर देखा उस टुकड़े को 
फिर उगा सूरज.

Wednesday, 1 February 2017

गुनाहों का देवता - आँसुओं से भीगी एक प्रेम कहानी

गुनाहों का देवता-आँसुओं से भीगी एक प्रेम कहानी



गुनाहों का देवता- बगीचे में नरम घास पर लेटकर बादलों को देखती हुई दो सहेलियाँ- सुधा और गेसू . सुधा जो ज़िन्दगी को यूँ ही बादलों को देखते हुए बिता देना चाहती है और गेसू जो अपनी मंगनी हो जाने से बेहद खुश है.
हँसी ठहाकों के बीच सुधा का गेसू से यह पूछना कि हम लड़कियों को शादी-ब्याह से मुक्ति क्यों नहीं मिलती मुझे आज भी उतना ही प्रासंगिक लगता है जितना १९४९ में प्रकाशित धर्मवीर भारती के उपन्यास ‘गुनाहों के देवता’ की सुधा के लिए है या जितना १९३७ में प्रकाशित जैनेन्द्र के उपन्यास ‘त्यागपत्र’ की मृणाल के लिए था. लड़कियों के जीवन में तमाम अनिश्चितताओं के बावजूद अगर कुछ निश्चित मान लिया गया है तो वह है शादी !
चंदर और सुधा की कहानी पढ़ते हुए अगर 17 वर्ष की उम्र में आप बिलख-बिलखकर रोये हैं और सात वर्ष बीत जाने पर उसे कच्ची उम्र का असर मानते हैं तो एक बार फिर पढ़िए, पीड़ा के उन क्षणों में फिर उतरिये, मेरी तरह आप भी पायेंगे कि रोना बिला वज़ह तो नहीं आया था. वे आँसूं जो सुधा के लिए सुधा के साथ बहाए गए हैं वे कितने सच्चे और कितने पवित्र थे. गुनाहों का देवता पढ़ते हुए पम्मी का जीवन भी कुछ कम ध्यान आकर्षित नहीं करता, ‘एक कहानी लिखने के लिए कितनी कहानियों की ट्रेजेडी बर्दाश्त करनी पड़ती है’ पम्मी का चंदर को बोला गया यह वाक्य उसके जीवन का फ़लसफ़ा है. और मानुषिक जीवन का भी.
सुधा के बारे में जब भी सोचती हूँ, समानांतर रूप से मृणाल मेरे साथ चलती है . ‘मैं चिड़िया होना चाहती हूँ’ जैसी मासूम इच्छा वाली मृणाल. माता-पिताविहीन एक बच्ची, जिसने चुनाव किया, प्रेम किया, सही-गलत, पाप-पुण्य, नैतिक-अनैतिक की सामाजिक परिभाषाओं को एक फूँक से उड़ा दिया. खुद को बर्बादी के मंज़र तक धकेला पर अपनी चिड़िया होने की ख्वाहिश को आकाश दिया. सतरंगी पंखों वाली चिड़िया , मृणाल ! जाने क्या समानता है दोनों लड़कियों में कि इनसे दिल जुड़ जाता है. इसी समानता के लिए अज्ञेय ने लिखा होगा ‘जहां दुःख है/वहाँपर एक सुलगन/ पिघला कर हमें/ फिर जोड़ देती है.’ यहाँ यह दुःख ही है जो सुधा और मृणाल दोनों को एक ही धरातल पर ला खडा कर देते हैं.
भारती जी के शब्दों में ‘दुबली-पतली, नाटी सी साधारण-सी बहुत सुन्दर नहीं, केवल सुन्दर लेकिन बातचीत में बहुत दुलारी’ सुधा! पिता के सामने छोटी बच्ची जैसे जिद्द करती, और चंदर की माँ बन ध्यान रखने वाली सुधा ! जिसका ह्रदय विश्वास से भरा हो, ऐसा विश्वास जिसे बड़े से बड़ा तूफ़ान भी डिगा ना सके. चंदर को दिए वचन के साथ जो सच में इतनी ऊंचाई पर पहुँच गई जहां से खुद चंदर भी उसे नहीं छू सकता था.
मेरी तरह आपके दिल में भी सुधा के लिए वही दुलार उमड़ता होगा जो अपने आस-पास फुदकती किसी भी इठलाती, अल्हड़ता की आड़ में छिपी समझदार लड़की के प्रति उमड़ता होगा. जैसे कोई बचपन की साथी, जिसके साथ स्कूल में सबसे पीछे की लाइन के बेंच पर बैठकर छिपकर खाना खाया हो और मुँह दबाने पर भी हँसी का फव्वारा फूट पडा हो. जिसके साथ क्लास से बाहर निकाल दिए जाने पर भी आँखों की चमक फीकी ना पडी हो.
जिसके साथ कविताएँ पढ़ी हों, पहले-पहले प्यार की चुहल और छेड़ की हो. वही बचपन की सहेली सुधा जब दर्द से चीखती है तो कलेजा मुँह को आता है (यकीन मानिए कलेजा मुँह को आना का प्रयोग मैं पहली बार किसी घटना के लिए कर रही हूँ) और मैं आगे पढ़ते हुए घबराने लगती हूँ. नहीं सुधा के साथ ये नहीं हो सकता. ये वही पल था जब हॉस्पिटल में किसी अपने की चीखें आपको नास्तिक होते हुए भी एक मूर्ती के सामने हाथ जोड़ने पर विवश कर दे.
सुधा की चींख, कराह और चंदर के लिए पुकार कितनी रातों तक मेरे कानों में गूंजती रही. एक रात में किताब पढ़कर जब ख़त्म की तो सर भारी था, चेहरा आँसूओं से भीगा हुआ. सुधा जा चुकी थी. अगले दो दिन मातम में बीते, मैंने किसी अपने खो दिया था. यह कोई एतिहासिक कृति है ऐसा कोई दावा नहीं लेकिन असह्य पीड़ा की जो अनुभूति अपने पात्रों के साथ भारती जी पाठकों को करवा गए हैं वही इस उपन्यास की खासियत है.
संदेह, मांझे सा उलझा मन, खालीपन, आदर्शवाद, विश्वास और अविश्वास की जंग, अपराधबोध और सुधा की मृत्यु यही सब रहा जिसने आदर्शवाद की तलाश में फँसे एक युवक को गुनाहों का देवता बना दिया. हमें प्रेम का जो आदर्शवादी स्वरुप बताया जाता है वो उस ऊंचाई पर स्थापित है जहाँ से मनुष्य चोट ही खाता है. प्रेम बराबरी और साहचर्य है ऐसा कोई नहीं सिखाता. लेकिन प्रेम में त्याग और पवित्रता की बातें करना-सुनना हम सभी को पसंद आता है.
प्लूटोनिक लव की जो भावना चंदर और सुधा के बीच पनपती है वहाँ छिछलेपन के लिए कतई जगह नहीं थी. सुधा को किसी और से शादी के लिए मनाते हुए चंदर सुधा से पूछता है ‘हम लोगों ने स्वर्ग की ऊंचाइयों पर साथ बैठ कर आत्मा का संगीत सुना सिर्फ इसलिए कि उसे अपने ब्याह की शहनाइयों में बदल दें?’
प्रतिउत्तर में सुधा भी एक सवाल पूछती है- ‘मैं जानती हूँ कि मैं तुम्हारे लिए राखी के सूत से भी ज़्यादा पवित्र रही हूँ, लेकिन मैं जैसी हूँ मुझे वैसी ही क्यों नहीं रहने देते? मैं शादी नहीं करुँगी.’ प्रेम में देवत्व का जो आदर्श चंदर स्थापित करना चाहता था उसमें वह सुधा को साधारण लड़कियों की तरह भावुक नहीं देखना चाहता था वह खुद से सवाल करता है कि कहीं उसने सुधा का गलत मूल्यांकन तो नहीं किया ! कहीं सुधा में भी प्रेम और घृणा का स्तर सामान्य तो नहीं है !
प्रश्न है यह मूल्यांकन क्यों? देवत्व की चाह क्यों? सुधा की बलि देकर कैसा देवत्व ? सुधा की रुखाई पर भी चंदर सोचता है कि लड़कियां भावनाओं की बनी होती हैं, साधना करना उन्हें आता ही नहीं क्या . दूसरी तरफ वह यह भी भलीभांति जानता है कि सुधा उसकी आत्मा है और वह खुद अपने हाथों से अपनी आत्मा को घोंट रहा है. एक ह्त्या का पाप उसके सर चढ़ सकता है.
प्रणय-विवाह और त्याग-पवित्रता के अंतर्द्वंद में फंसा चंदर दरअसल साधारण नहीं हो पा रहा. यह देवत्व की चाह मनुष्य को मनुष्य नहीं रहने दे पाती. वही चंदर जो सुधा को त्याग और पवित्रता की राह दिखाता है आगे चलकर बिनती से कहता है कि कोई भी लड़की कितनी भी प्रतिभाशाली क्यों ना हो प्रेम में शरीर की चाह रखती ही है. सुधा का वैवाहिक जीवन के प्रति दुःख भी उसे एक ढोंग जैसा प्रतीत होने लगता है.
दरअसल हमेशा से सेक्स को भारतीय परिवेश में जिस नज़र से देखा गया है वही कंडीशनिंग पाकर चंदर उसे प्रेम का निकृष्ट रूप मान बैठा. बिनती के सेक्स को खाने-पीने-हँसने-बोलने जितनी एक स्वाभाविक प्रक्रिया कहने पर चंदर सोचता है – ‘ज़िन्दगी यह है-मांसलता और प्यास और उसके साथ-साथ अपने को छिपाने की कला…’ अपने अंतर्द्वंदों में फंसा चंदर खुद भी संवेदना का पात्र है- लड़कियों की कोमलता से उसे वितृष्णा सी होने लगती है –‘औरतों के रोने की कहाँ तक परवाह की जाये , वे कुत्ते, बिल्ली तक के लिए उतने ही दुःख से रोती हैं.’ चंदर की कटुता उसकी ज़द्दोज़हद का ही नतीजा थी.
वहीँ दूसरी ओर गाँव से आई छुईमुई लड़की बिनती जो अपनी बुआ से डांट खाकर रो दिया करती थी अब दबंगई के साथ अपनी बात कहने लगी और शादी करने से साफ़ इनकार कर दिया. और अपने स्वाभिमान की रक्षा की ज़िम्मेदारी खुद उठा ली. चंदर के व्यक्तित्व को गढ़ने में एक और कड़ी बनती है पम्मी. जिसके बाहुपाश में चंदर को एहसास होता है कि केवल सेक्स की इच्छा रख लेने भर से कोई निकृष्ट कोटि का नहीं हो जाता.
चंदर को देवता का स्थान देने वाली सुधा , जिसने कभी प्रेम का प्रतिदान नहीं चाहा. पीड़ा के अंतिम क्षणों में भी केवल चंदर को पुकारती है. उसके निश्छल प्यार ने कहीं ना कहीं चन्दर के प्रेम, प्रणय, पवित्रता और त्याग के आदर्शों को बौना बना दिया. आसुओं से भीगी यह प्रेम कहानी आत्मा को छीलती है और सवाल खडा करती है कि क्यों मनुष्य के नाजुक और भावात्मक कन्धों पर देवत्व का बोझ डाला जाता है. क्यों हमें कीचड भरी ज़मीन पर खड़े होकर सतरंगी पतंग उड़ाने को विवश किया जाता है और क्यों आखिर लड़कियों का जीवन लड़कियों जैसा तय कर दिया जाता है.

Wednesday, 18 January 2017

दुःख कहीं नहीं

दुःख क्या है   ?

कहीं दुःख नहीं
सुख से मरी जा रही है दुनिया 
ये अघाये हुए लोग 
दुःख खोज रहे हैं 
और दुःख 
वो कहीं नहीं है 

छिपना चाँद जैसे 
कि अँधेरे में सोये दुनिया 
वही है अनुपस्थिति 
तारों में 
एक तारा जो टूटा 
तो मांग ली अपनी ख़ुशी 
मरे हुए पर 
कहानियाँ जिन्हें कहते हैं यातना 
और कुछ नहीं वही ख़ुशी है तुम्हारी 

क्योंकि दुःख 
दुःख कहीं नहीं। 


जाना हुआ नहीं

माथे पर शिकन तक ना पड़े
इतना सधा हुआ स्वाद
रोज़  हर रोज़
एक कप चाय
ऊब नहीं होती
एक ही खिड़की से देखते हुए
ठीक उसी इंसान को
जो भागा था एक रात
क़त्ल का खंजर पीठ में छिपा कर

 उस छोटी लड़की के पास से गुज़रना
जो गिनकर खाती थी बादाम
और कुछ याद नहीं रख पाती थी
वो जो अब तारीखें गिनाती है
इति से खेलती है
भव को डराती है


 रेल की पटरियों पर
खच-खच टुकड़ों में कटती
वो डोर पतंग की नहीं थी
और जो शब्द है झूठे
या काल्पनिक
फरेबी उन्हें चबा जाएँगे
बहुत दिनों तक याद किया जाएगा
उनका फरेब
इतिहास

उनकी चिट्ठियों पर चिपक जाएँगे
खून से लिथड़े होंठ
चूमेंगे ऐसे जैसे अपनी लाश
कि लिखना नहीं गुड़िया
ये घाव हैं
रुक जाना
जाना रुक

कि
जाना हुआ नहीं।

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...