ऐसे बहुत से महीने थे
जिन्हें बीत जाने के लिए ही आना था
पर वे ठहरे रहे
हमेशा हमारे बीच
कुछ चुनिंदा दिनों की तरह
जैसे चुन लिए जाते हैं
दुःख.
पिता की हत्या के बाद
हाथ धुलाती और मूँह पोंछती माँ
नहीं बताती कि हाथ पर लगा रंग खून है
उँगलियों में दौड़ती कंपकंपी डर है
तुम्हारे गुनाह सारे मेरे पूण्य हैं.
महीनों को मौसमों से पहचानना गलत साबित हुआ
दिसंबर में हथेली भीगी रही
जून में देह सिकुड़ी रही
कई रंगों को मिलाने पर भी नया रंग नहीं बना
चौथे माले पर चढ़ते हुए पिता की
घुटती आवाज़, झुके हुए कंधे, लाल चेहरा,
गहरी साँसें
इतनी गहरी जैसे मेरी छाती में कोई फूंकनी से अंगारों को और भड़काए
तय हुआ कि इस व्यक्ति से युद्ध नहीं किया जाएगा
ये नन्हा सिपाही इसका रक्षक होगा
सदा सदा के लिए
सिपाही जिसे बस युद्ध की शिक्षा मिली
अपने पाठ खुद पढता गया
रास्ते में मिली उपेक्षा को
एक उंह से उड़ाकर आगे बढ़ा
आगे बहुत लंबा रास्ता था
सिपाही डरा
साँप सा लंबा रास्ता
उसे अपने कंधे पर बहुत बोझ मालूम हुआ
कन्धों पर बोझ हो तो लंबा हो जाता है कोई भी रास्ता
उसने बन्दूक उतारी और झाड़ियों में फेंक दी
अब हल्का सा लगा कुछ
कुछ फलाँगें लगाई
मानो अभी उड़कर सूरज की गोद में जा बैठेगा
सिपाही रास्ता तय करता रहा
कैलेंडर छूट गए
घडी, तारीख, महीनों और मौसमों का हिसाब छूट गया
उन सब पैमानों को,
जिनसे आंका जाता है
इंसान के वजूद को
वो कब का झाड़ियों में फेंक आगे बढ़ चुका था,
कंधे का बोझ.