Tuesday, 24 November 2015

क्यों कभी वह खलनायिका नज़र नहीं आती !

कितने प्यारे होते हैं वे प्रेमी
जो हमारे नाम दुनिया-जहां का दुःख लिख जाते हैं
नहीं बोलते सांत्वना के अर्थहीन व बेजान कोरे वाक्य
नहीं करते प्रतिरोध ख़ुद को निर्जीव समझ लिए जाने का
वे जानते हुए कि नहीं बने रह सकते अब हमारा हिस्सा
नहीं निकालते खंज़र हमारे जिस्म से बाहर रोज़ थोडा-थोडा
वे इतना दुत्कारते हैं  कि
दुःख की मियाद पूरी हो सके
जो रोज़ लतीफे पढ़ते हैं मजबूरियों के
क्या दुःख कम कर पाते हैं !
दिन - महीने - साल उसी गर्त में धँसे हुए
बिताने को अभिशप्त किए रखते हैं
जब लौटाया जाता है वह सारा सामान
तो क्या बीता हुआ समय, भावनाएँ, प्यार
सबकुछ लौटा दिया जाता है !

उसे सोचते हुए. . .
क्यों कभी वह खलनायिका नज़र नहीं आती !


Monday, 26 October 2015

इस ब्लॉग को जब 2010 में बनाया गया था तो मेरी उम्र 18 वर्ष थी , साहित्य से परिचय था पर एक आत्मीय रिश्ता  बनना अभी बाकी था। खुद में सिमटे हुए से, बाहरी दुनिया से सहमे से लेकिन ऊर्जा से लबरेज़ वे कॉलेज के सुनहरे दिन थे। तब दोस्तियाँ आखिरी सांस तक निभाने के वादे थे , भविष्य के बड़े-बड़े रोडमैप थे, लगता था जीवन को पूरी तरह समझ चुके हैं बस अब इस रोडमैप पर चलना भर है। असाइनमेंट्स , प्रोजेक्ट्स , परीक्षाएँ, कक्षाएँ, कैंटीन, लाइब्रेरी, समोसा और चाय यही सब काफी हो जाया करता था। आज खुद अपनी उस मासूमियत पर प्यार आता है। पुरानी तस्वीरें देखकर उस भोलेपन को याद कर आँखें भर आती हैं। उन्हीं दिनों ज़िन्दगी की सबसे बड़ी नेमत को बहुत करीब से देखने का दौर शुरू हुआ... मैंने किसी को प्यार में पड़ते हुए देखा। उस उम्र में प्यार को जिस तरह समझा जाता है, ठीक वैसे ही समझा मैंने भी। प्यारा और खूबसूरत!  लड़की के चेहरे पर नूर था कि दिनोंदिन बढ़ता ही जाता था और लड़के की वैचारिकी और भी पैनी और भावपूर्ण होती जाती थी। दोस्त छेड़ते थे , ये लजाते थे। दिन बीतते जा रहे थे और ये किताबों में फूल खिला रहे थे। किताबें ताउम्र अपनी पनाह में रख पाती तो अच्छा था। खैर इसका ज़िक्र फिर कभी.… तब इस ब्लॉग को बनाते हुए सोचा था यहाँ केवल साहित्य , समाज और राजनीति होगी , अपने व्यक्तिगत जीवन को यहाँ लेकर नहीं आना है। पाँच सालों में पता चला कि खुद के अनुभवों से अलग कुछ है ही नहीं ! पता नहीं हम जीवन से मृत्यु की तरफ बढ़ते हैं या मृत्यु से जीवन की तरफ। बस इतना तय है कि जहाँ अभी इस पल हैं , दुबारा वहाँ नहीं होंगे। कितनों को पुकारना था  , कितनों के पुकारने पर लौट जाना था। इस गुज़रते समय का सच ये है कि खुद ही खुद के गले लगकर रात भर रोते हैं.…आज़ादी आज़ादी चिल्लाते हुए गला सूख जाता था अब इतनी दूर निकल आये हैं कि कुछ ऐसा बचा ही नहीं जो बाँधता हो। अब 2015 के अंत के करीब पहुँचकर लगता है नेमतों को दूर ही से सलाम कर नहीं समझा जा सकता....!

अपना कोना !

Friday, 16 October 2015

. 2

बहुत दर्द होता है
दुःख नहीं कहा जा सकता इसे
ये दर्द ही है
थूक को बामुश्किल सटकते हुए
ऑंसुओं को घोटते हुए
समझना उस हर स्थिति को
जब नहीं रखा गया हमारा ख़्याल
जब सिखाया गया कि कितना ज़रूरी है ख़ुद की परवाह करना
तब क्यों नहीं बताया गया
कि इस क्रम में भी तुम बहुत बाद में हो
कि करनी पड़ती है कोशिश तुम्हे देखने के लिए
नायकत्व की कोई चाह कभी नहीं रही
एक बेहद साधारण सी ज़िन्दगी
जहाँ सिमोन को साथ लेकर
आलू और प्याज़ के बढ़ते दाम पर भी करना था गौर
पर ख़ुद अपनी कहानी में भी
हाशिये पर धकेल दिए जाने का दर्द
ख़ुद की कलम भी जब कहे कि तुम कौन?
सारे शब्द पहचानने से इनकार कर दें जिन्हें ख़ुद हमने चुना था
और अभी इस क्षण
हर एक हर्फ़ धुंधला है
कि कुछ है जो मिट नहीं सकता
कि कुछ है जो मिट जाएगा
कि जानते हुए भी सब कुछ मैं अनजान ही हूँ
अब क्यों लगता है कि क़त्ल की तैयारी है
और सबसे नर्म गर्दन पर ही चलेगी धार !

Wednesday, 14 October 2015

आत्महत्या

अद्भुत मुखौटा है
हँसता  है और
आँखों से लहू बहता है
उसे सज़ा मिली है
सज़ा मुस्कुराने की
मासूमियत की परतों को छील देती है
सिद्धांतों की धार
अपना सही बचाते बचाते एक दिन
हम गलत हो जाते हैं
और हमारे हिस्से सजाएँ आती हैं
फिर भी कहा जाता है
कि करो ख़ुद को साबित
निरपराध
विचित्र चुनौती है
सज़ा से भी कम नहीं होते गुनाह
गुनाह जो कभी किये ही नहीं गए
एक झरना फूटता है
पिघलती रौशनी का झरना
आदर्शों से भरी दुनिया में
सिमटता है सबकुछ
एकांत है
खामोशी
एक लम्हा आकर पास बैठ गया
सुनाने लगा कहानी अपनी
आँख से लहू के आँसू धुल जाए शायद
और वही नमकीन पानी फिर बह निकले
आज वह अपनी सज़ा की आख़िरी किश्त अदा कर रहा है
वह मुस्कुराता है
इस आदर्शों, सिद्धांतों से भरी मूल्यविहीन दुनिया पर
पहचानता है खुद के कुछ मूल्य
जो उसके अपने हैं
एक घटना ही तो है
आत्महत्या !
  

Saturday, 3 October 2015

.

और यूँ ही एक दिन एक कहानी कह दी गई...एक कहानी अधूरी मगर पूरी मगर अधूरी..। शब्दों के पार...जहाँ इंसान सुनाई पड़ते हैं उनकी बातें नहीं। हर आवाज़ कुछ कह रही होती है..कीबोर्ड के बटन...लगातार हिल रहे पैर के जोड़ के चटकने की आवाज़...दिखाई देती है जहाँ से एक हवाई दुनिया...और सुनाई पड़ते हैं वे लोग जो साँसों को थोडा हल्का करें ..जहाँ से कोई खींचकर ना ला सके उन हवाई ख़ाबों से..कि चींखना ना हो खुद को सुनाने के लिए..जहाँ 'हाँ' पर 'ना' की ना हार हो ना जीत..जहाँ अभिव्यक्ति कभी आख़िरी ना हो..जहाँ बचा रह जाए कुछ जानने-समझने को...जहाँ नहीं लिखी जाती कोई कविता..शिकारी और परिंदों के सनातन बैर से परे का आकाश...जहाँ से दीखती हो तारों भरी धरती..एक ऐसी ही दुनिया की कहानी...कि ये एक कहानी ही थी..जिसे सुना जाना चाहिए था।

Saturday, 19 September 2015

टूटकर करेंगे प्रेम

कि.....

कि कितनी ही बातें हैं
जो होनी हैं हमारे दरमियाँ
कि कितनी ही शामें
गुज़ारनी हैं एक साथ
कि कितनी ही बार लिखनी हैं
ऊँगली से तारीखें रेत पर।

कि तुम सुनना मेरी आवाज़
जब शब्द चुक जाएँ
कि बस आस-पास कहीं
खड़े हो जाना
जब लगूँ हारने।

कि हम बचाएँगे ये दुनिया
प्यार और आँसुओं से
कि रखेंगे दिल के साथ
आँख और कान भी खुले
कि पहचानेंगे
दुःख और अपमान।

कि हम भीगेंगे
झमाझम बारिश में
बर्फ के गोले
भर लाएँगे अपनी जेबों में
हाथ थामकर
ऊँचे-ऊँचें पहाड़ चढ़ेंगे
समंदर की लहरों पर
धसकते रेत पर
उड़ेंगे एक साथ
जो कहना है
वो बस इतना कि
टूटकर करेंगे प्रेम !

Tuesday, 8 September 2015

इंद्रधनुषी झाग

अपनी एक टांग पर लटके
उधड़े हुए मुर्गों की तरह
खामोशी में डूबी दुनिया
बेतहाशा शोर से भरी है
ये दुनिया भरभराकर ढह रही है
ये दुनिया और कोई नहीं
हम हैं हम से है
हम वो प्रजाति हैं
जो ढहते हुए भी साँस ले रहे हैं
उनसे क्या ही कहा जाए
जिन्हें कहीं कुछ नहीं छूता !
किरचें
जो तस्वीर को हमेशा
अधूरा ही रखेंगी
चटके हुए कोने
 जो कभी नहीं जुड़ेंगे
शुरुआत कितनी सादा
पर कितनी प्यारी
फिर सब कितना जटिल
आशा और निराशा
एक ही बिंदु पर आ टिकी हैं
यह बिंदु हमारा नहीं
इतिहास हमारा नहीं
भविष्य भी हम नहीं
हम बस आज हैं
अभी इस पल हैं
अगले ही पल हमें
झटक दिया जाएगा
हम वो झाग हैं
जो खुद में
 एक पूरा इंद्रधनुष समेटे हैं
पर जिनका कोई आकाश नहीं !

Friday, 4 September 2015

दुनिया की सबसे खतरनाक क़ौम

वे जो माँग लाये थे
कटोरी में बचपन
उछालकर फेंकते हैं
कालिख चाँद के मुँह पर
रोशनियाँ उन्हें पसंद नहीं
अपने ही मन में छिपे
खल पात्र  को
छिपाने में सिद्धस्त लोगों की भीड़ में
आँखों में उतार देते हैं आँखें
जिनकी छाती दरक जाती है
सच सुनने से
उनके कानों में फूँकते हैं सच्चाई का सीसा
उनकी लम्बी अदृश्य पूंछ पर
 पाँव रखते हैं बार बार
उनकी छटपटाहट पर पीटते हैं तालियाँ

ये  दुनिया की सबसे खतरनाक क़ौम है
जो होरी की तरह गर्दन दबाये पैरों को नहीं सहलाती।


Thursday, 20 August 2015

एक रोज़ दफ़्तर से पहले


1 . 

गैस सिलेंडर का रेग्युलेटर बंद तो है ना !
बाथरूम की लाईट , स्टोर रूम का पंखा
पीछे वाले कमरे की लोहे की अलमारी का वो छोटा लॉकर
उसकी चाबी चावल के डिब्बे में रख देना
पीछे से आवाज़ आती है
चश्मा ले जाना मत भूलना
वरना फिर सिरदर्द की शिकायत करोगे
शाम को आते हुए कादम्बरी बुक स्टोर से सेकण्ड PUC कॉमर्स की बुक्स भी पूछ आना
नया सिलेबस
मुझे आने में शायद थोड़ी देर हो जाए
मुस्कुराते हुए वह सब सुनता है
और मुकेश  का एक गीत गुनगुनाता है
शायद...
मैंने तेरे लिए ही सात रंग के....
बेटी को आइसक्रीम के लिए दस रुपये का नोट पकड़ाकर उसने बैग उठाया
दोनों  घर से साथ निकले
थोड़ा जल्दी तैयार हो जाते तो मैं ऑफिस समय पर पहुँच जाती
बस स्टैंड पर सुबह से घर के काम में उलझी पत्नी की
झुंझलाहट भरी फटकार पर वह मन ही मन मुस्कुरा रहा है
तभी सामने से
बस न. 317 आती दिखाई दी
वह दौड़कर बस में चढ़ गया
बस में भीड़ है
उसके पास खुल्ले पैसे भी तो नहीं हैं
वह बार बार अपना पर्स देखता है
और एक सौ का नोट कंडेक्टर की तरफ बढ़ा देता है
12 रुपये के लिए 100 रुपये का नोट देख कंडेक्टर मुह बिचकाता है
आज वह खुश है
समय से दफ़्तर पहुँच जाएगा
ब्रेक !
टक्कर !!
झन्नाटेदार तीन थप्पड़ !!!
तीसरे थप्पड़ के साथ चश्मा उतरकर गिर पड़ा
क्या हुआ बहन जी !
क्या हुआ बहन जी !
देखो ना मेरे ऊपर गिर रहा है
मुँह में शब्द सिमट गए
बस से उतरा तो
ज़मीन कुछ ऊपर उठी हुई थी
पैर कुछ नीचे पड़ते थे
वह जिस जगह उतरा
उसका नाम उसे ध्यान नहीं था
वह दफ़्तर नहीं गया
वह घर भी नहीं गया
आज जाने दिनभर क्या करता रहा !


2 . 


बस न. 317 में
उसे जाते देख
अचानक खाते-खाते उसके माथे पर आ जाने वाली पसीने की बूँदें
बढ़ते BP और शुगर के बारे में सोचते हुए
उसकी आँखें भर आई
10 रुपये के टिकट वाली प्राइवेट बस में
दरवाज़े पर लटके लड़कों को ठेलती हुई
वह अंदर घुस गयी
पीछे हल्के-हल्के
कुछ सहलाने की हलचल महसूस हुई
आहिस्ता से पीछे मुड़कर देखा
पैंट की जिप खोले खड़े आदमी ने नितम्ब पर चिकुटी काट ली
अपमान से उसका गला रुंध गया
वह भीड़ में रास्ता बनाते हुए
उस जगह से हटी
पर अब सभी कोहनियाँ उसकी छाती को
और सभी हथेलियाँ उसके नितम्बों को छू रहे थे मानो
आँसुओं को दबाते हुए बस से उतरी तो
अचानक ही
ऑफिस में पीछे से पीठ पर हाथ फेरकर
हालचाल पूछने वाले गुप्ता जी का ध्यान आया
वह ऑफिस नहीं गई
वह घर भी नहीं गई
आज जाने दिनभर क्या करती रही !


Saturday, 15 August 2015

घंटी, घुँघरू और गुलमोहर

बहता है क्या
ये जमा जमा सा
अटका था जो हलक में
खिड़की के बीचों बीच एक चेहरा था
चेहरे पर लकीरें
जमीं पर परछाईयाँ
सपनों की बढ़ती आबादी
कहा कुछ नहीं जा रहा
क्योंकि सुना नहीं जा सकता
निगलना और उगलना दोनों मुश्किल था
पर राह बन ही जाती है
पटरियों से तेज़ी से गुजर जाती है एक ट्रेन
कहाँ ले जायेगी
पुकारा गया था एक नाम
शोर से नसें दर्द करने लगी
बच्ची सुनाती है कविता
जिसमें मछली जल की रानी है
और याद एक खींची चली आती है
झूठ बोलने से रूठ जाती थी विद्या माँ
और चढ़ता था पाप
पाप और पुण्य जो भी रहा
सब बह गया
दो के पहाड़े से शुरू हुआ हिसाब
सब शून्य हो गया
अंदर से बाहर आते हुए खौफ था
बाहर से अंदर जाते बेचैनी
कहीं बीच ही में रोक लिया जाए
बस पुकार लिया जाए
आवाज़ कोई नहीं आती
घर बस एक शब्द नहीं है
वहां से साँसों की घंटिया सुनाई देती हैं
घंटी से घूँघरूओं का  क्या रिश्ता है
और मेरा गुलमोहर से
बिखरी हुई पत्तियों में  दर्शन
और लिखे हुए में अर्थ ढूँढना
कितना बेमानी है
रात कहीं अंताक्षरी रहे थे खेल
म पर आकर अटक गया संगीत
एक धुन कहीं से देती थी सुनाई
उसपर बोल अभी लिखे नहीं गए
पुराने को अपदस्थ कर
नए शब्दों का  निर्माण होगा
नोंचना और खुरचना कितने नापसंद हैं मुझे ये शब्द
सुनकर ही कैसा सा लगता है
धुन पर कुछ बोल हैं देते सुनाई
फूलकुमारी हँस रही है
जॉनी के झूठ पर हँस देते हैं पापा
रात जकड़ती जाती है
बातें कहीं नहीं
बस शोर !
लाशों का ढेर है
चलती फिरती
 कोई जीवन जन्म नहीं लेता इस शहर में
जन्मती हैं लाशें
सपनें उनमें जान फूँकते हैं
और खुद सो जाते हैं
पाश ने किसी जकड़ती रात ही में कहा होगा
सबसे खतरनाक है किसी के सपनों का मर जाना !

Wednesday, 12 August 2015

भरोसा

मैंने मेरे मन में
एक भरोसा पाला
उसे कभी क़ैद नहीं किया
वो जब-जब उड़ा फिर लौट आया
चिड़िया जैसे नन्हे पंख उगे
धरती के गुरुत्व के विरुद्ध पहली उड़ान
पहला लक्षण था आज़ादी की चाहना का
भरोसे के भीतर एक और भरोसा जन्मा
और ये सिलसिला चलता रहा
अब इनकी संख्या इतनी है
कि निराश होने के लिए
मुझे अपने हर भरोसे के
पंख मरोड़कर उन्हें अपाहिज बनाना होगा!
करना होगा क़ैद
जो मैं कर नहीं पाऊँगी
हैरानी ! मैं ऐसा सोच भी पाई
अपनी इस सोच पर बीती रात घंटों सोचा
खुद पर लानतें फेंकीं
कोसा खुद को
मन ग्लानि से भर उठा
आँखों के कोने भीगते गए
और फिर इकठ्ठा किया अपना सारा प्यार
उनके पँखों को सहलाया
हर एक भरोसे को पुचकारा
उनके सतरंगे पँखों को
आज़ादी के एहसास से भरते देखा
सुबह तक वे एक लम्बी उड़ान पर निकल चुके थे
उनकी अनुपस्थिति में
मैं निराश !
पर जान पा रही थी कि शाम तक वे लौट आएँगे
यह वह भरोसा है
जिसके पँख अभी उगने बाकी हैं
जो अभी ही है जन्मा !

समंदर

जहाँ राख है
कुछ जला था कभी
नाक दबा निकल गए आप
राख में दबी चीखें आपको सुनाई नहीं दी
दो मुस्कुराते-खिलखिलाते चेहरों के बीच
गहरा लगाव था कभी
साथ जीने मरने की कसमें थी
प्यार था
विश्वास भी
और थी कभी न अलग होने की उम्मीद
उम्मीद भी गयी विश्वास भी
कसमें भी टूटी और लगाव भी
एक-दूसरे में खुद को खोजने वाले प्रेमी
खुद को पा गए
मगर
टुकड़ा-टुकड़ा
जिन्होंने टुकड़ों को समेटा
कुछ बन गए
बाकि बस बिखरे ही रहे
समंदर की लहरों के बीच
पानी से खेलते हुए
वे तस्वीरों में लम्हें क़ैद कर रहे थे
लम्हें सारे टूट गए
रह गई तसवीरें !
पानी की बूँदे
जमा हो रही थी
जिन्हें हो जाना था वाष्प
वे बना रही थी काई
पास ही में खाई
जो संभल गए
बचकर निकल गए
जिनका पाँव फिसला
वे धँसने लगे
सबकुछ एक प्रक्रिया है
धँसना भी
यूँ ही अचानक नहीं समाता कोई गर्त में
गीले रेत पर बनाते पाँवो के निशाँ
और रोमांचित होते खिसकते रेत से
मानो कहीं उड़े जा रहे हो
लग गए हो पँख
उड़ते-उड़ते धँसते हैं
धँसते-धँसते उड़ते
पँखों की उड़ान में
ज़मीन छूट गई
जिनकी ज़मीन छूटती है
उनके पाँव बादलों से टकरा सकते हैं
लेकिन सिर धँसता ही जाता है
कहीं गहरे धरती में
सिर के कितना नज़दीक है नाक
और पैरों से कितनी दूर
जब तक पाँव ज़मीन की सतह को छू रहे थे
खतरा नहीं सूँघ पाई
ज्यों ही पाँव बादलो में
सिर ज़मीन में
यह सचेत हो गई
पर बादलों को रौंदते पैर
अब ज़मीन में सिर के धँसने की कहानी कहते हैं
रेत अब नाक को ढक रहा है
बादल बस महसूस हो रहे हैं
रुई के फाए से
हल्के और मुलायम
जिन्हें आहिस्ता से छूकर गुज़रना था
चेहरे को
गालों को
जिन्हें पलभर थामना था हमारी हथेली को
उनका स्पर्श महसूसने से पहले ही
दम घुटने लगा
रेत का कीचड मुँह में भरने लगा
सबकुछ कितना पास था
सपनीले बादल
और कीचड़
अपने पाँवों और सिर की दिशा तय करनी थी बस
लेकिन सभी तो अपने पाँवों से चल रहे हैं धरती पर
अलग क्या!
अलग की ज़रुरत ही क्या !
अलग बस इतना कि
हमनें वह किया
जो करना चाहा
चाहा और किया
तो क्या जो अब हम नहीं
कम से कम हम हम हैं
ऐसा तो नहीं कि
हम हम ही नहीं ।

Saturday, 8 August 2015

Once a teacher always.....

अपनी ज़िन्दगी के 36 साल 8 महीनें जिस काम को मेरे पापा शिद्दत से करते रहे अब उस कार्यभार से मुक्त होने जा रहे हैं (हालाँकि इसे कभी 'कार्य-भार' समझा नहीं पापा ने) हम बच्चें जितने  चाव से स्कूल से लौट कर अपने किस्से मनभर सुनाते थे ठीक वैसे ही पापा भी सुनाते। अपने छात्र जीवन के भी और  शिक्षक जीवन के भी। शायद इसीलिए पिता और बच्चों के बीच स्वस्थ संवाद की स्थिति बन सकी हमारे घर में। हम जो शहरों में पैदा हो बस यहीं के जीवन को कुएँ के मेंढक की तरह संसार समझ बैठते हैं , के लिए ऐसे संवाद एक पुल की तरह होते हैं। जहां हम जान पाते हैं खेतों की निराई, बुआई, कटाई और जी-तोड़ मेहनत  के बारे में।  वह मेहनत जिसे करके हमारे माता-पिता हमें शिक्षा और बेहतर जीवन दे पाएँ।  अक्सर माता-पिता यही चाहते हैं कि जो सुविधाएँ जो आराम उन्हें नहीं मिल पाए , वो वे अपने बच्चों को दें लेकिन इस इच्छा के चलते प्रायः वे उन्हें वे चीज़ें भी देना भूल जाते हैं , जो उन्हें मिली थी। जैसे अनुभवों की धरोहर ! अपने बचपन में , बड़े-बूढ़ों से उनके ज़माने के किस्से सुनने वाले माता-पिता सुविधाएं जुटाने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि यह धरोहर अगली पीढ़ी को सौंपना भूल जाते हैं।

आज सोच रही हूँ कि जीवन की इस नयी पारी को पापा कैसे खेलेंगे ! कहीं उन्हें खालीपन तो महसूस नहीं होगा ! इस अतिरिक्त समय में उनकी सोच का बिंदु क्या होगा ! शायद अपने बाल-सखा (लोटा) को याद करेंगे , या संस्कृत वाले गुरूजी(शास्त्री जी)  को  याद करेंगे , या रोज़ बदमाशियां कर माँजी से मार खाना याद करेंगे , या ज़िन्दगी की उस करवट को याद करेंगे जो उन्हें गाँव की छाँव से इस दिल्ली की धूप  में ले आई। उन  चेहरों को याद करेंगे जो कहीं खो गए , जिन्हे दुनियादारी की आपा-धापी में कभी मन-भर याद भी ना कर सके। शायद फिर गाँव लौट जाने को जी चाहेगा , या शायद हमारे भविष्य में ही अपना भविष्य खोजेंगे। 

मेरी तो इच्छा है कि पापा खूब घूमें , मम्मी के साथ ! मेरी माँ जिन्होंने खुद को हमेशा घर-परिवार में खपाया है अब उन्हें जीने का, अपने लिए जीने का वक़्त मिले ! तमाम नारीवादी धारणाओं से इतर यह भी एक सत्य है कि मम्मी के लिए ये तभी संभव हो सकेगा जब पापा ऐसे अवसर बनाएँगे। खैर ! इस बदलाव को पूरी तरह सकारात्मक बनाने के लिए आपको बहुत सारी  शुभकामनाएँ पापा ! We all love you !



Thursday, 6 August 2015

खुद ही खुद को बचाना होता है।

दुःख, निराशा और टूटकर बिखर जाने का दौर लगभग सबके जीवन में आता ही है, शायद ही कोई हो जो इससे अछूता रह जाए। समय के साथ हम या तो मजबूत होकर उन परेशानियों से निपटना सीख जाते हैं या उनके साथ ही ताल-मेल बिठाने लगते हैं।  स्थिति चाहे जो हो, ये दौर लौट-लौटकर आते ही हैं , सकारात्मक पक्ष यह है कि लौटकर आने के लिए जाते भी हैं। हमें खुद ही खुद को जुटाना होता है, खुद ही खुद को बनाना होता है, और खुद ही खुद को बचाना होता है। 

खुद को बचाने के इस संघर्ष में बस एक कोशिश यह भी हो कि साथ फँसे लोगों को नज़रंदाज़ ना किया जाए। हर इंसान अपने हिस्से का संघर्ष कर रहा है , कितनी सहायता कर सकते हैं पता नहीं पर कम-से-कम मुश्किलें खड़ी ना करें ! बस किसी तरह खुद में और सामने वाले में यह विश्वास जगा सकें कि थोड़ी-सी हिम्मत ! थोड़ा-सा साहस और दोस्त ! सब ठीक होने ही वाला है। 

काश! हर इंसान के गले लगकर उसे बताया जा सकता कि उसकी हर दिन की लड़ाई को भले से ये दुनिया सलामी न दे लेकिन दुनिया को वही है जो बचाये हुए है। उसके भीतर दुनिया की सबसे सुन्दर और पवित्र आत्मा बसती है, उसके आँसू दुनिया की गन्दगी धोते हैं , उसका होना ही इस बदतर होती दुनिया में 'आस' बचाये हुए है। 'उम्मीदों' के पंख लगाकर बस बढ़ते जाना है. . . उम्मीद का कोई विकल्प भी तो नहीं !   


Sunday, 26 July 2015

चिंटू

हर दिन
ले आता है
नयी स्फूर्ति चिंटू
चहक कर बताते-बताते सब-कुछ
अचानक रुक जाता है चिंटू
चारों ओर सन्नाटा
उसने जो कुछ कहा
मानो सुना ही ना जा रहा हो
उसके उत्साह में नहीं घुलता उत्साह कोई
अब सन्नाटे से कर ली
दोस्ती उसने
अब सबको इंतज़ार है
शब्दों का
खामोशी का बाँध टूटता नहीं
और शब्दों का पुल बनता नहीं
कहीं कोई खतरा नहीं
एक दुनिया
जो अब पल रही है कहीं भीतर ही उसके
उसका हिस्सा कोई नही।

Monday, 20 July 2015

क्या मैं सुन्दर हूँ ?

उस लड़की का  संघर्ष 
तुम उस लड़की की आँख से देखते हो जिसे 
संघर्ष का अर्थ भी नहीं पता 
वो जो तुमसे अक्सर ही पूछ बैठती है 
'क्या मैं सुन्दर हूँ'
और तुम्हें ज़वाब देने में कठिनाई होती है 
मैं उस लड़की को बताना चाहती हूँ 
मैंने भी इस सवाल का सामना किया है 
जवाब कोई नहीं दे पाया 
तुम्हें भी नहीं मिलेगा 
बस प्यार करना होगा 
खुद से 
तुम जो शिकायतें करती हो 
वो उम्मीदें हैं दरअसल 
दूसरों से 
यही उम्मीदें तुम्हें खुद से रखनी होंगी 
खुद अपनी ज़मीं तलाश कर 
अपनी पसंद के रंग का आसमां चुनना 
तुमपर कोई प्रेमी 
शायद कभी कविताएं नहीं रचेगा 
पर तुम प्रेम रचना 
कविता से ज़्यादा ज़रूरी है प्रेम 
ऐसा कितना कुछ है 
जो कहना है मुझे तुमसे 
क्योंकि इस दिखावे की दुनिया में भी तुम 
शिकायतें करती हो दूसरों से 
यहां तो मुस्कुराया जाता है 
मन में खलिश बची रहती है 
पर मुस्कुराकर मिला कर लड़की 
समझदारी का लेबल चाहिए तो मुस्कुरा |

तुम सुन्दर हो!
जैसे सब होते हैं 
पर सब बचा नहीं पाते अपनी खूबसूरती 
या दूसरों की नज़रों में 
सुन्दरता का काँच नहीं पिघला पाते 
यक़ीनी तौर पर नहीं कह सकती कि
सुन्दरता से मुलाक़ात कभी हुई है मेरी 
पर कुछ भला सा काम कर 
मैंने खुद को सुंदर महसूस किया 
और 
कभी मन की कचोट के बीच 
बेहद कुरूप 
यक़ीनी तौर पर तो 
जीवन का पक्ष भी नहीं लिया जा सकता 
तय तो खुद ही करना होगा .

Sunday, 5 July 2015

'मामूली' ज़ख्म

पाँव में लगा एक मामूली ज़ख्म
जिसके उपचार की ज़रुरत
कभी समझी ही नहीं गयी
उससे ख़ून का स्राव
नहीं दिखा कभी
तक़लीफ़ भी तो नहीं पहुँचाई थी उसने कभी
वो बस एक ज़ख्म था
एक मामूली ज़ख्म
समय ही उसका उपचार समझा गया
पर एक लम्बी अवधि बीत जाने पर
जब उसी ज़ख्म पर
नज़र आए कीड़ें
माँस के  लोथड़े पर रेंगतें
कीड़ें !
ज़ख्म में सुराख़ करते
देते जन्म
और लिए जाते जीवन
हर सुबह तक़लीफ़ का थोड़ा और बढ़ जाना
उपचार की हर तकनीक का विफल हो जाना
बढ़ती पीड़ा
बहता रक्त मिश्रित पीला पदार्थ
चाहना ऐसी कि मसलकर दूर कर दें
अपनी बेचैनी
हर रात नींद को पुकारना
और करना विनती
कि अब कभी नहीं खुलना
यह कोई दुःस्वप्न नहीं
कल्पना नहीं
कोई मनोरोग भी नहीं
यह नज़रंदाज़ करते जाने वाली
वह मासूम(?) अदा है हमारी
जो
किसी भी 'मामूली' ज़ख्म का
यही हश्र करेगी।   

Friday, 3 July 2015

जीवन ! तुम बहुत सुन्दर हो !

वे जो सिखाते हैं हमें
कविता की खूबसूरती
बताते हैं
कि कैसे लिखी जाती है कविता
छंद, लय और व्याकरण का
देते हैं ज्ञान
जीवन के व्याकरण से जिनका
नहीं कोई सम्बन्ध
खोजते हैं
 हमारे अर्थहीन जीवन की कविता में
सुन्दर शब्दों का मायाजाल
आप बताइये जीवन की खूबसूरती
फेर लें नज़र विसंगतियों से
लेकिन
हमसे ये उम्मीद ना रखिये
कि
हम लिखेंगे फूलों की क्यारी,
चाँद का टुकड़ा ,
 भँवरें और तितली
चहकती चिड़िया
खिलखिलाता बचपन ,
 प्रेम में वृद्ध दरख़्त
बसंती हवा, बरसात, सावन, झूलें
और जाने क्या-क्या
कहेंगे
कि नहीं देखा कभी
किसी बचपन को बिलखते
नहीं देखा किसी चिड़िया को जून की गर्मी में प्यास से मरते
नहीं देखा बारिश से उजड़ती बस्तियों को
नहीं देखा सडकों पर बिकते जीवनहीन फूलों को
नहीं देखी कभी लू
कुछ नहीं देखा
कुछ भी नहीं
देखा तो यही कि
जीवन !
तुम बहुत सुन्दर हो !


Friday, 5 June 2015

..ग़र कहना है 'प्रेम'

ग़र कहना है 'प्रेम'
तो धीमे से कहो
ज़ोर लगाने पर
अक़्सर लग जाता है
आघात!
शब्दों को खो जाने दो
कहीं भीतर ही
शायद बचा रह जाए उनका
 महत्त्व!
मत खींचों
उधडन पर लगा
सेफ्टी पिन
वो थामे हुए है
एक ज्वार !
फटे हुए को फाड़ने का आनंद
छोटे छेद को करना बड़ा
सुई-धागे का जैसे
काम ही न हो
उधडन पर सिवन
अब बीते ज़माने की बात है
उत्तर आधुनिकता के इस दौर में
सांत्वना और हमदर्दी गाली हैं
प्यार छलावा
जानते हुए भी यह सच
हम निरंतर छलते रहते हैं खुद को!

Thursday, 4 June 2015

हम नासमझ

अकेलेपन और एकांत में
करना फ़र्क
और बदलना खुद को
एक अलग शख़्स में
एक बंद कमरे में उधेड़ना खुद को
और नए कलेवर में बुनकर
निकलना बाहर
ये जो मैं हूँ
ये दरअसल मैं नहीं हूँ
मेरा यह नहीं होना ही
मेरा होना है
खैर!
हमारे सिवा हमारा होना
क्या कभी कोई जान सकेगा!
न जानें।
हम ही ना जान सके
तो तक़लीफ़ होगी
कैसे हम ज़िंदा रहने के
तमाम औज़ार जुटा लेते हैं
क्या है ये!
मृत्यु से भय!
भय तो जीवन से है
और इस भय में
एक रोमांच
जब खुद के रक्त का स्वाद
जिह्वा को अच्छा लगने लगे
तो हमें डरना चाहिए खुद से
हड्डियों को घिसते हुए
अपने ही जबड़े से
रिसते हुए खून के स्वाद से
मदमस्त होते कुत्ते जैसी स्थिति
फिर ख़ून से भी जब
ऊब होने लगे तब क्या!
मवाद !
अपने प्रति हिंसक होने से अधिक क्रूर
कुछ भी नहीं
 खुद की बुनाई
प्यार-खूबसूरती-रौशनी-गरमाहट की अनुपस्थिति में भी
ऐसे करे कि हममें हम जैसा एक शख्स
बचा रह जाए
एक शख्स जो नासमझ है
कोसता है खुद को अपनी नासमझियों के लिए
और लड़ता है दुनिया से
उसी नासमझी को
बचाने के लिए!

Thursday, 28 May 2015

धूप-छाँव

परतें
अनगिनत
अनंत तक
छीलते जाना हर दिन

वो जो झरोखा है
रौशनी का वादा था उसका
अब डराता है
झाँक ना पाए कोई
जूझना खुद ही खुद से
लड़ना खुद की खामियों से
हाँ! खामियाँ !
बहुत हैं..बेहिसाब

चिल्लाने की विफल कोशिशें
आवाज़ का कहीं भीतर ही घुट जाना
आईने में मुस्कुराता चेहरा
कितना भयावह!
ना रो पाने की तड़प
कुछ ना कर पाने की कसमसाहट

किताबें
बिस्तर
सामने रखी अलमारी
अलमारी में रखा सामान
और सोच
सब बेतरतीब!

पाँव
जिनपर नज़र आते हैं निशान
धूप और छाँव के
इन्हीं पाँवो के नीचे
घंटों तक महसूस करना है
समंदर की लहरों को

बुझती आँखें
कम होती रौशनी
इन्हीं में भरना है अथाह विस्तार

थकता मन
दम तोड़ता साहस
इसी से करनी है तय यह यात्रा

अनथक।

Friday, 15 May 2015

हसरत-ए-परवाज़

विचारों की ज़मीन कितनी भी पुख्ता हो, समय के साथ उनमें बदलाव आते ही हैं या यूँ कहा जाए कि उनकी नयी परतें खुलती हैं। अपने विचारों की कशमकश के चलते मैं भी कुछ और पहलूओं पर सोचने को विवश हो गई। एक घटना से उद्वेलित हो मैंने एक टीप फेसबुक पर लिखी थी, जो अक्षरशः इस प्रकार थी-

  ".  . .और इस तरह एक और शादी होने को है।
'मेरी शादी होने वाली है', 'अरे वाह! कब? कौन है?', 'अप्रैल में। अरेंज्ड।', 'ओह अच्छा! तो लड़का क्या करता है?', 'पता नहीं, अपने पापा का कोई बिज़नेस संभालता है', 'हम्म ! तुम्हारी बात हुई उससे?', 'नहीं पापा ने पसंद किया है', 'मिली भी नहीं कभी?', 'नहीं, फोटो देखी है।', 'तुम्हे यह ग़लत नहीं लगता?' ,'ग़लत तो है पर कोई 'ऑप्शन' नहीं है।'.....ऐसा ही एक लम्बा संवाद। क्या वाकई कोई 'ऑप्शन' नहीं है? और अगर नहीं है तो भी क्या ग़लत के विरोध के लिए 'ऑप्शन' तलाशना ज़रूरी है? क्या यह 'ऑप्शन' एक 'पुरुष' या 'प्रेमी' है?
ऐसा नहीं कि यह शादी एक भयानक ग़लती साबित होगी, ऐसा दावा हो मेरा। मेरी तो यही कामना है कि शुरुआत जैसे भी हो रही हो, हर लड़की को वह सुख मिले जिसकी उम्मीद बाँधे वह ऐसे अनजान रास्तों पर सफ़र के लिए निकल पड़ती है।
लेकिन क्या ऐसी कामनाएँ फलीभूत होती हैं ! जिस 'ऑप्शन' के अभाव में यह निर्णय लिया, वह 'ऑप्शन' कल भी नहीं होगा, तब जब लानतें-मलामतें और क्रूरता का दौर शुरू होगा।
'ऑप्शन' के कॉलम में खुद को रखना होगा, खुद अपनी ज़मीन तलाशनी होगी, उस टुकड़ा भर ज़मीन पर अपने सपने बोने होंगे, उनकी जड़े मजबूत करनी होंगी।
विवाह-संस्था और प्रेम पर लम्बी बात की जा सकती है. . .अलग-अलग मत है लोगों के। मैं मेरी बात करूँ तो मेरे लिए बिना प्रेम और आपसी समझ के विवाह किसी अपराध से कम नहीं। चुनाव हमारी जिम्मेदारी है, अगर हम ऐसा नहीं करते तो निश्चय ही अपराध कर रहे हैं।
इससे इनकार नहीं कि ऐसी भी भोली-प्यारी लडकियाँ हैं जो अपने सपनों में अपना आस-पास बुनती हैं, उनका सपना ही यह है कि उनके माता-पिता उनका जीवनसाथी चुनेंगे और वे समाज की 'सबसे अच्छी लडकियाँ' होने का खिताब हासिल करेंगी। पर यह ख़िताब अस्तित्व में नहीं है और इस भोली सोच से यह भ्रम जिन्हें दूर करना चाहिए वे तो कह देते हैं "ग़लत तो है पर कोई 'ऑप्शन' नहीं है"
जो अनुचित है, उस पर सवाल उठाना ही 'ऑप्शन' है।"

मैं अपनी कही बातों को विस्तार देते हुए कुछ और बिन्दुओं को स्पष्ट करना चाहूँगी - हम जिस समाज में जी रहे हैं वह वास्तव में हमें प्रेम करने की इजाज़त नहीं देता, बेटियों को पंख फैलाने के लिए खुले आसमां में छोड़ते हुए भी माता-पिता कहते हैं- ' तुम पर बहुत विश्वास है बेटा , ख्याल रखना। ' यह विश्वास क्या है और ख्याल किस बात का रखा जाना यह सोच का विषय है। दरअसल विश्वास यह है कि तुम प्रेम नहीं करोगी और ख्याल भी यही रखना है कि कहीं आपको प्रेम ना हो जाए ! मानो समाज को एक ही चीज़ से ख़तरा है जिसके खिलाफ एकजुट होकर खड़े हो जाना है और वह खतरनाक चीज़ है- 'प्रेम' !

फिर भी जहां प्रेम को पनपना  होता है , वहां वह पनप ही जाता है। बात समाज , व्यवस्था या परंपरावादियों पर दोषारोपण कर देने भर से समाप्त नहीं होती है। 'प्रेम' का संघर्ष केवल समाज से ही नहीं होता , यह संघर्ष दोतरफा बल्कि चौतरफा होता है। सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने के लिए संघर्षरत होना अपेक्षाकृत सरल है, बनिस्पत उस लड़ाई के जो निरंतर खुद से लड़ी जानी है। जो बातें , जो डर हमारे भीतर कूट-कूटकर भर दिए जाते हैं उनसे लड़ना ज़रूरी होता है। 

स्वयं अपने लिए चुनाव करने के साथ ही हमारे तथाकथित शुभचिंतक हमारे दुःख और पीड़ा के क्षणों में यह कहते पाए जाते हैं- 'किया है तो भुगतो ' यक़ीनन अपने लिए हुए हर निर्णय के लिए हम स्वयं ज़िम्मेदार होते हैं और यदि भविष्य में वही निर्णय ग़लत सिद्ध हो तो उसके लिए भी साहस जुटाकर एक नई शुरुआत के लिए पुनः संघर्षरत होना भी हमारी ही ज़िम्मेदारी होगी। शायद इसीलिए अपने निर्णय लेने की स्वतंत्रता से भी पहले ज़रूरी है खुद को आर्थिक रूप से सशक्त करना और आत्मनिर्भर होना।  हमें अपनी बात कहनी है और इस तरह कहनी है कि वह सुनी जाए, साथ ही यह भी स्मरण रखना है कि जब हम समाज कि भूमिका में हों तब सुन सकें कि क्या कहा जा रहा है। कहे और सुने जाने की समस्या का अंत ही स्वस्थ संवाद की परिस्थितियाँ बनाएगा।  

Friday, 8 May 2015

पहचान

कभी कुतरा
तो कभी जलाया
ईंधन भी मैं
चारा भी
इस पर भी जब
तुम मुस्कुराते हो
तो चमकते दाँतों
और क्रूर भावों के
पीछे की दंतवन भी मैं।

इतना-भर भी
काफी न हुआ
मैं 'विकास' में बाधा बना
बाधाओं को मार्ग से हटाना
फितरत है तुम्हारी
सो काटा मुझे।

बड़े फ्लाईओवर
फुटओवर ब्रिज
और जहाँ-तहाँ फैलते
बिजली के तारों के रास्ते में
एक मैं ही रुकावट था
सो हटाया मुझे।

सभ्यता के विकास की सीढ़ी
तुम चढ़ते जाना
आधुनिक होने का
भ्रम भी पालते रहना
अनास्थाओं में बह जाना
और सारे अर्थ खो देना
एक-दूसरे में बीमार साँसें फूंकना।

जीवन की आपा-धापी में
मैं तुम्हारी बालकनी में रखें
उन गमलों में स्थान पाने लगा
और अपने अस्तित्व को हर-पल
मिटते हुए देखने लगा
आइडेंटिटी क्राइसिस तो समझते हो न तुम
आधुनिक जो ठहरे!

संकट मैं ही हूँ
तो मार गिराओ मुझे
क्योंकि जीवन से बढ़कर भी कुछ है
कुछ वृहत्तर.....बड़ा..
श्रेष्ठ....महान...
जिसके लिए
जीवन दिया जा सकता है
आज़ादी !!!

Tuesday, 24 March 2015

विश्वास

मानो अनगिनत सालों से
हम उदास थे
उदासी
जो पहाड़-सी
अड़ियल और स्थिर थी।

उदासी
जो शाम में झरते पत्तों-सी टूटती थी
उदासी
जो फिर भी टूटती नहीं थी
हँसी की तलाश में
निकलने ही नहीं देती थी।

कबूतरों के पंख-सी
नोंच ली गई ख़ुशी
जैसे कभी वापस नहीं आएगी!

और वापस आई भी नहीं,
पर कुछ तो है
जो लौट आया है
शायद विश्वास !

विश्वास
कि पंछी सभी
पिंजरों से बाहर होंगे।

विश्वास
कि सुख-दुःख जो भी हो
ज़िन्दगी को एक
कविता बना देंगे।

वे सारे पेंच ढीले पड़ जाएँगे
जो हमें कसे हुए हैं

उदासियों की ज़िद्द के आगे
लगातार
बार-बार
कमज़ोर पड़ती ख़ुशी को
विश्वास ने बचा लिया।

और अब विश्वास है
कि
सुंदर-सुंदर सब सँजो लेंगे
और
असुंदर को सजा
सुंदर कर लेंगे।

Peculiar


Personal write up has always been complicated for me. How to put myself out ! Ah! Now when I am going to give it a try- I am not going to care for my audience...I am writing for myself and I want to be honest to myself. Honesty is sometimes the only thing a person can afford.

I have always loved to enjoy a certain freedom in all that I do. A true believer of Aazaadi. 'Certain' ?? Strange it is, no? Ha ! Yes, a very confused girl I am. I want nothing and everything. I want freedom and I want people to care for me as well. I want to cross all the boundaries and at the same time I want someone to stop me from falling. I want to touch the sky but want my feet on the ground. So what if I am confused! I will make my way. :) I will find a way to live life in full swing, with full enthusiasm. Someday ! Hopes !

So these days I am in Bengaluru, Karnataka. Waise I am a Delhiwallah, who has grown in the city and knows all the fears a girl can face in this city. Yes Delhi by night is dangerous and threatening, but so is B'lore. I think, we Delhi people are both victim of the city as well as its vigilante defender. Oh ! that is completely an different issue. So I was writing about 'me'. Life was simple previously. Uhhm I was not ready for that probably. Those imaginary challenges !! Attraction towards those fears !! Result? Well I am here in B'lore  2, 140 KM away from family. It's not a big deal, so many girls are staying away for various reasons..some are studying..some are doing job..and some are just trying to find the way. In my case, its' cool ! I am here for good only. I have always been a very protective child of the family. Unaware of the world. A world which is full of conflicts, so it is an opportunity for me to explore more.
  
Sometimes a li'l encouragement means a lot, no! A li'l extra care..extra love..a hug..a hand to console..a person, who whisper in your ear that everything is going to be fine. Nowadays I feel more independent, with better understanding of empathy and connection than I had previously. (credit to the place, situations, and to few lovely people) I miss my family though, but I have to accomplish more with their love and blessings. My parents are getting older..and I am missing all those moments, I can spend with them. Time...once you lose it, you can never get it back. I will never get these moments back. I think I am expecting too much from life...Nevertheless I want to roam around the world...want to discover new fears..and overcome them. :)

BAAKI PHIR KABHI....

Thursday, 5 March 2015

. . .तुम्हारे मंज़रों की कैद में!

6 मार्च, 2012

जन्मदिन ! शुभकामनाएँ दी जानी चाहिए, लेकिन क्या शुभकामना दूँ तुम्हे ! वहाँ की खबर भी तो नहीं है...अँधेरा हो तो उजालें भर जाएँ...शोर हो तो शांति मिले...गम हो तो खुशियाँ बिखर जाएँ...निराशा हो तो आशा का सूरज उगे...भूख-प्यास हो तो तृप्ति मिले...बस तुम खुश रहो...कोई दुःख कोई तकलीफ आस-पास न रहे तुम्हारे !  याद तो तुम भी करते ही होगे हमें, आज तुम्हारे जन्मदिन पर तुमसे जुडी तमाम अच्छी बातों को याद करना चाहती हूँ बस। जन्मदिन के उत्सव पर दुःख या निराशा का क्या काम !

तुम्हारी कही बातें ! तुम्हारी अनकही बातें ! हमारी अपनी समझ की सीमा ! कितना कुछ ! वे हैरान कर देने वाली एब्सर्ड सी बातें, जैसे उनका कोई अर्थ ही ना हो या जैसे शायद उनमें कोई बहुत गहरी बात छिपी हो। दुनिया में अर्थहीन बेमतलब कुछ भी नहीं, हम समझ ना सकें यह अलग बात है। दरअसल हमें एक ख़ास ढंग से नपे-तुले अंदाज़ में सोचने की आदत हो गई है, हर अर्थ, हर व्याख्या, हर भाव को सीमित कर देते हैं। अगर जो कहीं कोई इसका अतिक्रमण करने लगे तो वहीँ हमारी समझ की सीमा पर हमला होने लगता है..तमाम घटनाएँ तिलिस्म लगने लगती हैं। 

प्यारापन और मासूमियत जब तक थोड़ी भी शेष है दुनिया में तब तक तुम भी हो!


स्मृतियाँ और अतीत ! अतीत तो अतीत होता है बाज़ दफा खूबसूरत और चमकीला तो बाज़ दफा बदरंग और भयावह। पर उसमें झांकना जरूरी सा हो जाता है, कुछ समय के लिए ही सही उन गलियारों में घूम आना चाहिए। कुछ देर उस खिड़की पर खड़े होना चाहिए जो वह रास्ता दिखाती है जिसपर चलकर हम यहाँ तक पहुँचे हैं।

कभी कुछ तुम भी कहो तो बातें लय पकडें, यूँ एकतरफा बात करना तकलीफ पहुँचाता है। आशा-निराशा में डूबते तरते..अंधेरों-उजालों से लड़ते जूझते बढ़ रहे हैं हम..कुछ लोग बनाने में लगे हैं तो कुछ बिगाड़ने में...कोई साथ देता है तो कोई साथ छोड़ देता है...सबका अपना महत्त्व है क्योंकि अर्थहीन बेमतलब तो कुछ भी नहीं।

हैप्पी बर्थडे टू यू !


तुम्हारी आवाज़ में....

https://m.youtube.com/watch?feature=youtube_gdata_player&v=VRsTFiJUj8c

Tuesday, 17 February 2015

पहचान को नोचता बाज़ार

गूगल साभार
 नारी मुक्ति चेतना व नारीवादी दृष्टिकोण पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है और बहुत कुछ लिखा जा रहा है, किन्तु बुनियादी सवाल अभी तक क़ायम हैं। सूक्ष्म रेशे से अटके इन सवालों की सामाजिक सन्दर्भों में बारीकी से की गयी जाँच-पड़ताल ही नारी अस्मिता की खोज कर सकती है। वर्तमान समय में जब स्त्रियाँ घरों की चारदीवारी से बाहर निकलकर संघर्षरत हैं, नियमों, मर्यादाओं और वर्जनाओं से अपने नारीत्व व अस्मिता की टकराहट को अपने अनुभवों से महसूस रही हैं तब ये अनुभव उन्हें झकझोरते हैं और एहसास कराते हैं उस जकड़नावस्था का जिसमें वे फँसी हैं। जहाँ उनके चुनाव और निर्णय लेने के अधिकार को हिक़ारत की नज़र से देखा जाता है। यदि स्त्री को मनुष्य ही ना समझा जा रहा हो तो उसके वरण की स्वतंत्रता का सम्मान भी संभव नहीं। यहीं से समानता की अवधारणा का प्रारम्भ होता है और यहीं से उन सभी प्रश्नों के उत्तर ढूँढने का प्रयास शुरू होता है जो इस समाज ने खड़े किये हैं।


बीसवीं सदी तक आते-आते स्त्रियों ने अपने कदम उन क्षेत्रों की ओर बढ़ा दिए थे जहाँ अभी तक केवल पुरुषों का एकाधिकार था। स्त्रियाँ स्वयं को सक्षम सिद्ध कर रही थी किन्तु उपभोक्तावादी संस्कृति तथा विज्ञापन-व्यवसाय ने उसे एक अलग ही छवि में प्रस्तुत करना चाहा। 'एक तरफ धार्मिक सत्ता-तंत्र की चारदीवारी तो दूसरी तरफ बाज़ार का चौराहा, दोनों जगह अस्मिता की चेतना से विहीन स्त्री की जरूरत है, ताकि गुलामी की एक परोक्ष व्यवस्था क़ायम रहे। इस पूरी बाज़ारवादी संस्कृति को संचालित करने वाली षड्यंत्रकारी पुरुषसत्ता की कोशिश यह है कि स्त्री का इस ओर ध्यान तक न जाए।' (मित्र की टिप्पणी) विज्ञापनों में अधिकांशतः स्त्रियों की दो तरह की छवियाँ परोसी जाती है, पहली में सुबह से दौड़ती-भागती पति को ऑफिस और बच्चों को स्कूल भेजती स्त्री जो 5 रुपये के साबुन से बर्तन चमकाती है 3 रुपये सस्ते डिटर्जेंट से पति की पीली पड़ गयी कमीज़ को चकाचक सफ़ेद कर देती है और कमर दर्द होने पर शिकायत भी नहीं करती (वो तो भला हो उस 'महापुरुष'का जो 'मूव' या 'आयोडेक्स' लगाकर उसे दर्दमुक्त कर देता है) फिर श्रृंगार कर 'आशीर्वाद आटा' 'बासमती चावल' और 'एम डी ऐच मसालों' से पति का मनपसंद खाना बनाकर शाम को उसका इंतज़ार करती है। दूसरी छवि एकदम भिन्न है जहाँ स्त्री मोटर बाइक पर सवार या डीयोद्रेंट लगाते यहाँ तक कि टूथपेस्ट करते और दाढ़ी बनाते पुरुष को देखकर भी कामुक हो जाती है।

अब विचारणीय यह है कि जिस नारी को ये मीडिया प्रस्तुत कर रहा है वह वास्तव में उपभोक्ता है या उपभोग्य ! अपने नारीत्व और अस्मिता से जुड़े सवालों से हर दिन जूझती नारी को लम्बे संघर्ष के बाद जो थोड़ी सी आज़ादी मिली है उसके प्रति और भी सतर्क होने की जरूरत है। इस पूरी बाज़ारवादी संस्कृति को संचालित करने वाली षड्यंत्रकारी पुरुषसत्ता के इरादों को समझना होगा।  यह भी ध्यातव्य है कि यह वही पुरुषवादी मानसिकता है जिसने सदियों तक स्त्रियों को 'पर्दे' में रखा और अपनी सुविधा के लिए 'पर्दे'पर ले आई। स्त्री पात्रों की भूमिका पुरुषों द्वारा निभाई जाती थी क्योंकि उस समय स्त्रियों के लिए अभिनय, संगीत, नृत्य व कला से जुड़ना लज्जा का विषय था। फिर क्या कारण रहे कि उसी स्त्री को 'प्रोडक्ट' की तरह पेश करते हुए विचार नहीं किया गया। संभवतः यहाँ सारा खेल धन और बाज़ार की ताक़त का है।

तस्वीर सौजन्य : गूगल साभार

विज्ञापन संस्कृति में पुरुष मानसिकता और स्त्री की बदलती मानसिकता के विषय में प्रभा खेतान लिखती है, ‘.....पृष्ठभूमि में व्यापक स्तर पर स्त्री-देह का, उसके कपडों एवं सौंदर्य प्रसाधन का विज्ञापन इस पूर्वानुमति तथ्य पर आधारित है कि वास्तव जगत् की स्त्री देह में ही कोई कमी है, इसलिए इन प्रसाधनों, कपडों एवं डाइटिंग से इसे भोग के अनुकूल बनाया जाना चाहिए।’ चूंकि दुनिया और समाज में बनाए, पुरुष की नजरों में वह सुन्दर लगे, यह जरूरी माना जाता है। यहां स्त्री व्यक्ति के रूप में भी बार-बार अदृश्य पितृ-सत्तात्मकता के प्रभाव में दूसरे व्यक्ति के संदर्भ में स्वयं को प्रस्तुत करती है। इसमें शायद कुछ सच्चाई और तथ्य भी है, कारण, स्त्री जानती है कि आधी लडाई, वह अपनी देह के स्तर पर जीत ही जाएगी....।’ (उपनिवेश में स्त्री)

स्त्री को यह समझना होगा कि मीडिया पर वर्चस्व पुरुष सत्ता का है और इस सत्ता के सूत्र पितृसत्तात्मक व्यवस्था में हैं। स्त्री को चाहिए कि वह नारी चेतना का आधार लेकर बुद्धिजीवी वर्ग से निकलकर मध्यवर्गीय और किसान-मजदूर स्त्रियों तक जाए।

नई व आधुनिक स्त्री की जो परिभाषा मीडिया गढ़ रहा है वह वास्तव में भ्रमित करती है,उसी का परिणाम है कि आज स्त्रीविषयक समस्याएँ तो बढती जा रही हैं किन्तु उनका सुनिश्चित समाधान नहीं मिल पा रहा है। मीडिया वर्तमान में एक ऐसे सशक्त माध्यम के रूप में उभरकर सामने आया है जो युवा पीढ़ी में जीवन मूल्यों, आदर्शों एवं नैतिक गुणों को गहराई से प्रभावित कर रहा है। उसके पास ऐसी ताकत है जो समाज में व्याप्त बुराइयों और कुरीतियों को नकारात्मक परिणाम के साथ प्रस्तुत कर सजगता बनाए रख सकता है। किन्तु स्थिति यह है कि मीडिया ख़ालिस बाज़ारवाद के रंग में रंगा हुआ है और यह समझ पाना कठिन हो गया है कि यदि मीडिया बाज़ार है तो खरीददार कौन है, बेचने वाला कौन है और बेचा क्या जा रहा है।

मीडिया व स्त्री-समाज दोनों को अपनी ज़िम्मेदारी समझनी होगी। सतर्क होना होगा कि यदि स्त्री इस चमक-दमक व उपभोक्तावादी संस्कृति में खो गई तो नारी-मुक्ति स्वप्न अधूरा ही रह जाएगा। उसे तय करना होगा कि वह वस्तु या उत्पाद बने रहना चाहती है या सृजनशील मनुष्य ! यही निर्णय उसका भविष्य तय करेगा।

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...