Wednesday, 28 December 2016

एक शब्द चित्र

एक चित्र बनाऊं
जो हो नंगा पूरी तरह
पारदर्शी
लोग कहते हैं
नंगे को और कितना नंगा दिखाओगे भला

पारदर्शिता के लिए चुनूँ कौनसा रंग
जो ना हो पानी का
या शीशे का
जो हो रंग सच्चा
काला

जो लिखूँ
तो बोले हर वो पत्थर
जिस पर पाँव पड़ा
मुड़ा , छिला, गिरा और संभला 

एक शब्द चित्र।


Monday, 26 December 2016

बकाया और कितना है?

ये अन्धेरा हटा दो
कि सांस मिले
थोड़े घुँगरू
और चार फुर्सती साँसें
कोई कला जो रोम-रोम में भरे
उजालों और अंधेरों से परे

प्यार नहीं
दर्द दो
खिड़की नहीं
दीवार दो
हाथ नहीं
हथौड़ा दो
पैसा नहीं
किताब दो
रोटी नहीं
जज़्बात दो

यूं माँगना अच्छा नहीं लगता।
हवा में खाली रहे
5  फ़ीट 3 इंच  जगह
और मैं रहूँ

वो दरवाज़ा खुले
जहाँ मंज़िल झाँके
पुकारे मुझे
और मैं विपरीत दिशा में चल पडूँ
कि जो तय किया
वो सफर मेरा कहाँ था 

जो साँसे जी अभी तक
वो उधार किसका चुकाया

बकाया और कितना है?



Sunday, 25 December 2016

मत हँसो

मत हँसो मत हँसो
मत हँसो मत हँसो
हँसना ही है तो
चलो हँसो। 

Sunday, 18 December 2016

फिर एक गाँठ

 
उस शाम इला का फ़ोन आया ‘शनिवार को क्या कर रही हो?’ मैं किसी भी दिन क्या कर रही होउंगी नहीं जान पाती. दिन ही यह तय करता है मानो कि मुझसे क्या करवाएगा. कुछ ना करने की भी अपनी व्यस्तताएं होती हैं. यूँ बता पाना कि तुम व्यस्त समझो वैसा व्यस्त नहीं हूँ लेकिन यूँ ही छत पर टंगा पंखा देखने में व्यस्त रहूंगी या खिड़की से बाहर झांकते हुए हर आते-जाते इंसान को देखने में व्यस्त रहूँगी ये कह पाना अभी मुश्किल ही है फिर आखिर मैंने कहा ‘कुछ ख़ास नहीं’. उसने बताया कि शनिवार को उसकी एक दोस्त की बेटी से मिलने उसका पिता आ रहा है. मुझे विटनेस माने गवाह बनना होगा. ये कैसा काम है? तीन वर्ष पहले कुमुद का अपने पति से तलाक हो गया और तब से उसकी बेटी जो अब छः साल की हो गई है से मिलने उसका पिता हर महीने आता है. इला ने बताया कि कुमुद उस आदमी पर ज़रा भी भरोसा नहीं करती चूंकि इला खुद शहर से बाहर है इसलिए चाहती थी कि मैं गवाह बनूँ. ऐसा अजीब-ओ-गरीब काम! लेकिन मैंने हाँ कह दिया.

कुमुद से मेरी पहली मुलाक़ात थी. वह मुझे अपनी गाडी में लेने आई थी. मैंने नमस्ते की उसने हेल्लो कहा. औपचारिक बातें करना मेरे लिए मुश्किल है खासकर जब पहली मुलाक़ात हो. फिर मुलाक़ात का कारण भी झिझक पैदा कर रहा था. चुप्पी को उसी ने तोडा – पढ़ाई कर रही हो? मैंने कहा नहीं नौकरी। मैं उसके अगले सवालों का अनुमान लगा रही थी कि उसने पूछा- बॉयफ्रेंड है? मैं हैरान सी मुस्कुरा दी. ऐसी थी मेरी कुमुद से पहली मुलाक़ात. फिर पूरे एक महीने तक हमारी कोई बात नहीं हुई. यह सोच पाना कि उसके बाद हमारे बीच कभी कोई रिश्ता होगा नामुमकिन था. लेकिन रिश्ता बना. अगले महीने उसका फ़ोन आया ‘अभी 3 बजे हैं 4.30 बजे मैं तुम्हें लेने आ रही हूँ. घर ही हो ना?’, ऐसा आदेश भरा स्वर सुनकर मुझे गुस्सा आया ‘हाँ घर पर हूँ’. मुझे इला पर भी गुस्सा आया क्या ज़रुरत थी मेरा नम्बर देने की. उसने मुस्कुराकर पूछा कुछ ज़रूरी काम तो नहीं था तुम्हें? मैंने मुँह हिला दिया। फिर उसने कुछ नहीं पूछा. मैंने ही पूछा आज फिर उसी दिन की तरह….? उसने खिलखिलाकर कहा अरे नहीं नहीं आज तो मैं खुद ही मिलने जाउंगी। फिर मुझे क्यों….मेरा मतलब है कि…. ‘अरे हाँ देखो दरअसल क्या है न कि आदमियों की जात ही ऐसी होती है… बेईमानी तो इनके खून में होती है… 3 साल से मैं अकेली औरत अपनी बेटी को पाल रही हूँ. मैंने ही बड़ी मुश्किल से इसकी कस्टडी हासिल की थी. लेकिन अब सोचती हूँ कितनी बेवक़ूफ़ होती हैं हम. लड़-मरकर उन्हीं को आज़ाद करती हैं…. उस आदमी के जीवन में क्या बदला. कुछ भी तो नहीं. और मेरे लिए तो कुछ बचा ही नहीं जैसे अब. सो अब सोचा है कि क्यूँ ना ये ज़िम्मेदारी उसी को दे दूँ और खुद चैन से जिऊँ.” अपनी बड़ी गाडी में बैठी वो मुझे खुदगर्ज़ लगी जबकि नहीं लगनी चाहिए थी.

कुछ दिन बाद उसने मुझे बताया कि उसका एक्स-पति बेटी की ज़िम्मेदारी के लिए तैयार है पर उसे कानूनी तौर पर बेटी की पूरी कस्टडी चाहिए. मुझे उस बच्ची के लिए भी बुरा लगा. घर लौटते ही मैंने इला को फ़ोन किया और बताया कि इतने दिनों में कुमुद से मेरी कब-कब और क्या बातें-मुलाकातें हुई. इला ने सब सुनकर बस इतना कहा ‘सुनो कुमुद को कैंसर है.’

अभी तक कुमुद को जब-जब देखा पूरा घटनाचक्र एक फ्लैशबैक की तरह चल पड़ा. कुमुद को ब्रैस्ट कैंसर है. मैंने कुमुद को फोन किया इधर-उधर की बातें की. मैं चाहकर भी उससे कुछ नहीं कह पा रही थी, तब उसने मुझसे कहा कि वह चाहती है कि मैं उससे मिलने रोज़ आऊं और उसके अनुभवों को एक डायरी में नोट करूँ। वो ये मान चुकी थी कि इस बीमारी का कोई इलाज नहीं. और अब उसे सबकुछ दर्ज कर देना चाहिए.” बड़े होने के क्रम में 13 वर्ष की उम्र में मैं घबरा गयी कि ये कैसी गाँठ हो आयी हैं मेरे और फिर माँ के समझाने पर ही समझ पायी थी. आज फिर 13 साल की वही बच्ची 38 की हो गयी है आज फिर एक गाँठ है. आज फिर वही उलझन है पर सुलझाने को माँ नहीं है. मेरे सपनों में यह गाँठ पहाड़ बन जाती है जिसके बोझ से मैं झुक गयी हूँ.”

…………….

“अभी चार बाल टूटने से डर कर शैम्पू बदलती थी, जतन करती थी रोज़ सुबह तकिये पर बाल देखकर जान सूख जाती है, अभी अगले हफ़्ते ही तो कीमो शुरू होगी। क्या मैं तैयार हूँ इसके लिए? खुद को आईने में देखने के लिए? कैंसर तैयारी देखकर नहीं हुआ है। हममें से कोई तैयार नहीं होता इसके लिए। जागरुकता? वह मृत की तस्वीर के सामने जलती हुई मोमबत्ती है। महत्त्व तो है पर विकल्प नहीं। हर साल सोशल मीडिया पर जागरूकता के नाम पर अपनी ब्रा का रंग, विज़िटिंग सिटी सब बताया। पर जिस फन गेम से ये जागरूकता मैं फैलाती थी उस बीमारी को ही नहीं जानती थी। कैंसर के चेहरे से अनजान थी बिलकुल। अब सोचती हूँ ब्रैस्ट कैंसर अवेयरनेस में महिलाएँ सीक्रेट गेम क्यों खेलती हैं? इसका हिस्सा पुरुष क्यों नहीं? हिस्सा ना सही पर जानें तो कम से कम। जानने वाले पूछते हैं कि ऐसा रोग तुम्हें कैसे हो गया? और खुद ही कारण गिनाते हैं। ज़िंदगी जब सबसे बोझिल मालूम हुई तब भी इसे धुँए की क़ैद में नहीं छोड़ा। ये होना था सो हुआ। अब अगर कुछ है मेरे हाथ में तो वह है साहस।“

…………..

“कीमो के बाद दर्द और अपने बदले रूप दोनों ने अंदर तक तोड़ दिया। थकान और ऊब दोनों है। बहुत कमज़ोरी है, चार कदम चलने से ही सांस फूलने लगती है। तक़लीफ़ होती है, रात-रात भर दर्द और बेचैनी।

मर जाना लड़ने से आसान लगता है। पर आसान नहीं चुनूँगी। जब राकेश से शादी के लिए पापा से ज़िद्द की थी तो पापा ने कहा था आसान रास्ता चुन रही हो। एक अमीर आदमी ऐश-ओ-आराम दे सकता है पर तुम्हें समझेगा ये ज़रुरी नहीं। आज पापा नहीं हैं पर मैं उन्हें बताना चाहती हूँ कि मैंने वो आसान रास्ता छोड़ दिया है। मैंने एक झूठे रिश्ते के बजाय अकेलेपन को चुना है। कैंसर की इस लड़ाई में भी आपकी बेटी आसान नहीं सही रास्ता चुनेगी।

आईने में खुद को देखती हूँ तो ख़ुद को पहले से भी ज़्यादा ख़ूबसूरत महसूस करती हूँ। अब सर को ढककर छिपाती नहीं हूँ। बिंदी, काजल झुमकी सब है। बस बाल नहीं हैं। मेरा अस्तित्व कोई एक चीज़ या अंग तो नहीं है। कभी-कभी हँसकर खुद को तसल्ली देती हूँ कि बाल तो विकलांगता की श्रेणी में भी नहीं आते फिर कमज़ोर क्यों पड़ रही हूँ।“

………..

“आज डॉक्टर ने कीमो की आख़िरी सिटींग के बाद कहा कि बस स्तन को निकाल देना होगा। स्तनों से पीला पदार्थ बहता है और ये गाँठ भी घुलती नहीं। शरीर दुर्बल हो रहा है और अंदर कुछ है जो फिर भी हार नहीं रहा।

मैं हारूँगी नहीं, हारना ही होता तो ये सफ़र शुरू ही नहीं करती। एक अकेली कहीं भी मर सकती थी, पर मैंने जीवन चुना है। अभी इसका जश्न मनाना बाक़ी है।

डॉक्टर ने कहा कि एक स्तन निकाल देना काफी होगा पर मैंने दोनों का फ़ैसला लिया है। सपाट छाती के साथ भी मैं कुमुद उतनी ही आकर्षक रहूँगी। अब वो कॉलेज वाली दोस्त स्वाति मिलेगी तो बताऊँगी कि लड़कियाँ बड़े स्तनों से नहीं बड़े सपनों से खूबसूरत लगती हैं।“

यह कुमुद का सफ़र था. जो अब उतनी ही सामान्य ज़िन्दगी जी रही है जितना कि वह जीना चाहती थी। जब मौत को चुनने का दिल करे तो क्यों ना एक नया जीवन चुन लें।


बंद घड़ी के कैद में-उम्मीद

3 बजकर 40 मिनट। वह दीवार पर टँगी एक बंद घडी को देख रही है। मैं घडी देखती हुई उस लड़की को। ये वही लड़की है जिसके साथ बारिश में भीगते हुए शम्मी कपूर के गाने गाए हैं।
इस चहकती लड़की से इसके ‘फर्स्ट किस’ के रुमानी किस्से हर बार अलग अंदाज़ में सुने हैं। पहली बार वैक्सिंग के डर से रोती हुई इस लड़की को अपने दाएँ कान को ऊपर से नीचे तक छिदवाते हुए देखा है।
My papa is my hero के साथ गिटार वाला टैटू फ्लॉन्ट करने वाली इस लड़की के साथ सायकायट्रिस्ट के चक्कर लगाते हुए सोचती हूँ क्या ये वही लड़की है!
वही लड़की जिसके हाई हील पहन लेने से बाल बादलों से उलझने लगते थे। वो कोई और थी, जिसे देखकर मैं सोचती थी कि इस लड़की में ठहराव कब आएगा।
वह अब बोलती नहीं है बस बड़बड़ाती है। एक कमरे में बंद हम दो लडकियाँ अगर इस घडी में क़ैद वक़्त से हमेशा के लिए विदा ले लें तो शायद ही कोई जान सकेगा कि बस तीन महीने पहले आई इस रूममेट से मेरा क्या नाता था।
कितनी कहानियाँ लोग एक-दूसरे को सुनाएँगे जिसमें सब होगा सिवाय सच के। हर रोज़ थोडा और छोटा होता जा रहा है ये कमरा। दीवारों को अपने इतने पास आते देख ख़ौफ़ पैदा होता है।
करीब आती दीवारों के साथ यह लड़की भी करीब आ रही है, मैं भागना चाहती हूँ पर घडी पर टँगी एक जोडी आँखें मेरा पीछा नहीं छोड़ती।
लखनऊ से माँ पूछती है कि इंटर्नशिप ख़त्म हो गयी अब तो आ जाओ, पर मैं इस कमरे में पसरे मातम की क़ैद में हूँ। कभी-कभी दिल करता है कि यह वो कदम क्यों नहीं उठा लेती जिससे मैं हर रोज़ डरती हूँ, क्यों मुझे आज़ाद नहीं कर देती जिसके बाद मैं घर लौट सकूँ। नहीं ! नहीं ! वो एक जोड़ी आँखें !
3 बजकर 40 मिनट पर टिकी पत्थर हो चुकी आँखें ! ये मेरा पीछा नहीं छोड़ेंगी। बाहर लगातार गिर रही बारिश की आवाज़ एक अजीब डर का माहौल बना रही है मानो आज की रात कोई आम रात नहीं है कुछ होने वाला है, जिस पर हमारा बस नहीं।
मैं उसे देख ही रही थी कि अचानक आँखें स्मृतियों में इतनी धुंधला गयी कि सामने दीवार खाली नज़र आई। कान गर्म हो गए और सन्नाटे के शोर के साथ हलक में एक पत्थर-सा अटक गया। वह कहाँ गई! कंधे पर एक हाथ आया- ‘चलो बारिश रुक गयी है, डॉक्टर के पास चलें’ – उम्मीद !

Thursday, 1 December 2016

खुशबुएँ सारी प्यार नहीं

प्यार नहीं

भीड़ के बीचों-बीच
हर आदमी से 
पूछा पता और अपना नाम  
वे नहीं जानते थे 
जानती थी मैं 
पर रुकना था 
या शायद पूछना 
वे बस खफ़ा हुए 

दस अंकों वाली एक संख्या

हम छील रहे थे खाल 
हमें रोकना नहीं  था 
आखिर तक ताकते रहना था आसमाँ 
उबलती आँखों की ठंडक में उतरना था और गहरे 
बुझती लौ को रोकना जैसे जलाना खुद को  

हमें चुनने थे लोग 
और तय करने थे कुछ दोस्त 
बस शिकायतें 

वही लाल दीवार 
जहाँ से शुरू हुई थी खम्भों की गिनती 
जहाँ से शुरू हुई थी महफिलें 
आधी रात का चाँद 
और एक मोमबत्ती 

खूब रगड़ा माथा 
पलटे सारे पन्ने 
कुछ मिल नहीं रहा 
वो थैला 
थैले में रख दी बदहवासी 
गलती किस मोड़ पर छूटी?
या थी शुरुआत ही गलत 
लौटना या बढ़ना 
या बस बैठे रहना 
करना इंतज़ार 
कि झुके आसमान 
पूछे सवाल 
और मैं बस मुस्कुराऊँ 

कुछ भरोसे थे जिनकी जानें चली गई 
जिस मिट्टी में दफनाया उन्हें 
उसपर ही अब पौधा उगाना है

खुशबुएँ सारी 
प्यार नहीं.  


Sunday, 16 October 2016

फ़रेब हैं आँखें

तस्वीरें कभी ना बदलें
जब वक़्त बदले दीवारें
चले जाने के बहुत करीब आकर ठहर जाना

जब भी बहे वक़्त 
टूटकर ना गिरे कांच

फ़रेब हैं आँखें
ज़हर हँसी
भँवर एक उँगली
वो उंगली तुम

ज़बान पलटकर हलक में
थूकती खून रोज़
बाहर आते शब्द झूठे
वो झूठ मैं
प्यार कहने से पहले रूकती हुई साँस।

Friday, 14 October 2016

फटा पोस्टर और निकला हीरो



सूरज की पहली किरण से आशा का सवेरा जागे

चन्दा की किरण से धुलकर, घनघोर अन्धेरा भागे

कहीं धूप खिले कहीं छाँव मिले लंबी सी डगर ना खले।

किशोर कुमार ! भागलपुर में जन्मा यह सितारा फलाना तारीख को फलाना जिले में जन्मा। और इत्तेफाक देखिये फलाना तारीख को ही इनका निधन हो गया। जाने दीजिये क्या फर्क पड़ता है। फर्क पड़ता है इस बात से कि एक जीवन में जितने जीवन किशोर कुमार जी कर गए वो कितना बड़ा और ख़ास सफर था। प्लेबैक सिंगर के तौर पर किशोर कुमार की शुरूआती कोशिशें ही रंग लायी और उनके गीत कामयाब  भी रहे। के. एल. सहगल और खेमचंद प्रकाश को आदर्श मानने वाले किशोर को सफलता कुछ यूं मिली कि एक दिन वे उससे खीज उठे। लोग उन्हें नसीहते देते कि यूं गाओ और यूं ना  गाओ। कोई उन्हें गंभीरता और सलीके सिखाता तो कोई कहता गाने में मसाला डालो, बूम चिक टाइप यॉडलिंग के लिए कहते। कोई कहता सिंगिंग छोडो और एक्टिंग करो क्योंकि पैसा और कामयाबी इसी में है। गौरतलब है कि किशोर  इन सब नसीहतों पर अमल भी करते। किशोर की मानें तो इसी सब के चलते एक आदर्शवादी लड़का एक मगरूर और दूसरों में दोष ढूंढने वाला नौजवान बन गया। एक वक़्त ऐसा भी आया जब किशोर कुमार अपने गुरु खेमचंद  प्रकाश पर भी हँस दिए. अपनी कॉमेडी को भी वे चार्ली चैप्लिन की नक़ल मानते हैं। किशोर को लगता कि जनता को कॉमेडी के नाम पर उछलता-कूदता बन्दर चाहिए और वे बन्दर  बन जाते। आलोचनाओं को भी नज़रन्दाज़ कर देते। चलती का नाम गाडी से  जुड़े एक किस्से का   ज़िक्र किशोर कुमार करते हैं कि जब एस डी बर्मन उन्हें कुछ धुन सुनाने आये तो उन्होंने उन्हें हड़का दिया कि जनता रॉक एन्ड रॉल सुनना चाहती है, सो किसी म्युज़िक स्टोर से रॉक एन्ड रॉल के रिकॉर्ड्स खरीदिए। यहां तक कि उनकी फिल्म के लिए किसी और गायक की आवाज़ में गाना रिकॉर्ड करने के प्रस्ताव भी उन्हें नागवार गुज़रे।

          फिर एक वक़्त आता है कि दौड़ते-भागते आदमी रुकता है, संभालता है। खुद को टटोलता है और अपनी शिनाख़्त करता है। किशोर को लगने लगा कि वे एक बेमतलब के मसखरे हैं, जिसे बस मसखरी के लायक ही समझा जाता है। अपनी मानसिक बेचैनी को किशोर पागलपन समझने लगे। अपनी बनायी हुई फिल्में उन्हें बेवकूफ़ी लगती। और फिर फटा पोस्टर और निकला हीरो। एक नए किशोर से किशोर की मुलाक़ात होती है- किशोर का एक बड़ा ही दिलचस्प किस्सा है एक फिल्मकार किशोर को अपनी फ़िल्म की कहानी सुनाता है और दृश्य कुछ यूँ समझाता है - आप हीरोइन के बैडरूम में घुसते है वो भी साडी पहनकर...हा हा हा... आप जानते हैं न फिर क्या करना है? किशोर उसे टोकते हैं और कहते हैं कि मैं आपको बताता हूँ कि मुझे क्या करना है यह कहते ही उन्होंने छलाँगें लगानी शुरू कर दी और कलाबाजियाँ करने लगे। फिल्मकार का सर चकरा गया और वह किशोर को पागल समझ उलटे पाँव हो लिया। चुलबुले और यूडलाई यूडलाई युहू वाले अपने किशोर होते होते किशोर कुमार हुए।

         "बेकार की चीज़ों के पीछे भागने की इस अंधी और गलत दौड़ को छोड़ने का वक़्त आ गया है। मैं अब सीधा चलना चाहता हूँ। अगर कॉमेडी है तो वह गूढ़ होनी चाहिए। संगीत हिन्दुस्तानी होना चाहिए। फिल्मों का कोई मतलब होना चाहिए"

        और इस तरह किशोर खुद को पा गए और हम The Kishore Kumar को !

Thursday, 15 September 2016

हम फूल खिलाने निकले थे !

हम लगातार भाग रहे थे
अँधेरों से दूर
अँधेरा कालापन छोड़ते हुए चिपक गया था हमारी चमड़ी पर
दो अलग शहरों में रहते हुए हम चार शहरों में जी रहे थे
हिस्सों में आधे-अधूरे
हम भूख दबाते थे
किताबों में नए नए बुकमार्क सजाते थे
उस दिन भी वही बच्ची खिड़की पर खड़ी थी
जिसकी तस्वीर तुमने भेजी थी
यहां उसका नाम बदल गया था
हर शहर एक नया नाम देता है इन बच्चियों को
और शहर बदलने के साथ
मैं बहुत ज़ोर डालने पर भी
वो पुराना नाम याद नहीं कर पाती
उसके एक हाथ में गर्म रोटियों का भरा डब्बा
सिर पर भाप उड़ाते चावल
 एक पतली सी लट
आँखों में चुभ रही है
सुनो बच्ची
कुछ कर पाने से पहले ही सब धूल हो गया
सब धूल होता जाएगा


हम फूल खिलाने निकले थे !

Sunday, 4 September 2016

एक शाम के इंतज़ार में

आसमान से जैसे दिखाई देती है धरती
वैसे ही दिखते हो तुम
मेरे घर
मैं अगर न लौट सकूँ
तो तुम हाथ बढ़ा देना
हाथ थाम लूँ ज़रूरी तो नहीं
पर तसल्ली रहेगी

आगे सारा फैलाव
कदम कदम
जितना था आगे सब पार किया
जो ख़त्म किया
अब पीछे है

अकेला होना उतना बुरा नहीं

एक शाम के इंतज़ार में
चौराहें सारे देखेंगे !





Thursday, 23 June 2016

तबियत ख़राब नहीं है, पीरियड्स हैं

कक्षा ग्यारहवीं। मासिक धर्म के पांचों दिन खत्म हो चुके थे। रोज़ाना की तरह मैं साइकिल से घर लौट रही थी, और किसी शारीरिक समस्या के कारण मुझे पुनः रक्त-स्राव हुआ और मुझे इसका अहसास तक नहीं हुआ।  स्कूल यूनिफॉर्म भी सफ़ेद थी। रास्ते भर मैं अनभिज्ञ रही, इसलिए अगर किसी ने देखा भी हो ( जो कि देखा ही होगा )  तो मुझे एहसास ही नहीं था। घर लौटने पर ट्रिन -ट्रिन के साथ मम्मी ने दरवाज़ा खोला और मेरे कपड़े देखकर हैरान रह गई। मैंने पलटकर देखा तो खून से सनी स्कर्ट देखकर जो पहला ख्याल आया वह था - 'न जाने रास्ते भर कितने लोगों ने देखा होगा' और पहला सवाल था 'पापा और भाई घर पर तो नहीं हैं?' छिपते-छिपाते मैं बाथरूम तक गई और ये ख्याल बहुत बाद में आया कि यूँ एक ही माह में दोबारा मासिक स्राव का होना कितना असामान्य है। उल्टा ये ख्याल बुरी तरह हावी रहा कि कितने अजनबी लोगों ने मेरी स्कर्ट देखी होगी। मैं खुद को अपमानित महसूस कर रही थी।  

पिछले दिनों पीरियड्स से लथपथ कपड़ों पर एक लड़की की ज़बरदस्त हूटिंग की गई, उसने खुद को इतना ह्यूमीलीएट महसूस किया कि आत्महत्या कर ली (खबर कितनी सही थी मैं नहीं जानती, ढूँढ़ने पर भी पुनः वह लिंक उपलब्ध नहीं हो पाया) लेकिन एक सामान्य सी सोच है।  पेट दर्द है, क्रैंप्स हैं लेकिन कहा जाता है कि तबीयत खराब है, यह कहते हुए नहीं पाया जाता कि मेंस्ट्रुअशन हैं। सेनेटरी नैपकिंस छिपाकर खरीदे व रखें जाते हैं। डिस्पोज़ तो उससे भी ज़्यादा छिपाकर। ऐसे में अगर वही लाल रंग आपके कपडों पर फैलकर दिखने लगे तो कहना ही क्या ! इस खबर में सच्चाई हो या ना हो, लेकिन ये बात नकारी नहीं जा सकती कि तमाम तरह के स्त्रीवादी विमर्शों के बावजूद हमारा समाज स्त्रियों और उनकी समस्याओं के प्रति अभी तक असंवेदनशील ही बना हुआ है। इसे शर्म का विषय मानते हुए लड़कियों ने कोड लैंग्वेज तक ढूंढ निकाली है, वे कहती हैं 'आय एम डाउन' ! मुझे लगता है पीरियड्स के दौरान जो महसूस होता है उसे 'डाउन' शब्द से जताना बिलकुल अनुचित है। जो है वही कहा जाए यही सबसे बेहतर है। 

A Spanish female group has made a public statement by wearing white pants covered in menstrual blood stains. ( Source  : Google)
पीरियड्स को लेकर लड़के और लड़कियों दोनों में अज्ञानता है , उसे दूर होना चाहिए। यदि इस पर खुलकर बात की जाए तभी लड़के इसे सही तरह से समझ पाएंगे और लड़कियां अपनी अकारण शर्म और झिझक से मुक्ति पा सकेगीं। ज्ञान के स्तर पर इस प्रक्रिया को समझना दोनों के लिए महत्वपूर्ण हैं। अकादमिक तौर पर यह जानकारी जिस गम्भीरता के साथ दी जानी चाहिए, नहीं दी जाती। मुझे याद है कि नवीं कक्षा में विज्ञान का  'रि-प्रोडक्शन' अध्याय कैसी जिज्ञासा पैदा करता था लेकिन उस पाठ को बस खानापूर्ति की तरह पढ़ाकर हमारी शिक्षिका अवश्य ही कोई नैतिक धर्म का पालन कर रही थीं। खैर ! फिलहाल कुछ उद्धरण यहां उद्धृत कर रही हूँ, जिससे कम-से-कम यह समझ विकसित हो सके कि यह एक सामान्य शारीरिक प्रक्रिया है जिसमें उत्कंठा और शर्म दोनों का कोई स्थान नहीं होना चाहिए। 

"ज्यादातर महिलाएं माहवारी (Menstrual cycle) की समस्याओं से परेशान रहती है लेकिन अज्ञानतावश या फिर शर्म या झिझक के कारण लगातार इस समस्या से जूझती रहती है। यह भी बता दें कि माहवारी है क्या. दरअसल दस से पन्द्रह साल की लड़की के अण्डाशय हर महीने एक परिपक्व अण्डा या अण्डाणु पैदा करने लगता है। वह अण्डा डिम्बवाही थैली (फेलोपियन ट्यूब) में संचरण करता है जो कि अण्डाशय को गर्भाशय से जोड़ती है। जब अण्डा गर्भाशय में पहुंचता है तो रक्त एवं तरल पदाथॅ से मिलकर उसका अस्तर गाढ़ा होने लगता है। यह तभी होता है जब कि अण्डा उपजाऊ हो, वह बढ़ता है, अस्तर के अन्दर विकसित होकर बच्चा बन जाता है। गाढ़ा अस्तर उतर जाता है और वह माहवारी का रूधिर स्राव बन जाता है, जो कि योनि द्वारा शरीर से बाहर निकल जाता है। जिस दौरान रूधिर स्राव होता रहता है उसे माहवारी अवधि/पीरियड कहते हैं।" (मासिक धर्म : विकिपीडिया) 

बीबीसी के द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों को यदि सही मानें तो प्रतिदिन लगभग 1 करोड़ महिलाएँ मासिक स्राव से गुज़रती हैं। ज़ाहिर है जिसकी अवधि 2-7 दिन होती है। दुनिया की आधी आबादी के सत्य को स्वीकार करने में अभी तक, 2016 के अत्याधुनिक युवा तक को इतनी कठिनाई है तो सोचिये अभी कितनी लंबी यात्रा तय करनी शेष है। जिसकी शुरुआत पीरियड्स पर बात करने, झिझक से मुक्त होने से की जा सकती है। हर माह दर्द  से कराहते हुए मैं कहूँगी तबियत खराब नहीं है, पीरियड्स है। आप कहेंगी?

Saturday, 28 May 2016

माँ

जिस मोड़ से
आगे बढ़ गयी थी माँ
वहाँ से मैं कुछ और माँ जैसी हो गयी थी
माँ की साडी में लिपटकर
सारे रंग बिखर गए थे मेरी देह पर
माँ सा हो पाना बस एक ख़्वाब है

घर लौट लौट आना होगा
 वो घर को सहेजे रखेगी
कि शाम तक सारे पंछी
किस्सों की दुनिया से आएँगे
और वो सुनकर बस मुस्कुरा देगी

आसमान का आखिरी टुकड़ा वो बचाकर रखेगी
मेरी हर उड़ान के लिए
मेरा सारा स्नेह बस इस कविता तक सिमटकर रह जाएगा

उस मोड़ पर आँसू अब भी होगा क्या
उन कमरों में छूट गया सामान अब कहाँ होगा
सोते हुए कितनी निरीह लगती है माँ
सूखे अधखुले होंठ
जिन्हें चूमने से खरगोश के जैसे चौंक जायेगी माँ

कितनी बड़ी तसल्ली है कि
सब तरफ से ठुकराये जाने पर
गले से लगा लेगी माँ
मेरी चंदा कहकर
छिपा लेगी ।

Wednesday, 25 May 2016

लिए जाती है कहीं एक तवक़्क़ो ग़ालिब

अभी कुछ दिन पहले दिल्ली से लौटते हुए एक अजीब अनुभव हुआ। अचानक से विमान टूटी सड़क पर चलते  टू व्हीलर की तरह हिचकौले खाने लगा। सीट बेल्ट्स के संकेत दिए गए। यात्रियों को अपनी सीट पर बैठे रहने और टॉयलेट ना जाने के निर्देश दिए गए। मौसम खराब होने के कारण आधा घंटा विमान बादलों में घूमता रहा। मुझे लगा अगर आज यह विमान क्रैश हो जाए तो क्या हो ! मुझे डर नहीं लगा एक रोमांच हो आया। मैं रौशनी से भरे बादलों को आँखों में भरने लगी और विमान दुर्घटना में खुद को मृत समझने लगी (ये ख्याल बाद में आया कि मेरे अलावा भी विमान में जीवन से लबालब भरे लोग हैं जो कहीं पहुंचना चाहते हैं) मैंने चाहा कि मैं सोचूँ कि मेरे न होने से मुझसे जुड़े किस व्यक्ति को क्या फर्क पड़ेगा। एक रील आँखों के सामने चल पड़ी, एक के बाद एक चेहरा आँखों के सामने दौड़ गया लेकिन हैरानी तब हुई जब खुद का चेहरा आँखों में आ टिका। अमूमन मैं चाहूँ भी तो अपना चेहरा नहीं सोच पाती हूँ, लगता है कि कभी अपने हमशक्ल से सामना हुआ तो अजनबी की तरह गुज़र जाऊँगी। पर वह मेरा ही चेहरा था अपने शव के सामने बैठकर रोता हुआ। अपनी अधूरी इच्छाओं पर बिलखता हुआ। उन जगहों का अफ़सोस करता हुआ जहाँ मैं नहीं हो सकी। उन तस्वीरों पर आँसू गिराता हुआ जिनमें मैं मुस्कुरा नहीं सकी। उन पलों को भिगोता हुआ जिन्हें मैंने अभी तक जिया ही नहीं। क्या हमसे ज़्यादा प्यार हमें कोई कर सकता है ! मुझे लगता मेरा मुझसे सच्चा दोस्त कोई नहीं। मैं खिड़की से बाहर देखते हुए  अपनी काल्पनिक मृत्यु पर आँसू बहा रही थी और खुद को मन ही मन दुलार रही थी। ज़िन्दगी सचमुच अपने निकृष्टतम रूप में भी मृत्यु से बेहतर है वर्षा वशिष्ठ ! 

Saturday, 9 April 2016

घंटी यूँ ही गूंजती रहेगी...



     उस दिन अक्षित और नीरजा के बीच कुछ तो हुआ था जिसे सतीश नहीं समझ पा रहा था. नीरजा का आँसुओं  में भीगा तमतमाया चेहरा सतीश के मन में अक्षित के लिए गुस्सा और नफ़रत भर रहा था. सतीश की आँखों से उपेक्षा का जो भाव टपक रहा था उसे अक्षित समझता था. वह समझ चुका था कि कारण बताये जाने पर भी सतीश की अदालत में वह अपराधी ही रहेगा. यूं  भी खुद को वह अपराधमुक्त नहीं समझता था. नीरजा बस इतना भर कह पाई कि....वह जीना नहीं चाहता ! यह सुनकर भी सतीश के मन में अक्षित के प्रति कठोरता कुछ और बढ़ गई . इस बेतुकी बात के लिए वह अक्षित को कोसता है और उसे नीरजा के दुःख का कारण समझता है. इस सबसे आहत अक्षित रुलाई में गुंथी हँसी हंसकर चला गया. दो रोज़ बाद वह सचमुच चला गया.



नीरजा अक्षित को चाहती थी. चाहना ऐसी जो आसमान में कड़कती  बिजली के जैसी है धरती को छुएगी तो कहर बनकर ही ! ऐसी ही तड़प नज़र आती थी इस चाह में. अक्षित ने ही पहले ज़ाहिर किया था कि वह नीरजा में एक साथी देखता है . नीरजा भी अक्षित को कुछ यूँ संजोती थी मानो उसे दुनिया से छिपाकर रखना ही एक विकल्प है. अक्षित जैसे कोमल लड़के के लिए परिस्थितियाँ कठोर ही जान पड़ती थीं . उसके कभी बहुत दोस्त नहीं रहे . होस्टल में भी बस दुर्ग्वेंद्र को ही उसके दोस्त की पहचान मिली थी . अक्षित को बहुत लोग जानते थे , पर क्या वे वाकई उसे जानते थे ! कितने ही लोग उसे जानने का दावा करते थे पर समझते नहीं थें. दुर्ग्वेंद्र और नीरजा के समीकरण भी अजीब थे . जैसे दोनों एक-दूसरे के प्रतिद्वंदी हों. यह प्रतिद्वंदिता नीरजा और दुर्ग्वेंद्र के साथ अक्षित भी समझता था. कॉलेज का दूसरा साल ख़त्म होने को था कि दुर्ग्वेंद्र और अक्षित के बीच बोलचाल ही ख़त्म हो गई. जाने क्या अनबन हुई कि इन दोनों दोस्तों ने एक दूसरे से दूरी बना ली. कोई और समय होता तो नीरजा चुप रह जाती पर तब जबकि वह खुद भी दुर्ग्वेंद्र को अक्षित के आस-पास नहीं देखना चाहती थी,ऐसे में उनके मन-मुटाव की वज़ह जानना उसे ज़रूरी लगा. शाम के धुंधलके में पढ़ते-पढ़ते पथराई आँखों को आराम देने के लिए अक्षित अधखुली किताब को अपने सीने पर सुलाकर लेट गया. सहमे कदमों से कमरे में कोई आहट किये बिना दुर्ग्वेंद्र ने आकर अक्षित के सूखे होंठों पर अपना चेहरा टिका दिया.




     हॉस्टल का खाना अक्षित को बिलकुल पसंद नहीं था. नीरजा अक्सर ही उसके लिए अपने घर से टिफ़िन ले आती थी. दुर्ग्वेंद्र का उस टिफ़िन और अक्षित दोनों पर अधिकार जताना नीरजा को कभी पसंद नहीं आया. उस दिन अक्षित नीरजा के लिए एक कविता लिखकर लाया था. डायरी नीरजा को दे ही रहा था कि दुर्ग्वेंद्र ने वह छीन ली और खुद पढने लगा. नीरजा और उसके बीच डायरी को लेकर खूब छीन-झपट हुई लेकिन अक्षित चुप खडा रहा. नीरजा के लिए अक्षित की दिनों-दिन गहराती चुप्पी कभी अपमान तो कभी क्रोध का सबब बनती जाती. दुर्ग्वेंद्र तृप्ति को पसंद करता था. तृप्ति की ना से वह क्षुब्ध था. नीरजा और अक्षित को साथ देखकर उसे अपना अकेलापन और भी खलता. इस भावना से बचने के लिए वह अक्षित की दोस्ती में ही अपनी दुनिया ढूँढने लगा.



     अक्षित भावनात्मक रूप से बेहद कोमल और कला-प्रेमी था. हर वस्तु, स्थिति, क्रिया, प्रतिक्रिया, क्षण, व्यक्ति, कृति को कला की नज़र से देखता. बचपन में छिपम-छिपाई खेलते हुए माँ के नाईट-गाउन में छिप जाने वाले अक्षित के लिए माँ की दुनिया बाकी दुनिया से बेहद अलग हो चली थी. स्त्री संरचना उसे बेहद आकर्षित करती. वह उस संसार में प्रवेश करना चाहता जिसे स्त्रियाँ हर दिन जीती हैं. हर उस परदे को हटा देना चाहता जो स्त्री और पुरुषों के लिए दो अलग संसारों को जन्म देता. वह कल्पना करता यदि वह स्वयं एक स्त्री होता ! वह समीकरण बनाता...वह और नीरजा...वह एक स्त्री और नीरजा, वह और दुर्ग्वेंद्र, वह एक स्त्री और दुर्ग्वेंद्र....वह निश्चित कुछ नहीं सोच पाता था . बेतरतीब सोच के  साथ उसके दिल और दिमाग में एक गुत्थम-गुत्थी चलती रहती. कभी वह दुर्ग्वेंद्र से सम्बन्ध ख़त्म करता तो कभी उसकी मानवीय  कमजोरियों को समझने की कोशिश में लग जाता.




     अक्षित की डायरी के पन्ने पलटते हुए नीरजा अचानक ठिठक गई. ‘अक्षित शशांक- १९९०-२०१२’ क्या मतलब था इसका. सवालों के जवाब भी सवाल बन जाते थे. हर तरफ सवाल थे. अक्षित, नीरजा, दुर्ग्वेंद्र और सतीश सभी के ज़हन सवालों से भरे थे. हॉस्टल में अक्षित मनोरंजन के लिए किताबों को चुनता, पाठ्यक्रम से ऊबता तो मनचाहा पढता. थपेड़ों के बीच मार्क्स को पढा, वाम दल का हिस्सा बना  और जल्द ही उससे भी विदा ले ली. जून की गर्मियों में लगभग २ माह बाद  दुर्ग्वेंद्र अक्षित के कमरे में आया. इस दो माह की अवधि में अक्षित के लिए दुर्ग्वेंद्र आँखों में खटकती काँच की किर्च नहीं रह गया था. उसकी हालत पर उसे कुछ ममता हो आई. दुर्ग्वेंद्र के आँसुओं में रही-सही खलिश भी धुल गई.




     ब्रायन कहीं खो गया, एक दिन अचानक वह लौट आता है. वह  बहुत बीमार है. छू देने से ही शरीर गलने लगता है. उसके जिस्म पर जगह-जगह ज़ख्म हैं, उनसे मवाद रिस रहा है. वह कहना चाहता है कि मुझे मत छूना...इतने में जस्टिन ने दौड़कर उसे गले लगा लिया वहीँ उसी क्षण में ब्रायन की पूरी देह पिघल कर तरल हो गई. ज़मीन धसकती जाती है जस्टिन उसमे गिरता जा रहा है, वह जितना बाहर आना चाहता है उतना ही और और और धंसता जाता है. वह चिल्लाना चाहता है पर आवाज़ बाहर नहीं निकलती. उसका दम घुटता जाता है. काला कीचड उसकी नाक और मूंह में भरने लगता है. अक्षित हडबडाकर उठ बैठा. उसकी कनपटियों से केशों से चू रहा पसीना झाँकने लगा. बीती रात जस्टिन-ब्रायन के बारे में सोचते-सोचते उसकी आँख लग गई थी. इस सपने में उसे लगा जैसे वह जस्टिन हो गया है, जो अब बच नहीं पायेगा. ब्रायन की देह का तेज़ाब उसे ख़त्म कर देगा. जो दुनिया अक्षित के बाहर थी उससे कहीं बड़ी दुनिया वह अपने भीतर लिए बैठा था.

                                              



     ‘नीरजा को बताना होगा कि मैं बंध नहीं सकता. किसी भी तरह का बंधन मेरी आत्मा को छीलता है’ अक्षित सोचता है. उसे कमरे की दीवारें कमोड पर पड़े खून के धब्बों से सनी हुई लगती हैं. जिसे वह चाहकर भी फ्लश नहीं कर पाता. खून से सनी दीवार पर नीरजा की आँखें उभर आती. उसे लगता जैसे उसके केश बढ़ते जा रहे हैं और उसी के गले में लिपटते हुए उसके प्राण ले लेंगे. एक और रात बीत जाती. एक और सुबह नज़र आती. दिन डूबता और रात फिर आती. अनंत...अंतहीन रातें. कमरे की दीवारें रोज़ और करीब आ जाती. ‘मुझे अकेले डर लगता है नीरजा ! बहुत डर लगता है ! मुझे अपने घर रख लो ! मैं यहाँ हॉस्टल में रहता हूँ तो आँखें बस पंखें पर टिकी रहती है’ ‘तुम यूँ दिन-भर कमरे में बंद मत रहा करो, और देखो जो आज-कल रात-रात भर कामू को पढ़ते रहते हो उसे भी कुछ दिन तक भूल जाओ समझे. और अकेले कैसे हो? कोई हो या ना हो मैं हूँ, समझे !’  नीरजा है...वो हमेशा रहेगी...पर उसे नहीं रहना चाहिए, वो नहीं जानती क्योंकि...वह है...उसे नहीं होना चाहिए...



    
     ‘आजकल तुम और दुर्ग्वेंद्र एक-साथ पढाई करते हो !’
‘हाँ वह रोज़ आता है.’
‘अच्छा’ संक्षिप्त संवाद के बाद नीरजा और अक्षित के बीच अब अमूमन मौन पसरने लगा था.
‘सुनो नीरजा, मुझे भी यूँ दुर्ग्वेंद्र का आना पसंद नहीं’
‘तुम मना कर सकते हो.’
‘हाँ, मना कर सकता हूँ.’
‘तुमने दिसंबर का नेट का फॉर्म भरा?’
‘नहीं, उसकी ज़रुरत नहीं पड़ेगी’
‘मतलब?’
‘२०१२ में क़यामत जो आने वाली है’
‘मुझे तुम्हारे ये बेतुके मज़ाक पसंद नहीं’
मुझे तुम्हारा यूँ मुझपर अकड़ दिखाना बहुत पसंद है. शादी के बाद गुलाम बनकर रहूंगा तुम्हारा, फिर चाहे कोई कुछ भी कहे हमें’
‘हाहा गुलाम बनकर रहोगे ! बड़े आये!’ खामोशी.
‘अक्षित ! तुम हमेशा रहोगे ना?’
‘तुम्हारा चेहरा देखकर कहता हूँ, मैं हमेशा रहूँगा.’
   




नीरजा सवेरे जल्दी ही उठकर तैयार हो गई. रात ही अक्षित ने कहा था बहुत देर मत करना, मैं इंतज़ार करूँगा. ‘अगला स्टेशन वेलकम  है, दरवाजें दाईं ओर खुलेंगे कृपया सावधानी से उतरें’ अक्षित फ़ोन नहीं उठा रहा है. शायद नहा रहा होगा, नीरजा ने सोचा. अगला स्टेशन शास्त्री पार्क.....अक्षित फ़ोन नहीं उठा रहा है....स्टेशन बीत रहे हैं....घंटी गूंज रही है....अगला स्टेशन कश्मीरी गेट है....


१०


     ‘हेल्लो सतीश! अक्षित ने.... और दो दिन पहले की सारी उपेक्षा, लानतें खुद सतीश पर आ गिरी है. अब अक्षित फ़ोन नहीं उठाएगा...घंटी यूँ ही गूंजती रहेगी....    
    




Saturday, 26 March 2016

1.

खाल तक उधेड़कर 
नंगा करो
माँस को नोंचो
खुद को छीलों
नहीं बचने देगा
अपराधबोध !
देह नहीं आत्मा को बचाओ
उस बदसूरती को भी बचाओ
जो खूबसूरत की पहचान कराये
कितने करोगे क़त्ल !
अब ठहरो
उस बच्ची का चेहरा आँखों में भरो
जो रोज़ दे जाती है 
मुट्ठी भर सांसें
प्यार जितना
सारा खुद से
मुझमें ब्रह्माण्ड
हवा हूँ
पानी और आग भी
रात रात भर पीना इतना
कि कलेजा जलकर छलनी हो सके
हँसना ऐसे कि अंतड़ियाँ उबलकर
मुँह से बाहर आ सकें
नसों में जो तनाव है
उसे खोलो रे
कोई आओ 
हमें बचाओ
क्या कहीं कोई है 
जिस तक पहुँचती हो हमारी आवाज़
यूँ फड़कते होंठ 
पपडा कर झड़ जाएँगे एक दिन
एक अंतिम गीत वेदना का
आओ सुन लो
एक शाम यहीं गुज़ार लो
थोड़ी सी ज़िल्लत और सही !

Tuesday, 9 February 2016

परछाई

और ये उस समय की बात है
जब लाल रंग का  गिलगिला सा लोथड़ा काँपता सा
उसके आकार से नहीं मिलते सुराग उसकी पहचान के
ये विचारों की भ्रूण हत्या का दौर है
दो टाँगों के बीच दबाकर गला
पूछा जाता है हाल
दम साधकर कह दीजिए-
ठीक हूँ !
अब आगे बढ़िए जनाब
कि आप तो परछाई समझ बैठें !
बिला वज़ह यूँ छोटा ना कीजिए ख़ुद को

सूरज की दिशा बस बदलने ही वाली है !






Saturday, 2 January 2016

पहेलियाँ

परिदृश्य में बस कुछ बिखरापन

जमीं से उगते हैं 
आधा दर्ज़न हाथों के जोडें
कमरे की दीवारें कुछ और क़रीब खिसक आई हैं
सुराख़
फर्श पर ख़ून के धब्बे 
हर तरफ सीलन और भीगापन
छत के पंखें के पास कुछ चेहरे जैसा उभरता है
कुछ दोस्तों की हँसी गूँजती है
बंद पड़ा रेडियो अचानक बज उठता है
कमरे में दरवाज़ा कोई नहीं
तो अंदर हूँ कैसे ! 

पहेलियाँ !

Friday, 1 January 2016

How much Dowry are you worth!

Courtesy: Google
• इंजिनीयर है तो एक कार और 10 लाख कैश
• इकलौता बेटा प्लस इंजिनीयर है तो एक कार और 25 लाख कैश
• स्कूली मास्टर है तो एक कार या 5 लाख कैश से काम चला लिया जायेगा।
• इससे अलग फर्नीचर, टी वी , वाशिंग मशीन लत्ता-कपड़ा गहने तो आप समझते ही हैं।

यह भी दिलचस्प है कि दहेज़ की मात्रा लड़के की योग्यता पर घटती-बढ़ती है, लड़की की पढ़ाई-लिखाई यहाँ प्रभावहीन ही बनी रहती है।

मुझे याद है स्कूल में हम 'दहेज कुप्रथा' पर निबंध लिखा करते थे , ठीक वैसे ही जैसे 'पर्यावरण' विषय पर लिखते थे। अब उन निबंधों के बाद कितने नन्हें पौधे उगाए हमने यह खुद से पूछना चाहिए। कितनी लड़कियों ने खड़े होकर कहा कि ऐसा व्यापार मेरी शादी में नहीं चलेगा। कितने लड़कों ने कहा कि शादी में गिफ्ट्स-तोहफों के रूप में भी एक रुपया नहीं स्वीकारूँगा। लड़कियों की ज़िम्मेदारी क्या माता-पिता के इशारों से होते हुए स्टेज पर फोटोग्राफर के इशारे पर नथनी पकड़कर फोटो खिंचाने तक ही है !

दहेज़ निषेध अधिनियम,1961 के अनुसार दहेज लेने, देने या इसके लेन-देन में सहयोग करने पर 5 वर्ष की कैद और 15,000 रुपये के जुर्माने का  प्रावधान है। यह तो हुई कानून की बात ! श्रीलाल शुक्ल के शब्दों में 'कानून की तलवार से कानून की ढाल ही बचाती है'।

जहाँ एक ओर लड़कियों की उपलब्धि का पैमाना यह मान लिया गया कि उससे विवाह के लिए इंजिनीयर, डॉक्टर, वकील के प्रस्ताव आ रहे हैं वहीं दूसरी तरफ लड़कों की उपलब्धि है 25 लाख 30 लाख 40 लाख !
एक बात और, ये धनाढ्य लोग चाहे लड़की पक्ष से हो या लड़के पक्ष से अपनी हैसीयत से ख़ूब जोरदार व्यापार-खिलवाड़ करते हैं...पर गरीबी तो आज भी आग की लपटों में झुलस रही है। यह पढ़ी-लिखी आधुनिक नई पीढ़ी जो मुँह पर ताला लगाये नागिन डांस करती हुई झूम रही है ये हत्यारे हैं असल में! दहेज के नाम पर जलाई जाने वाली लड़कियों के हत्यारों के हाथों में इन्हीं लोगों ने तो केरोसिन और माचिस की तीली पकड़ाई है अपनी चुप्पी से।
गूगल से साभार


अब या तो विरोध कीजिए या हिसाब लगाइए- How much dowry are you worth !

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...