Saturday, 9 November 2019

आसमान तब गिरता है
जब हम माँगते हैं
जो मिला नहीं हमें
धरती तब खिसकती है
जब हम छोड़ देते हैं माँगना
उगते हैं हम
अँधेरों में
जब सीख जाते हैं उसमें जीना
और देखना..

पहाड़ों को उठाना
समंदर को पी जाना
वक़्त की बात है

पुराने कैलेंडर बदलना मग़र
बहुत ज़रूरी बात है...

Thursday, 12 September 2019

आज पूरा शहर घर जल्दी पहुँचना चाहता था
क्योंकि कोई घर पर नहीं रहेगा
एक जनसैलाब सड़कों पर उतरने वाला था
मुझसे कहा गया कि ऐसा "भव्य" दृश्य ज़रूर देखूँ
कैसे मैं सड़कों पर इकट्ठा हुए हुजूम में शामिल हो जाऊँ
कैसे ना सोचूँ कि कैसे कोई बीमार पहुँचेगा अस्पताल तक
आज कोई इस शोर से परेशान कह रहा था
कि दो दिन पहले मुहर्रम थी
पर ऐसा शोर नहीं हुआ
मुझे लगा
लोग भूल चुके हैं क्या
फ़र्क़ करना
उत्सव और मातम में
या शायद सेकुलरिज़्म में छेद इतने हैं
कि हिन्दू-मुसलमान का झंडा उठाये बिना
किसी कुरीति पर वे बोल ही नहीं सकते

मुझे शक हो रहा है
अपने पर
कि कुछ हजम क्यों नहीं होता
न ये न वो
बिस्तर पर रोज़ सुबह ख़ुद को सुलाकर
घर से बाहर निकलती हूँ
भूल आती हूँ ख़ुद को
नहीं भूलती पर छतरी
इस शहर में बरसात कभी भी हो जाती है

इन सब का एक ही इलाज मुझे पता था
मुँह तक चादर ढाँपकर सो जाना

पर उसकी मोहलत ही कहाँ थी!

Wednesday, 11 September 2019

चौराहें

चौराहें
जो डराते रहे
कभी लगता है
चार नए रास्तें
पुकारते हैं
और वो बस लालच है, डर नहीं
हर नए रास्ते पर चलने का रोमांच
अपने सफ़र से प्यार है ये
अपने तजुर्बों से मोहब्बत
सच कहूँ
तकलीफों में भी कहीं
अच्छा लगता है
चलना
सोचकर कुछ या कभी बिना सोचे ही
चौराहे पर चुन लेना कोई एक रास्ता
जो लगे कभी कि ग़लती हुई तो
लौट आएँगे
जैसे कहा है मेरे प्रिय कवि ने
कि वहाँ से जो होता है लौटना नहीं होता
नई यात्रा होती है

सपने तो आख़िर देखेंगे ही ।

Friday, 3 May 2019

आँखें कभी मत उठाकर देखना
जब ज़रुरत के वक़्त कोई आए पास

हाथ बढाते हुए कभी मत कहना
मैं समझता हूँ

ढह जाएगा एक पूरा क़िला

इसके दोनों अर्थों से वाक़िफ़ हूँ मैं भी

क्या किया किसने किसके साथ 
इसका हिसाब भी कभी मत रखना
होंठों को गोलकर फूँक मारना एक
जलती हुई आँखें बुझेंगी
पिघलते हुए दिलों का बचा रह जाएगा कोई आकार



Friday, 5 April 2019

चेहरा


क्या हो अगर एक दिन मैं अपना चेहरा छूने की कोशिश करूँ 
और बस हवा हाथ लगे

क्या इतने साल मैंने अपना चेहरा पहचानने की कोशिशों में ही नहीं बिताएं?
हज़ारों-लाखों साल से इस धरती पर मैं जैसे बस एक शरीर लिए फिरती हूँ
जिसका कोई चेहरा नहीं
जिस पर बड़ी आसानी से फिट हो जाता है 
तेज़ दौड़ती मोटरों के बीच सड़क पार करने वाला कोई भी सहमा सा चेहरा
मेट्रो में अपने छोटे से पिटारे से कभी न मिल सकने वाली पेन्सिल ढूंढती परेशान कोई लड़की
जिसकी किताब में रेखांकित नहीं हुई वो बात जो छप चुकी है मस्तिष्क में

कम शब्दों में कहूँ अगर
तो कोई भी ऐसा शख्स 
जिसने बोई हों दीवारें अपने इर्द-गिर्द 
और फिर बहुत रोकर बनायी खिड़कियाँ...  

Tuesday, 2 April 2019

आत्मा और ख़ंजर

लड़ते रहे हज़ार लड़ाइयाँ हर दिन
मरते रहे हज़ार मौतें भी

हर सुबह होता पुनर्जन्म
हर रात सोते एक आख़िरी बार

बार-बार

कैसे करे उन शब्दों पर भरोसा कोई
जिनकी आत्मा में खंजर हों कई

यूं कहना कि आत्मा मर चुकी है
ऐसी बात नहीं है
आत्मा मरती नहीं
पर पलायन कर जाती होंगी शायद

फिर वहाँ नहीं मिलती
जहां ढूंढते रहे हों हम हर मौत से पहले अपनी

जहाँ मैं हूँ
वहाँ सुरक्षा की सभी सम्भावनाओं से परे हूँ
यूं नहीं होना था
कि मुझे महसूस होता डर
और तुम भी होते

होना था तुम्हें
लेकिन डर..

Friday, 29 March 2019

वीड

एक जंगली पौधा
जो नहीं पनपने देता अपने आस-पास दूसरे पौधों को
उसे उखाड़ फेंकते जड़ों से लोग

फ़िर कुछ लोगों ने प्यार करना शुरु किया
उस पौधे से
अपने प्यार में वे क्रूर होते गए तमाम दूसरे पौधों के प्रति
प्यार को कैसे करें परिभाषित

बात लेकिन ये है
कि फ़िर कभी नहीं खिले फूल ..

Monday, 25 March 2019

हमारी दुनिया में

ये जो हमारी दुनिया है
इसमें कमज़ोर लोग ज़्यादा हैं
पर ताक़तवर लोगों की शक्तियाँ 
कमज़ोर लोगों की कुल जमा कमज़ोरियों से ज़्यादा हैं

कारण?

जिन लोगों के पास 
शक्तियां नहीं होती 
होती है बस कमज़ोरियां 
वे अपने से शक्तिमान लोगों को
नहीं सौंप पाते अपनी कमज़ोरियों के सिवाय कुछ भी 
जैसे कहते हैं कि कुछ लोग ब्रह्मास्त्र अर्जित करते थे लंबी तपस्याओं के बाद
ऐसे ही अर्जित की जाती हैं कमज़ोरियाँ 
इंसान बनने की लंबी तपस्या के बाद

एक एहसास है 
जो हर झड़ते पत्ते के साथ 
अपनी अन्यतम शांति में कहता है
कि दुनिया को आज भी
कैंचियाँ नहीं इंसान चाहिए 

कमज़ोरियों का ये बखान मैं यूं ही नहीं कर रही हूँ
इसमें कुछ तथ्य है
इसमें मेरी अभी तक ली गयी तमाम श्वास हैं

हम भूल जाते हैं अक्सर
कमज़ोरियां ही 
हमारी ताक़त थी 
जिसे अब शक्तिशाली लोग इस्तेमाल करेंगे 

हमें अपनी कमज़ोरियों को वापस हासिल करना है 
फिर से उतना ही शक्तिशाली होने के लिए 
जितने होते हैं दुनिया में कमज़ोर लोग
क्योंकि कमज़ोर लोग कैंचियाँ नहीं हो पाते । 

Friday, 22 March 2019

मन नहीं टूटेगा

उन्हीं में खोजना था सब 
जिन्हें लगता था 
बुद्धि के अंकुर उन्हीं के आँगन में फूटे थे पहली बार 

सबको देखना था 
एक सिरे पर ठहरकर 
किनारे जब टूटे 
तो बह गया बहुत सा वक़्त

हर बार साबित करना था 
उनके सामने जो जाने जाते थे
ना आंकने के लिए आदमी की औकात

मुझे बस तुमसे कहना था 
कि मत तौलना कभी दुनियावी पैमाने पे
किनारे टूटेंगे 
लोग छूटेंगे
लेकिन मन
मन नहीं टूटेगा 
जो तुमसे जुड़ा।  

उदास लड़का

एक कमरा है
एक खिड़की
एक लड़का है
खिड़की से धूप दीवार पर कोई चित्र सा बनाती है
चित्र पर मेरी पीठ छपती दिखाई देती होगी
पीठ पर चित्र

तस्वीरों में आईने नज़र आते हैं

धूप क्या हमेशा मुट्ठी में भरकर उम्मीद फेंकती होगी कमरे में
या कभी मन को राख भी करती होगी
धूप सबकी अलग-अलग जो होती है

कभी कोई भरम कोई जादू हो जाता है लड़का

उदास लड़का

Thursday, 28 February 2019

माँ, आवाज़ और सन्दूक

मुझे याद है
जब शुरु किया मैंने 
अपना इलाज
तो सबसे पहले
क़ैद में लिया अपने दिल के उन हिस्सों को 
जिन्हें तुमने चुना मेरे ख़िलाफ़ 
और यह भी ग़ौरतलब रहा कि 
तुम्हें कभी ख़ला नहीं मेरे एक हिस्से का यूँ अपाहिज़ हो जाना
मैं अपनी नींद में देखती तुम्हारा जागना  
मैं देखती कैसे रगड़ते जाते तुम माथा अपना
मेरी उँगलियाँ जागती
एक सदी सो चुकने के बाद
पहुँचती तुम्हारे पास तक
मुझे कुछ पुकारता
मैं पहचानती हूँ
अँधेरे की आवाज़ें भी
पर ये मेरी माँ की आवाज़ है
हज़ारों सालों से लोहे के एक बड़े से सन्दूक में बंद
सन्दूक जब-जब खुलता
माँ का जीवन भी खुलता
17 साल की लड़की के सपने
हर साड़ी की एक कहानी
जीवन में खायी तमाम चोटें, धोखें
माँ के किस्से मुझे लगता है मैं तब से सुनती आ रही हूँ
जब जन्म नहीं हुआ था मेरा
या शायद माँ का
मुझे इस क़दर याद हैं सब बातें 
कि जानती हूँ
कब 'हूँ' और हूंकारा देने से उन्हें होगी तसल्ली
कि सुन रही हूँ मैं
सच कहूँ तो कई बार सुनती नहीं हूँ मैं
बस 'हूँ' कहती जाती हूँ
सोचती हूँ हर बार एक ही ढंग से कैसे कही जा सकती हैं इतनी बातें
कितनी बार मन में दोहराई होंगी 
क्यों सन्दूक में बंद हैं इतने दुःख

तुम तक पहुँचने, जागने और सो पाने की लड़ाई में
कितनी बार किसी गड्ढ़े में गिरने से बचाया मुझे एक आवाज़ ने
"सो गई?"
कहीं से ख़ुद को खींचकर लाती हूँ मैं
अपनी भरसक कोशिश से सामान्य आवाज़ में कहती हूँ
"नहीं तो, सुन रही हूँ"

Monday, 28 January 2019

यूँ ही होता है

मेरे पड़ोस में एक औरत
जब भी मेरी तीन साल की भतीजी को देखती है
तो उसे छेड़ने के लिए उसकी चीजों 
मसलन उसके कपड़े, टोपी या कोई गुड़िया
देखते ही कहती है 
"ये मेरा है, इसे मैं अपने घर ले जाऊँगी"
मेरी भतीजी चिढ़ जाती है
कभी कभी रोती भी है
फिर वह महिला हँसती है
मैं सोचती हूँ ये भी कैसा खेल है
जिसमें एक बच्चे को रुलाकर सुख प्राप्त हो रहा है
ऐसे कई भले लोग होते हैं 
जो रुलाकर हँसते हैं, उन्हें 'प्यार' आता है ऐसे
प्यार करना भी सीखना पड़ता है
लगातार सीखते रहना होता है
एक भले दिन रोई नहीं बच्ची
हाथ से गुड़िया फेंक दी
"तेरी है तो तू ही रख"
जीवन में भी शायद यूँ ही होता है
रोना छोड़ देते हैं लोग।

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...