Wednesday, 5 April 2017

'पिता' क्या तुम तक मेरा गिडगिडाना कभी पहुंचता है?

वो कोई पहली रात नहीं थी
जब मोम गले का शरीर को जला रहा था
एक ख़त था पिता के नाम
जिसमें माँगा गया था
एक लड़की का लौटकर आना
यूँ ज़िंदा पिता से मैं कभी नहीं कह पाउंगी
कि एक लड़का जब अपनी साँसें मेरे चेहरे पर छोड़ता है
मैं उस अधूरेपन से मर जाती हूँ हर बार
'पिता' क्या तुम तक मेरा गिडगिडाना कभी पहुंचता है?

No comments:

Post a Comment

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...