Tuesday, 27 August 2013

तलाश

खालीपन
खुद के वज़ूद की तलाश
जीवन की सार्थकता की तलाश
कहाँ ले जायेगी?

एक सुरंग
जिसमें है अँधेरा
और अंधापन
जो संकरी है
इतनी संकरी कि
एक अंगुली हिलाने
की भी गुंजाइश नहीं
साँसे उखड रही है
दम  घुट रहा है
पर चलना है
आखिरी सिरे तक पहुँचना है
इस उम्मीद के साथ
कि नज़र आएगा
खुला नीला आकाश
कैसा होगा वह खुलापन?

जब पलटकर देखेंगे कि
साथी उस सुरंग में
कहीं खो गए
वे चींखें
जिन्हें नज़रंदाज़ कर
हम आगे बढ़ते गए
कानों को चीरेंगी
लौटने का कोई
रास्ता न होगा
क्या पा लेंगे?

कहीं वह घुटन
और भी अधिक सघन
होकर बढ़ तो न जायेगी !
या कि बेहूदगी से
जश्न मनाएंगे ?

और भी काला
गहरा काला तम
चारों और पसर जाएगा !
या कि लम्बे समय से
अँधेरे की अभ्यस्त आँखें
चकाचौंध से अंधी हो जायेगी!

 कुछ भी न पा सकेंगे
पायेंगे तो केवल
एक नई तलाश
और
खालीपन।

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