Wednesday, 18 January 2017

दुःख कहीं नहीं

दुःख क्या है   ?

कहीं दुःख नहीं
सुख से मरी जा रही है दुनिया 
ये अघाये हुए लोग 
दुःख खोज रहे हैं 
और दुःख 
वो कहीं नहीं है 

छिपना चाँद जैसे 
कि अँधेरे में सोये दुनिया 
वही है अनुपस्थिति 
तारों में 
एक तारा जो टूटा 
तो मांग ली अपनी ख़ुशी 
मरे हुए पर 
कहानियाँ जिन्हें कहते हैं यातना 
और कुछ नहीं वही ख़ुशी है तुम्हारी 

क्योंकि दुःख 
दुःख कहीं नहीं। 


जाना हुआ नहीं

माथे पर शिकन तक ना पड़े
इतना सधा हुआ स्वाद
रोज़  हर रोज़
एक कप चाय
ऊब नहीं होती
एक ही खिड़की से देखते हुए
ठीक उसी इंसान को
जो भागा था एक रात
क़त्ल का खंजर पीठ में छिपा कर

 उस छोटी लड़की के पास से गुज़रना
जो गिनकर खाती थी बादाम
और कुछ याद नहीं रख पाती थी
वो जो अब तारीखें गिनाती है
इति से खेलती है
भव को डराती है


 रेल की पटरियों पर
खच-खच टुकड़ों में कटती
वो डोर पतंग की नहीं थी
और जो शब्द है झूठे
या काल्पनिक
फरेबी उन्हें चबा जाएँगे
बहुत दिनों तक याद किया जाएगा
उनका फरेब
इतिहास

उनकी चिट्ठियों पर चिपक जाएँगे
खून से लिथड़े होंठ
चूमेंगे ऐसे जैसे अपनी लाश
कि लिखना नहीं गुड़िया
ये घाव हैं
रुक जाना
जाना रुक

कि
जाना हुआ नहीं।

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...