Friday, 12 October 2018

खुशबू

हम चलते हैं
चलता है साथ कोई
सुनता हुआ हमारे अफ़साने, रोने गाने
शिकायतें

वे जो मिलते हैं दूसरे से पहले के साथ
पहले को बताते हैं कि कितने खुश है दूसरे के साथ
छोड़ जाते हैं कुछ कीड़ें पहले के दिमाग में

दीवार पर टांगना चाहता है वो एक चेहरा
जहां से उतारा गया था 
दीवार कहीं और की थी
जहाँ दृश्य में चेहरा तो था
पर रंग सारे अजनबी थे

रंग
यूँ भी बदल जाते हैं 
उतर जाते हैं
असर?
वे भी 
चेहरों के

मेरी आँखों पर हथेलियाँ रख उसने कहा कि दिखाना चाहता है हमारा घर
जो अभी तक घर है नहीं
कुछ दूर तक मुझे याद है
समन्दर की खुशबू थी
फिर गुलाब
फिर शब्द हुए सब

आँख जब खुली तो एक मैदान था
साफ़ आसमान के नीचे
बड़ा सा मैदान
मैदान से भी बड़ी थी मेरी हैरानी
फिर बताया गया मुझे कि दीवार नहीं होगी हमारे घर में
क्योंकि जिस तरह पहली बार बताया था मैंने अपने नाम का अर्थ उसे
तभी उसने सोच लिया था 
एक ऐसा घर, जहां दीवारें न हों

मैदान में बहुत से बीज डाले हमने

दूसरे को पहले पर रेंगते कीड़े नहीं दीखते
जब तक
हला उनके साथ जीना सीख नहीं लेता
फिर दीवार पर टंगा चेहरा चीखता है
अपने अन्दर की सारी क्रूरता के साथ
पहला चाहता है उस चेहरे को उतारना 
जिसे उसने नहीं टांगा था

एक खिड़की पर खड़ी थी मैं
फिर एक हाथ से लटकी थी 
उसी खिड़की पर
नीचे लोग जमा थे 
मैं जानती थी कि
मरूंगी नहीं
बचा ली जाउंगी
लेकिन पूछा जाएगा मुझसे
कि मैंने क्यों किया आखिर ऐसा 
और मैं नहीं समझा पाउंगी कि मैं बस खड़ी थी
खिड़की पर। 

उगी तो बस दीवारें
चाही तो बस खुशबू।  

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...