Friday, 26 January 2018

अधूरी कविताएँ 2

आख़िरी रात
सबसे ज़्यादा थी चाह
फड़कती बाजुओं को तुम्हारी
दे सकती आराम
जो मेरे गले से लिपटी थीं
आँखे जो चेहरे पर थी टिकी
कि पसीने की बूँद में
मिलेगा समंदर का नमक
और एक आसूँ भी कहीं तो
मेरे क़त्ल से अगली रोज़
मैं बता पाती कि
सारी नफ़रत जो तुम्हारी उँगलियों
और मेरी गर्दन के बीच थी
उसमें पछतावें
दुलराना था तुझे एक आख़िरी बार
मेरे क़ातिल ।


रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...