Monday, 26 October 2015

इस ब्लॉग को जब 2010 में बनाया गया था तो मेरी उम्र 18 वर्ष थी , साहित्य से परिचय था पर एक आत्मीय रिश्ता  बनना अभी बाकी था। खुद में सिमटे हुए से, बाहरी दुनिया से सहमे से लेकिन ऊर्जा से लबरेज़ वे कॉलेज के सुनहरे दिन थे। तब दोस्तियाँ आखिरी सांस तक निभाने के वादे थे , भविष्य के बड़े-बड़े रोडमैप थे, लगता था जीवन को पूरी तरह समझ चुके हैं बस अब इस रोडमैप पर चलना भर है। असाइनमेंट्स , प्रोजेक्ट्स , परीक्षाएँ, कक्षाएँ, कैंटीन, लाइब्रेरी, समोसा और चाय यही सब काफी हो जाया करता था। आज खुद अपनी उस मासूमियत पर प्यार आता है। पुरानी तस्वीरें देखकर उस भोलेपन को याद कर आँखें भर आती हैं। उन्हीं दिनों ज़िन्दगी की सबसे बड़ी नेमत को बहुत करीब से देखने का दौर शुरू हुआ... मैंने किसी को प्यार में पड़ते हुए देखा। उस उम्र में प्यार को जिस तरह समझा जाता है, ठीक वैसे ही समझा मैंने भी। प्यारा और खूबसूरत!  लड़की के चेहरे पर नूर था कि दिनोंदिन बढ़ता ही जाता था और लड़के की वैचारिकी और भी पैनी और भावपूर्ण होती जाती थी। दोस्त छेड़ते थे , ये लजाते थे। दिन बीतते जा रहे थे और ये किताबों में फूल खिला रहे थे। किताबें ताउम्र अपनी पनाह में रख पाती तो अच्छा था। खैर इसका ज़िक्र फिर कभी.… तब इस ब्लॉग को बनाते हुए सोचा था यहाँ केवल साहित्य , समाज और राजनीति होगी , अपने व्यक्तिगत जीवन को यहाँ लेकर नहीं आना है। पाँच सालों में पता चला कि खुद के अनुभवों से अलग कुछ है ही नहीं ! पता नहीं हम जीवन से मृत्यु की तरफ बढ़ते हैं या मृत्यु से जीवन की तरफ। बस इतना तय है कि जहाँ अभी इस पल हैं , दुबारा वहाँ नहीं होंगे। कितनों को पुकारना था  , कितनों के पुकारने पर लौट जाना था। इस गुज़रते समय का सच ये है कि खुद ही खुद के गले लगकर रात भर रोते हैं.…आज़ादी आज़ादी चिल्लाते हुए गला सूख जाता था अब इतनी दूर निकल आये हैं कि कुछ ऐसा बचा ही नहीं जो बाँधता हो। अब 2015 के अंत के करीब पहुँचकर लगता है नेमतों को दूर ही से सलाम कर नहीं समझा जा सकता....!

अपना कोना !

Friday, 16 October 2015

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बहुत दर्द होता है
दुःख नहीं कहा जा सकता इसे
ये दर्द ही है
थूक को बामुश्किल सटकते हुए
ऑंसुओं को घोटते हुए
समझना उस हर स्थिति को
जब नहीं रखा गया हमारा ख़्याल
जब सिखाया गया कि कितना ज़रूरी है ख़ुद की परवाह करना
तब क्यों नहीं बताया गया
कि इस क्रम में भी तुम बहुत बाद में हो
कि करनी पड़ती है कोशिश तुम्हे देखने के लिए
नायकत्व की कोई चाह कभी नहीं रही
एक बेहद साधारण सी ज़िन्दगी
जहाँ सिमोन को साथ लेकर
आलू और प्याज़ के बढ़ते दाम पर भी करना था गौर
पर ख़ुद अपनी कहानी में भी
हाशिये पर धकेल दिए जाने का दर्द
ख़ुद की कलम भी जब कहे कि तुम कौन?
सारे शब्द पहचानने से इनकार कर दें जिन्हें ख़ुद हमने चुना था
और अभी इस क्षण
हर एक हर्फ़ धुंधला है
कि कुछ है जो मिट नहीं सकता
कि कुछ है जो मिट जाएगा
कि जानते हुए भी सब कुछ मैं अनजान ही हूँ
अब क्यों लगता है कि क़त्ल की तैयारी है
और सबसे नर्म गर्दन पर ही चलेगी धार !

Wednesday, 14 October 2015

आत्महत्या

अद्भुत मुखौटा है
हँसता  है और
आँखों से लहू बहता है
उसे सज़ा मिली है
सज़ा मुस्कुराने की
मासूमियत की परतों को छील देती है
सिद्धांतों की धार
अपना सही बचाते बचाते एक दिन
हम गलत हो जाते हैं
और हमारे हिस्से सजाएँ आती हैं
फिर भी कहा जाता है
कि करो ख़ुद को साबित
निरपराध
विचित्र चुनौती है
सज़ा से भी कम नहीं होते गुनाह
गुनाह जो कभी किये ही नहीं गए
एक झरना फूटता है
पिघलती रौशनी का झरना
आदर्शों से भरी दुनिया में
सिमटता है सबकुछ
एकांत है
खामोशी
एक लम्हा आकर पास बैठ गया
सुनाने लगा कहानी अपनी
आँख से लहू के आँसू धुल जाए शायद
और वही नमकीन पानी फिर बह निकले
आज वह अपनी सज़ा की आख़िरी किश्त अदा कर रहा है
वह मुस्कुराता है
इस आदर्शों, सिद्धांतों से भरी मूल्यविहीन दुनिया पर
पहचानता है खुद के कुछ मूल्य
जो उसके अपने हैं
एक घटना ही तो है
आत्महत्या !
  

Saturday, 3 October 2015

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और यूँ ही एक दिन एक कहानी कह दी गई...एक कहानी अधूरी मगर पूरी मगर अधूरी..। शब्दों के पार...जहाँ इंसान सुनाई पड़ते हैं उनकी बातें नहीं। हर आवाज़ कुछ कह रही होती है..कीबोर्ड के बटन...लगातार हिल रहे पैर के जोड़ के चटकने की आवाज़...दिखाई देती है जहाँ से एक हवाई दुनिया...और सुनाई पड़ते हैं वे लोग जो साँसों को थोडा हल्का करें ..जहाँ से कोई खींचकर ना ला सके उन हवाई ख़ाबों से..कि चींखना ना हो खुद को सुनाने के लिए..जहाँ 'हाँ' पर 'ना' की ना हार हो ना जीत..जहाँ अभिव्यक्ति कभी आख़िरी ना हो..जहाँ बचा रह जाए कुछ जानने-समझने को...जहाँ नहीं लिखी जाती कोई कविता..शिकारी और परिंदों के सनातन बैर से परे का आकाश...जहाँ से दीखती हो तारों भरी धरती..एक ऐसी ही दुनिया की कहानी...कि ये एक कहानी ही थी..जिसे सुना जाना चाहिए था।

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...