Friday, 5 April 2019

चेहरा


क्या हो अगर एक दिन मैं अपना चेहरा छूने की कोशिश करूँ 
और बस हवा हाथ लगे

क्या इतने साल मैंने अपना चेहरा पहचानने की कोशिशों में ही नहीं बिताएं?
हज़ारों-लाखों साल से इस धरती पर मैं जैसे बस एक शरीर लिए फिरती हूँ
जिसका कोई चेहरा नहीं
जिस पर बड़ी आसानी से फिट हो जाता है 
तेज़ दौड़ती मोटरों के बीच सड़क पार करने वाला कोई भी सहमा सा चेहरा
मेट्रो में अपने छोटे से पिटारे से कभी न मिल सकने वाली पेन्सिल ढूंढती परेशान कोई लड़की
जिसकी किताब में रेखांकित नहीं हुई वो बात जो छप चुकी है मस्तिष्क में

कम शब्दों में कहूँ अगर
तो कोई भी ऐसा शख्स 
जिसने बोई हों दीवारें अपने इर्द-गिर्द 
और फिर बहुत रोकर बनायी खिड़कियाँ...  

Tuesday, 2 April 2019

आत्मा और ख़ंजर

लड़ते रहे हज़ार लड़ाइयाँ हर दिन
मरते रहे हज़ार मौतें भी

हर सुबह होता पुनर्जन्म
हर रात सोते एक आख़िरी बार

बार-बार

कैसे करे उन शब्दों पर भरोसा कोई
जिनकी आत्मा में खंजर हों कई

यूं कहना कि आत्मा मर चुकी है
ऐसी बात नहीं है
आत्मा मरती नहीं
पर पलायन कर जाती होंगी शायद

फिर वहाँ नहीं मिलती
जहां ढूंढते रहे हों हम हर मौत से पहले अपनी

जहाँ मैं हूँ
वहाँ सुरक्षा की सभी सम्भावनाओं से परे हूँ
यूं नहीं होना था
कि मुझे महसूस होता डर
और तुम भी होते

होना था तुम्हें
लेकिन डर..

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...