Friday, 1 April 2022

रास्ते

मैं जहां भी गई 

भागकर खुद से

मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं
कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी

जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल
और जूता पैर काटता हो

कहीं देखना चाहूं तो लगता है
कितनी परतें हैं आंखों पर जमा
उन्हें छू दूं तो बह जाएं रंग इंद्रधनुषी

वो कहां पहुंचते हैं
जिन्हें पता नहीं होता
कि कहां के लिए निकलें हैं

जो नहीं याद रख पाते दिशाएं
घर ढूंढ़ते हैं उम्र भर

ऐसा करते हुए
शायद बहुत से रास्ते उनके साथ हो जाते हैं
लेकिन जो साथ है
उसके बारे में वे सोचते तक नहीं

वे तो क्योंकि भूल आएं हैं अपना घर।

Monday, 21 September 2020

दुनिया

कहते हैं

दुनिया ठीक वैसी ही नज़र आती है

जैसे हम होते हैं

ऑटो वाला लंबा रास्ता चुनता है

मीटर भागता है

सहकर्मी अपना काम आपकी मेज पर खिसका जाते हैं

जो जैसे जितना फायदा उठा सकता है

उठाता है

हम देखते हैं

चुप रहते हैं

शायद एक पेड़ को वे बस पेड़ की तरह देखते होंगे

या नहीं जानते होंगे

चिड़िया का एक नाम चहक भी होना चाहिए

पेड़ का हरा

और बचपन का खुशी

किताब का रेगमार

हंसी आयी?

जो दिमाग का जंग साफ करे

वही रेगमार


तो क्या जो दिखाई देती है 

वो है मेरे अंदर की दुनिया

या वो जो मैं बनाती हूं अपने मन में

हर रोज़

थोड़ी और सुंदर

पिछले दिन से

वही है बस असली दुनिया



Monday, 6 January 2020

मैंने ख़ुद से इतनी बातें की
कि बाहर कुछ भी कहने के लिए मैं बहुत थक चुकी थी
मुझे लगने लगा कि 
पागलपन सवार हो रहा है मुझपर
ये सब बातें अब मैं बड़बड़ाने ना लगूं कहीं

दिसंबर का महीना था
दिल पर एक बोझ भी
सुबह हुई
मुझसे नहीं उठा गया लेकिन
ऐसी बीमार सुबहों में मुझे मेरे ज़िंदा होने पर ताज़्जुब होता रहा है 
दो दिन मैं घर में यूं पड़ी थी 
कि अब उठ नहीं सकूंगी कभी भी

मैंने पहले ही कहा
कह पाने के लिए बहुत थक चुकी थी मैं
मैं खुद में बहुत घुटी
गिनने चाहे अपने सारे पाप

शशि मर गया
प्रत्यूषा बैनर्जी मर गई
कुशल पंजाबी मर गया
कितने लोग हर रोज़ मर जाते हैं

कहते तो हैं सब
कि कह देना चाहिए था उन्हें
परिवार से
कुछ अपनों से
कि क्या है जो रात - दिन खाए जाता है उन्हें

पर क्या मर नहीं गए थे अपने सब 
उनके लिए 
उनके या अपने जेहन में
किसी एक
दिसंबर में ।


Saturday, 9 November 2019

आसमान तब गिरता है
जब हम माँगते हैं
जो मिला नहीं हमें
धरती तब खिसकती है
जब हम छोड़ देते हैं माँगना
उगते हैं हम
अँधेरों में
जब सीख जाते हैं उसमें जीना
और देखना..

पहाड़ों को उठाना
समंदर को पी जाना
वक़्त की बात है

पुराने कैलेंडर बदलना मग़र
बहुत ज़रूरी बात है...

Thursday, 12 September 2019

आज पूरा शहर घर जल्दी पहुँचना चाहता था
क्योंकि कोई घर पर नहीं रहेगा
एक जनसैलाब सड़कों पर उतरने वाला था
मुझसे कहा गया कि ऐसा "भव्य" दृश्य ज़रूर देखूँ
कैसे मैं सड़कों पर इकट्ठा हुए हुजूम में शामिल हो जाऊँ
कैसे ना सोचूँ कि कैसे कोई बीमार पहुँचेगा अस्पताल तक
आज कोई इस शोर से परेशान कह रहा था
कि दो दिन पहले मुहर्रम थी
पर ऐसा शोर नहीं हुआ
मुझे लगा
लोग भूल चुके हैं क्या
फ़र्क़ करना
उत्सव और मातम में
या शायद सेकुलरिज़्म में छेद इतने हैं
कि हिन्दू-मुसलमान का झंडा उठाये बिना
किसी कुरीति पर वे बोल ही नहीं सकते

मुझे शक हो रहा है
अपने पर
कि कुछ हजम क्यों नहीं होता
न ये न वो
बिस्तर पर रोज़ सुबह ख़ुद को सुलाकर
घर से बाहर निकलती हूँ
भूल आती हूँ ख़ुद को
नहीं भूलती पर छतरी
इस शहर में बरसात कभी भी हो जाती है

इन सब का एक ही इलाज मुझे पता था
मुँह तक चादर ढाँपकर सो जाना

पर उसकी मोहलत ही कहाँ थी!

Wednesday, 11 September 2019

चौराहें

चौराहें
जो डराते रहे
कभी लगता है
चार नए रास्तें
पुकारते हैं
और वो बस लालच है, डर नहीं
हर नए रास्ते पर चलने का रोमांच
अपने सफ़र से प्यार है ये
अपने तजुर्बों से मोहब्बत
सच कहूँ
तकलीफों में भी कहीं
अच्छा लगता है
चलना
सोचकर कुछ या कभी बिना सोचे ही
चौराहे पर चुन लेना कोई एक रास्ता
जो लगे कभी कि ग़लती हुई तो
लौट आएँगे
जैसे कहा है मेरे प्रिय कवि ने
कि वहाँ से जो होता है लौटना नहीं होता
नई यात्रा होती है

सपने तो आख़िर देखेंगे ही ।

Friday, 3 May 2019

आँखें कभी मत उठाकर देखना
जब ज़रुरत के वक़्त कोई आए पास

हाथ बढाते हुए कभी मत कहना
मैं समझता हूँ

ढह जाएगा एक पूरा क़िला

इसके दोनों अर्थों से वाक़िफ़ हूँ मैं भी

क्या किया किसने किसके साथ 
इसका हिसाब भी कभी मत रखना
होंठों को गोलकर फूँक मारना एक
जलती हुई आँखें बुझेंगी
पिघलते हुए दिलों का बचा रह जाएगा कोई आकार



रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...