Thursday, 12 September 2019

आज पूरा शहर घर जल्दी पहुँचना चाहता था
क्योंकि कोई घर पर नहीं रहेगा
एक जनसैलाब सड़कों पर उतरने वाला था
मुझसे कहा गया कि ऐसा "भव्य" दृश्य ज़रूर देखूँ
कैसे मैं सड़कों पर इकट्ठा हुए हुजूम में शामिल हो जाऊँ
कैसे ना सोचूँ कि कैसे कोई बीमार पहुँचेगा अस्पताल तक
आज कोई इस शोर से परेशान कह रहा था
कि दो दिन पहले मुहर्रम थी
पर ऐसा शोर नहीं हुआ
मुझे लगा
लोग भूल चुके हैं क्या
फ़र्क़ करना
उत्सव और मातम में
या शायद सेकुलरिज़्म में छेद इतने हैं
कि हिन्दू-मुसलमान का झंडा उठाये बिना
किसी कुरीति पर वे बोल ही नहीं सकते

मुझे शक हो रहा है
अपने पर
कि कुछ हजम क्यों नहीं होता
न ये न वो
बिस्तर पर रोज़ सुबह ख़ुद को सुलाकर
घर से बाहर निकलती हूँ
भूल आती हूँ ख़ुद को
नहीं भूलती पर छतरी
इस शहर में बरसात कभी भी हो जाती है

इन सब का एक ही इलाज मुझे पता था
मुँह तक चादर ढाँपकर सो जाना

पर उसकी मोहलत ही कहाँ थी!

Wednesday, 11 September 2019

चौराहें

चौराहें
जो डराते रहे
कभी लगता है
चार नए रास्तें
पुकारते हैं
और वो बस लालच है, डर नहीं
हर नए रास्ते पर चलने का रोमांच
अपने सफ़र से प्यार है ये
अपने तजुर्बों से मोहब्बत
सच कहूँ
तकलीफों में भी कहीं
अच्छा लगता है
चलना
सोचकर कुछ या कभी बिना सोचे ही
चौराहे पर चुन लेना कोई एक रास्ता
जो लगे कभी कि ग़लती हुई तो
लौट आएँगे
जैसे कहा है मेरे प्रिय कवि ने
कि वहाँ से जो होता है लौटना नहीं होता
नई यात्रा होती है

सपने तो आख़िर देखेंगे ही ।

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...