अपना बचपन एक तरह की विलासिता लगता है। इसे यहाँ पोस्ट करना भी अपने ढंग की विलासिता ही है पर हममें से कई अपनी बौद्धिकता की पोटली हल्की करते-करते यह भूल गए हैं कि जीवन का एक पक्ष यह भी है जिसमें हम अपनी भागीदारी को नज़रंदाज़ करते हुए इस व्यवस्था , राजनीति, गरीबी, अशिक्षा, सरकारी उदासीनता और क्षेत्रीय असंतुलन पर चिट्ठे छापते हैं।
Thursday, 18 December 2014
सहज अभिनय के पर्याय देवेन वर्मा
मासूम चेहरा, सहज अभिनय, एक ऐसा कलाकार जिसमें हर आम आदमी अपना अक्स देख सकता था, अब हमारे बीच नहीं रहा। २ दिसंबर २०१४ को पुणे में हिंदी सिनेमा में स्वस्थ हास्य अभिनय के लिए मशहूर देवेन वर्मा का निधन हो गया।
इस दुनिया में सबसे मुश्किल काम है किसी को हंसाना. आप भावुक होकर किसी को रुला तो सकते हैं लेकिन खुद मजाक बनकर दूसरे को हंसाने के लिए काबीलियत की जरूरत पड़ती है, जिसकी कमी कम से कम बॉलिवुड में तो नहीं है. बॉलिवुड सितारे भी इस बात से इत्तेफाक रखते हैं कि उनके कॅरियर की सबसे मुश्किल भूमिका वहीं होती है जिसमें उन्हें दर्शकों को हंसाने का काम सौंपा जाता है। यह काम देवेन वर्मा बख़ूबी करते थे
हिंदी सिनेमा में अपने सहज व जीवंत अभिनय के चटख रंग बिखेरने वाले जमीन से जुड़े अभिनेता देवेन वेर्मा को उनकी अदायगी के लिए सदा स्मरण किया जाएगा। देवेन वर्मा ने अँगूर, खट्टा मीठा, प्रोफेसर की पड़ोसन, नास्तिक, चोर के घर चोर जैसी फिल्मों के जरिए यह साबित कर दिया था कि दर्शकों को हँसाने के लिए भौंडी एवं अश्लील हरकतों की कतई जरूरत नहीं है। देवेन वर्मा की कॉमिक टाइमिंग जबरदस्त थी। चेहरे पर निर्विकार भाव लाकर चुटीली बातें करना उनकी खासियत थी। उन्होंने अपने समकालीन दूसरे कॉमेडियन की तरह फूहड़ता का सहारा नहीं लिया। उनके हास्यी-विनोद और हाव-भाव में शालीनता रहती थी।
देवेन वर्मा ने अभिनय में अपने करियर की शुरुआत एक मंच कलाकार के तौर पर की थी। वर्ष 1961 में आई यश चोपड़ा की फिल्म 'धर्मपुत्र' में सपोर्टिंग ऐक्टर की भूमिका के जरिए उन्होंने बॉलिवुड में कदम रखा। हालांकि यह फिल्म कुछ खास कर नहीं पाई। वर्ष 1975 में आई फिल्म 'चोरी मेरा काम' में देवेन वर्मा के अभिनय ने उन्हें शोहरत दिलाई। इस फिल्म ने उन्हें उनका पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड फॉर बेस्ट कमीडियन दिलाया। वर्ष 1982 में आई गुलजार की फिल्म 'अंगूर' में वर्मा ने बहादुर का डबल रोल किया था, जिसे हिंदी सिनेमा की सबसे पसंदीदा हास्य भूमिकाओं में से एक माना जाता है।
देवेन वर्मा ने अँगूर एवं कई अन्य फिल्मों में अपने समय के मशहूर अभिनेता संजीव कुमार के साथ सजीव अभिनय कर दिखा दिया कि वह सहज अभिनय में किसी से कम नहीं हैं। अँगूर शेक्सपीयर की मशहूर कृति 'कॉमेडी ऑफ एरर्स' पर आधारित एक बेहतरीन फिल्म थी जिसे दर्शकों और समीक्षकों दोनों ने खूब सराहा।
पारिवारिक फिल्मों के दौर में देवेन वर्मा का एक अलग स्थान रहा क्योंकि उन्होंने कभी भी द्विअर्थी संवादों एवं भौंड़ी हरकतों का सहारा नहीं लिया। हिंदी सिनेमा में जानी वॉकर, सुंदर, मुकरी, महमूद, राजेंद्र नाथ आदि तमाम कॉमडियन के बीच देवेन वर्मा अलग दिखते हैं। अपनी इसी ख़ास छवि के कारण ही वे शेष कलाकारों से अलग नज़र आते थे।
वर्ष 1969 में फिल्म 'यकीन' के साथ ही वह फिल्म निर्माता भी बन गए थे। दो वर्ष बाद उन्होंने 'नादान' के जरिए निर्देशन में हाथ आजमाया। उन्होंने वर्ष 1978 में अमिताभ बच्चन को लेकर फिल्म 'बेशर्म' का निर्माण और निर्देशन किया। सिद्धांतों के पक्के माने जाने वाले वर्मा ने लगातार ऐसी भूमिकाएं करने से इनकार किया, जिनमें विकलांगों या शारीरिक तौर पर कमजोर लोगों का मजाक बनाना चरित्र की मांग थी। अपने सिद्धांतों के दम पर उन्होंने फिल्म उद्योग में सम्मान हासिल किया। 'मेरे यार की शादी है' और 'कलकत्ता मेल' के बाद वे फिल्मों से दूर हो गए थे।
कई दशकों तक उनका अभिनय लोगों के सिर चढ़कर बोलता रहा और उन्होंने अँगूर, नास्तिक, किसी से ना कहना, साहब, युद्ध आदि फिल्मों में शानदार अभिनय किया। बहुमुखी प्रतिभा के धनी देवेन वर्मा ने चार फिल्मों का निर्माण और निर्देशन भी किया। इनमें नादान, बड़ा कबूतर, बेशर्म और दाना-पानी शामिल हैं। उन्होंने दो फिल्मों आदमी सड़क का और दूसरा आदमी में पार्श्व गायन भी किया।
देवेन वर्मा ने हिन्दी सिनेमा के युग पुरूष अशोक कुमार की पुत्री रूपा गांगुली से विवाह किया। उन्हें 1976 में चोरी मेरा काम के लिए सर्वश्रेष्ठ कॉमेडियन का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। बाद में उन्हें चोर के घर चोर और अँगूर के लिए भी सर्वश्रेष्ठ कॉमेडियन के फिल्मफेयर पुरस्कार से नवाजा गया।
अपने हर किरदार को संजीदगी से निभाने औए जीने वाले देवेन वर्मा अपनी अनेक भूमिकाओं के जरिये आज भी हम सबकी स्मृतियों में मौज़ूद हैं।
मन के अंधेरो को रोशन सा कर दे !
बच्चों से कितना कुछ सीखा जा सकता है ना ! खलील जिब्रान ने कहा था कि " बच्चों को प्यार दीजिये अपने विचार नहीं , उनके पास अपने खुद के विचार हैं। आप उनके शरीर में घर कर सकते हैं पर उनकी आत्मा में नहीं क्योंकि उनकी आत्माएँ भविष्य में निवास करती हैं जिसमें आप अपने स्वप्न में भी विचरण नहीं कर सकते।" परन्तु मुझे तो ऐसा महसूस हुआ कि बच्चों से पूरी संज़ीदगी से संवाद कायम रखने , उन्हें वक्त देने से , वे अपने स्वप्नों की दुनिया में बड़ों को सहर्ष ले जाते हैं। आज कक्षा में एक पर्चा एक बच्चे से दूसरे बच्चे, दूसरे से तीसरे और तीसरे से चौथे पर चुपके-चुपके पहुंचाया जा रहा था, मामले की तह में जाने पर पता चला कि क्रिसमस से एक माह पहले ही आज सब एक काग़ज़ पर एक-दूसरे का नाम लिख रहे थे। इससे क्या होगा? "इस कागज़ पर जिसका नाम होगा उसकी इच्छा पूरी हो जायेगी" कौन करेगा ये इच्छा पूरी? "सेंटा क्लॉज़" पिछले साल इच्छा पूरी हो गयी थी? "पिछले साल!!!.... हाँ हो गयी थी।" क्या इच्छा थी? "वो तो हमको याद नहीं" उनका यह विश्वास कि कागज़ पर नाम लिख देने से उनकी प्रार्थनाएं क़बूल हो जाएंगी मुझे बहुत मासूम और प्यारा लगा। उनके विश्वास में अपने विश्वास की एक कड़ी मैं भी जोड़ आई और उस कागज़ पर अपना भी नाम लिख दिया।
"इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमजोर हो ना।
हम चलें नेक रस्ते पे हमसे, भूल कर भी कोई भूल हो ना।
दूर अज्ञान के हो अंधेरे, तु हमें ज्ञान कि रोशनी दे।
हर बुराई से बचते रहे हम, जितनी भी दे, भली ज़िन्दगी दे।
बैर हो ना किसी का किसी से, भावना मन में बदले की हो ना।
हम चलें नेक रस्ते पे हमसे, भूल कर भी कोई भूल हो ना।
इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमजोर हो ना।"
एक प्रार्थना मेरी भी -
हे भगवान ! इन बच्चों को ऐसे ही मासूम और निष्कपट बनाएं रखना !
. . .नाज़ुक से मोती हँस दे फिसल कर
बहुत कुछ है जो गलत घटित हो रहा है हमारे आस-पास। मन खिन्न हो गया है इस प्रकार की मानसिकता से। वे कहते हैं - "ये प्राइवेट स्कूल के बच्चे नहीं है मैडम ! इन्हें एक ही बात चार घंटे समझाओ तब भी डिब्बा गोल रहेगा इनका। ये बच्चे 'रेस्पोंस' नहीं देंगे।"
अभी मेरा अनुभव बहुत कम है-मात्र 10 दिन। पर इन 10 दिनों में मुझे 5वीं कक्षा में पढने वाली यास्मिन मिली, जो रोज प्रार्थना समाप्त होने पर देरी से विद्यालय पहुँचती है और रोज़ डांट खाती है। मेरे कारण पूछने पर आज उसका जवाब था- "मैम , हमारे पापा काम नहीं करते , शराब पीते हैं। मम्मी अस्पताल जाती हैं , वे नर्स हैं। रात को जाती हैं सुबह घर आती हैं । जब तक मम्मी नहीं आती मैं छोटे भाई को संभालती हूँ और खाना बनाती हूँ ।फिर मम्मी जब आ जाती हैं तब स्कूल आती हूँ।"
10 वर्षीय यास्मिन अगर अपनी पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के लिए 'रेस्पोंस' कर सकती है तो कक्षा में पढाये जाने पर क्यूँ नहीं ! वास्तविकता तो यह है कि ये लोग यह समझ बैठे हैं कि बच्चों के दो ब्रांड हैं - एक सरकारी स्कूल के बच्चें तो दूसरा प्राइवेट स्कूल के बच्चें । ग़लत सोचते हैं यें, बच्चों के दो ब्रांड तो हैं पर सरकारी-प्राइवेट नहीं वरन् जीवन जीने वाला वर्ग और जीवन जीने का सलीका सीखने वाला वर्ग।
सरकारी स्कूलो की चुनौतियां बेशक टॉपर्स की फ़ेहरिस्त तैयार न करने देती हों, लेकिन जीवन जीने का सही ज्ञान इन स्कूलों में बच्चें आज भी सीलन भरे कमरों में बैठकर ग्रहण करते हैं।
बहरहाल मैं खिन्न हूँ, थोड़ी दुखी भी पर निराश ! निराश बिलकुल नहीं हूँ।
Tuesday, 16 December 2014
खलनायकी के नायक सदाशिव अमरापुरकर
पिछले दिनों सिनेमा जगत के 64 वर्षीय मशहूर खलनायक सदाशिव अमरापुरकर के निधन के समाचार ने स्तब्ध कर दिया। खलनायकी का यह सिलसिला के.एन.सिंह, प्रेमनाथ, प्राण, अमजद खान से शुरू होकर अमरीश पुरी, सदाशिव अमरापुरकर पर आकर ठहर गया। इन हस्तियों ने खलनायक के स्तरीय एवं बहुआयामी चेहरे प्रस्तुत किए, जो आज हिन्दी सिनेमा में मानक बन गए हैं।
11 मई 1950 को महाराष्ट्र के एक ब्राह्मण परिवार में जन्में सदाशिव अमरापुरकर मराठी व हिंदी सिनेमा के मशहूर खलनायक रहे हैं। 64 वर्षीय अमरापुरकर का 3 नवम्बर 2014 को फेफड़ों में संक्रमण के कारण मुंबई में निधन हो गया। अमरापुरकर ने अपने अभिनय सफ़र की शुरुआत मराठी थिएटर से की , तकरीबन 50 नाटकों में अभिनय व निर्देशन के बाद उन्होंने सिनेमा जगत में कदम रखा।1981 में मराठी नाटक 'हैंड्स अप' में अभिनय के दौरान अमरापुरकर की मुलाक़ात डायरेक्टर गोविन्द निहलानी से हुई। गोविन्द उस समय अपनी फिल्म 'अर्धसत्य'के लिए कलाकारों का चयन कर रहे थे।
अर्धसत्य' और 'सड़क' जैसी फिल्मों में अपने अभिनय का लोहा मनवाने वाले सदाशिव अमरापुरकर ने दो बार फिल्मफेयर का खिताब हासिल किया। साल 1984 में फिल्म 'अर्धसत्य' के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का खिताब मिला, जबकि 1991 में आई फिल्म 'सड़क' में शानदार अभिनय के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ खलनायक के खिताब से नवाजा गया। 1990 के दशक में उन्होंने ‘मोहरा’, ‘इश्क’, ‘हम साथ साथ हैं’, ‘आंखें’, ‘कुली नंबर 1’, ‘जय हिंद’ और ‘मास्टर’ जैसी फिल्मों में कई सहायक और हास्य भूमिकाएं निभाईं। बॉलीवुड में उनकी आखिरी फिल्म 2012 में आई 'बॉम्बे टॉकीज' थी, यह फिल्म भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष का जश्न मनाने के लिए बनाई गई थी।
अमरापुरकर ने फिल्म ‘सड़क’ में एक निर्मम किन्नर की एक यादगार भूमिका निभाई थी, जो उनके फ़िल्मी-सफ़र में मील का पत्थर साबित हुई। जिसपर बात करते हुए उन्होंने स्वयं बताया - "ये जो किरदार है, अनोखा है। आधा मर्द है, आधा औरत है। यह कोठे चलाने वाला इंसान है। एक तरफ उसे औरतों जैसा रहन-सहन उसे अच्छा लगता है। कभी-कभी वह कोठे वाली औरतों को बुला कर उनके हाथों से साड़ी पहन कर, तैयार होकर अपनी फोटो खिंचाता है। दूसरी तरफ बात यह भी है कि वह औरतों की तरह दिखता नहीं है, उनके जैसी खूबसूरती और नजाकत उसके पास नहीं है। ऐसे में वह औरतों से नफरत भी करता है। ठीक वैसे जैसे वह मर्दों से नफरत करता है।" ‘अर्धसत्य’ में खलनायक और ‘इश्क’ में एक स्वार्थी पिता की भूमिका को भी उन्होंने सहजता के साथ बड़े पर्दे पर जीवंत कर दिया था।
पर्दे पर अपने नकारात्मक किरदारों के जरिए लोगों में खौफ पैदा करने वाला यह अभिनेता असल जिंदगी में एक बेहद सज्जन किस्म का इंसान रहा, जिसका जुड़ाव विभिन्न सामाजिक गतिविधियों से बना रहा। अपने विलेन और कॉमेडी के किरदार के साथ सदाशिव अमरापुरकर ने सिर्फ सिनेमा के लिए ही नहीं बल्कि समाज के लिए भी काम किया। सदाशिव अमरापुरकर फिलैन्ट्रोफिस्ट, सोशल एक्टिविस्ट तो थे ही , साथ में वह कई सामाजिक संगठनों के साथ भी जुड़े हुए थे। अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति , स्नेहालय , लोकशाही प्रबोधन व्यासपीठ, अहमदनगर ऐतिहासिक वास्तु संग्रहालय जैसे संगठनों से वह प्रमुखता से जुड़े हुए थे। ग्रामीण युवकों के विकास के लिए वह निरंतर प्रयास करते रहे।
अपनी खास शैली के लिए पहचाने जाने वाले बहुमुखी प्रतिभा के धनी सदाशिव अमरापुरकर ने अपने तीन दशकों से भी लंबे करियर में चाहे खलनायक की भूमिका की हो या कोई हास्य भूमिका, दोनों में ही वे अपने अभिनय के जादू से भारतीय सिनेमा के दर्शकों का दिल जीतने में कामयाब रहे। उन्होंने 300 से अधिक फिल्मों में काम किया जिसमें हिंदी, मराठी, बंगाली, उड़िया व तेलुगु भाषा की फिल्में सम्मिलित हैं।
सदाशिव अमरापुरकर को ‘गुणवान और बहुमुखी प्रतिभा से संपन्न अभिनेता’ बताते हुए अमिताभ बच्चन, महेश भट्ट और अनुपम खेर समेत बॉलीवुड की चर्चित हस्तियों ने उनके निधन पर शोक जाहिर किया है।
पर्दे की दुनिया में अकसर खलनायक दिखने वाले खिलाड़ी असल जिंदगी में किसी नायक से कम नहीं होते और इस बात के एक आदर्श उदाहरण हैं - सदाशिव अमरापुरकर। खलनायकों को नायकों के समकक्ष ला खड़ा करने के लिए अमरापुरकर को हमेशा याद किया जाएगा। एक कलाकार को कला के क्षेत्र मेँ महान योगदान के लिए श्रद्धांजलि !
मित्र शशि की स्मृति में- 3
![]() |
| स्नातक विदाई समारोह, वर्ष 2012 |
याद! याद! याद !
आज जब मैं सोचती हूँ तो पाती हूँ कि मेरे जीवन में उन लोगों की भूमिका सबसे अधिक महत्वपूर्ण रही है जिनके साथ संबंधों की शुरुआत असहमतियों से हुई। यथासंभव असहमतियों को खुले मन से स्वीकार करती हूँ , नए और अपने से भिन्न विचारों पर ईमानदारी से विचार करती हूँ। ऐसे व्यक्तियों को याद करते हुए ज़हन में जो पहला नाम आया वो तुम हो। अनंत असहमतियों के बाद जब हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते थे कि हम एक ही प्रकार के विचार का समर्थन कर रहे हैं। पर कितने अलग और कितने तर्कसंगत ढंग से तुम अपनी बात स्थापित करते थे। यूँ तो तुम्हे याद करने के लिए किसी ख़ास अवसर की जरूरत नहीं , शायद ही कोई क्षण ऐसा हो जब तुम मेरे मन में नहीं होते हो। पर कभी कभी विशेष रूप से तुमसे बातें करने की इच्छा प्रबल हो उठती है , तुम्हें सामने देखने को दिल चाहता है तुम्हारा हँसता-मुस्कुराता चेहरा आँखों के सामने आ जाता है। हमारा योजना-आयोग तो ध्वस्त हो गया , लौट आओ !
हमारे सपने अभी शेष हैं.… संभावनाएं समाप्त नहीं हुई हैं, बहुत कुछ थोड़ा-थोड़ा बचा है। उस थोड़े को ही अब संवारना है। साथ बने रहना।
![]() |
| संग - साथ , वर्ष 2012 |
मित्र शशि की स्मृति में- 2
![]() |
| वर्ष 2010 में हिन्दू महाविद्यालय में शशि और मैं |
16 नवम्बर 2012 - 16 नवम्बर 2013
ज़िन्दगी मानो पहियों पर हो , दौड़ती जा रही है। पर कहीं पहुंचती नहीं ! इस ठेलमठेल भागमभाग में कुछ पल रुकना होगा , ठहरना होगा। ये ठहरना विराम नहीं है , बस पुराने पन्नों को पलटने की कोशिश भर है, ये समझने का प्रयास है कि पिछले एक वर्ष में धरती, आकाश, सूरज, तारे, चंद्रमा सब अपने कर्त्तव्यों का पालन उसी प्रकार कर रहे हैं जैसे पहले किया करते थे, फिर हम क्यूँ वैसे नहीं रहे! जो हम आज हैं उस होने के पीछे क्या कारण रहे! नए चेहरे को देखकर उसकी खाल तक उधेड़कर परख लेना चाहते है कि आदमी की शक्ल में शैतान तो नहीं ! विश्वास करना उतना सरल नहीं रहा।
दिन-दिन अपने निकाले हुए निष्कर्ष ही अधूरे और गैरजरूरी लगते हैं, बदले में नए निष्कर्ष निकाले जाते हैं परन्तु उनका भी वही हश्र ! जीवन के आघात में दर्शन काम नहीं आता। मनुष्य की सबसे बड़ी नियति है-मृत्यु। फिर भी हम जीते है। मृत्यु मनुष्य के प्रयत्नों को , उसकी सक्रियता को बाधित नहीं कर सकती। एक वर्ष बीत गया है तुम्हे देखे, जैसे वह समय बीत गया जो हमने साथ बिताया था। जो बीत गया है वह समाप्त नहीं होता, वह यादों में होता है और यही यादें आधार बनती हैं जीवन की।
तुमसे तो खैर कोई शिकायत नहीं कर रही पर एक तुम्हारी अनुपस्थिति में दुनिया की बदसूरती उघड़कर सामने आ गयी है और हर दिन मानो हमें चिढ़ा रही है। जानती हूँ, दुनिया और कुछ नहीं बस हमारे देखने का ढंग है, कहते है न कि आईने की अपनी कोई तस्वीर नहीं होती। पर शायद हमारे देखने का ढंग दुनिया का विकृत चेहरा ही दिखा रहा है। चलो जाने दो, आज तुमसे बहुत सी बातें करने का मन है और शिकायतें भी। अब तुम सपनों में भी नहीं आते, इतने दूर क्यूँ? नाराज़ हो क्या? आज तुम्हारे लिए एक दीपक जलाया है, प्रकाश आशा और विश्वास का कि हम मिलेंगे शायद किसी और दुनिया में.…
जहां हो खुश रहो, मिस यू !
Sunday, 14 December 2014
मित्र शशि की स्मृति में
![]() |
शशि !! कितनी बातें कितनी यादें !! कहाँ से शुरू करूँ ...शुरू से शुरू करूँ तो उसकी वो निश्छल , कोमल, और मासूम आवाज़ कानों में गूंजने लगती है , जब कॉलेज के पहले दिन उसने कक्षा में परिचय देते हुए कहा था-"जब हम शास्त्रीय संगीत सुनते है तब हमें शिव की अनुभूति होती है।" वह आवाज़ ही काफी थी, उसके व्यक्तित्व की सुन्दरता बताने के लिए।
पूरे एक वर्ष तक हमने अपने अन्तर्मुखी स्वभाव के कारण एक-दूसरे से बात नहीं की, परन्तु कक्षा में उसकी सक्रियता , प्राध्यापकों से उसके द्वारा पूछे जाने वाले प्रश्न उसकी बौद्धिकता का परिचय देते थे और फिर जब प्रथम वर्ष का परिणाम घोषित हुआ तो सभी के बीच चर्चा का एक मात्र विषय था कि हिंदी विषय में ८१.६% अंक अर्जित करना साधारण बात नहीं है। उसने न केवल कॉलेज अपितु यूनिवर्सिटी में भी टॉप किया। द्वितीय वर्ष में हमारी मित्रता की शुरुआत हुई तब मैंने जाना कि बाहरी तौर पर गंभीर और शालीन दिखने वाले शशि में असीम धैर्य , विनम्रता के साथ-साथ ऐसा चुलबुलापन, हँसमुख व्यवहार भी है जो मुर्दे में भी जान फूँक दे।
शशि के लिए ऐसा कहना अतिश्योक्ति न होगा कि वह विलक्षण प्रतिभा का धनी था। महज २१ वर्ष की आयु में उसने ज्याँ पॉल सार्त्र , अल्बैर कामू , सिमोन दी बोअवार , कार्ल मार्क्स , जैसे विख्यात चिंतकों का दर्शन अध्ययन कर लिया था। वह कवितायें लिखता था, उसे चित्रकारी में विशेष रूचि थी। इन सबसे इतर शशि को व्यक्तिगत रूप से न जानने वालों के लिए यह जानना आवश्यक है कि वह जीवन के प्रति पूर्ण सद्भाव रखता था। सामाजिक व पारिवारिक संस्कारों को स्वयं पर आरोपित नहीं करता था वरन स्वयं अपनी नैतिकता की राह बनाता था। वह प्रत्येक दिन को उत्सव की तरह जीता था। वह हर पल हर क्षण में खुशियाँ व मुस्कुराहटें बिखेरने वाली शख्सियत थी। वह व्यक्ति स्वातन्त्र्य में दृढ विश्वास रखता था। अपनी मेहनत के बूते उसने वो सब हासिल किया जिसकी उसे उम्मीद थी , संभव है, बहुत कुछ ऐसा भी रहा हो जिसे वह हासिल ना कर पाया हो।
वह तो वक्त की सीमाओं को पार कर गया पर यहाँ वक्त है कि लगातार हमारे हाथ से फिसलता जा रहा है। कुछ जाना हुआ तो कुछ अनजाना और अनमना भी, पर इस धुंधलके में भी उसकी स्मृतियाँ है कि दिनोंदिन गहरी होती जा रहीं हैं। मेरा जन्मदिन भूल जाने पर फेसबुक के माध्यम से उसका चातुर्यपूर्ण मासूम जवाब ( हाँ , चतुरता और मासूमियत का अद्भुत मेल केवल उसी में संभव था) "जन्मदिन की बहुत सारी बधाइयाँ मयूरी! मेरा तो मानना है (जो आज से पहले भी मानता था) कि जन्मदिन का उत्सव एक दिन नहीं पूरे महीने मनाना चाहिए. एक दिन खुश रहो और अगले दिन से फिर ज़िंदगी उसी ढर्रे पर, कितनी गलत बात है. और एक बात और जिसे तुम भी मानोगी कि किसी अपने को सुखद जीवन की शुभकामनाएँ देने के लिए किसी दिवसविशेष की जरूरत नहीं होती. पर गलती तो हुई ही है. हो सके तो माफ़ करना. माँ मीनाक्षी तुम्हें खुश रखे और हमेशा तुम्हारा साथ दे." तृतीय वर्ष के अंत में मेरे लिए लिखे एक लेख में उसने मेरे सुन्दर भविष्य की कामना करते हुए लिखा था-"हमेशा एक अर्थवान जीवन जीने की कोशिश करना।" तब भी मैं सोचती थी कि उससे पूछूंगी कि ऐसा क्या है जो जीवन को अर्थवान बनाता है? पर अब शायद स्वयं ही इसका अर्थ समझना होगा।
तुम बहुत याद आते हो, शशि ! तुमने थोड़ी जल्दी की , वरना उस पार तो सभी को जाना है। हम भी आयेंगे और तब तुमसे इस धोखे का जवाब मांगेंगे। जानती हूँ हमेशा की तरह, हर सवाल का जवाब होगा तुम्हारे पास। लेकिन तुम्हारे वे सारे जवाब हमारे दुःख के सामने बौने पड़ जायेंगे।
जानते हो ,हम पर तुम्हारा क़र्ज़ है, तुम्हारे भोलेपन, तुम्हारी मानवीयता और तुम्हारे पावन व्यक्तित्व का क़र्ज़। हम पर क़र्ज़ है तुम्हारी संवेदनाओं का, तुम्हारी विवशताओं का, और तुम्हारी छटपटाहटों का। हर पल तुम्हारा मासूम निरीह चेहरा याद आता है, और याद आता है हमारा तुम्हारे लिए कुछ भी न कर पाना। जिस दुःख को तुम साल कर चले गए वही दुःख अब हमें जीवनभर सालता रहेगा। जीवन भर यह बात हमें कोसेगी कि हम तुम्हें काल की कठोर थपेड़ों से बचा न सके। पर अब हमें जागना होगा इस लम्बी नींद से, क्योंकि लम्बी नींद भी मृत्यु का ही लक्षण है। तुमसे बहुत कुछ सीखा और जाते-जाते भी तुम हमें एक पाठ सिखा गए। एक ऐसा पाठ जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की थी। करते भी कैसे? हम तो स्वप्नदर्शी है, हमें कल्पनादर्शी होने की आवश्यकता है (ऐसा भी तुम्ही ने कहा था). यादों की कोई सीमा नहीं है, कैंटीन में बैठकर घंटों होने वाली बातों को, जो हमारे लिए अतिमहत्वपूर्ण हुआ करती थी( जिसमे हॉरर धारावाहिक, खिचड़ी, साराभाई वर्सेस साराभाई से लेकर समाज-राजनीति, साहित्य और दर्शन शामिल थे) एक लेख में कैसे समेटा जा सकता है।
गुलज़ार से गुलज़ार
25 अक्टूबर, वर्ष 2013 हिन्दू कॉलेज ऑडिटोरियम में गुलज़ार की पहली झलक। सफेद झक कुरता और पायजामा। चेहरे पर मुस्कान और मृदुभाषी। हिन्दी और उर्दू के साफ उच्चारण। कहीं से पंजाबीपन की झलक तक नहीं। गुलजार से मिलो तो ऐसा लगता है कि मिलते रहो। बातों का सिलसिला कभी खत्म न होने पाए। हिन्दी सिनेमा में फिल्मकार-गीतकार-संवाद लेखक और साहित्यकार गुलज़ार जैसा व्यक्तित्व रखने वाले अँगुलियों पर गिने जा सकते हैं।
गुलजार इस समय 79 वर्ष के हैं और अभी भी अपने काम के जरिए नई ऊँचाइयाँ छू रहे हैं। दादा साहेब फाल्के पुरस्कार इसकी मिसाल है। दादा साहेब फाल्के पुरस्कार, भारत सरकार की ओर से दिया जाने वाला एक वार्षिक पुरस्कार है, जो किसी व्यक्ति विशेष को भारतीय सिनेमा में उसके आजीवन योगदान के लिए दिया जाता है | इस पुरस्कार का प्रारंम्भ दादा साहेब फाल्के के जन्म शताब्दी वर्ष 1969 से हुआ | पुरस्कार के तहत स्वर्ण कमल, 10 लाख रुपए की राशि और शॉल प्रदान किया जाता है। वर्ष 2013 के लिए गुलजार को दिया जाने वाला यह 45वां सम्मान है।
आजादी के पहले के भारत में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में 1934 में जन्मे गुलजार का नाम संपूर्ण सिंह कालरा है। उनका परिवार विभाजन के दौरान अमृतसर आ गया लेकिन गुलजार बंबई गए और गैराज मैकेनिक के तौर पर काम शुरू कर दिया। इस दौरान उन्होंने खाली वक्त में कविताएं लिखना जारी रखा। गीतकार के रूप में उनके फिल्मी सफ़र की शुरुआत 1956 में बिमल राय की ‘बंदिनी’ से हुई। गुलजार ने हिंदी फिल्मों के अनेक संगीतकारों के साथ काम किया है। उन्होंने गीतकार के रूप में ही नहीं कई फिल्मों में पटकथा, कथा और संवाद लेखक के रूप में भी योगदान दिया।
‘तुझसे नाराज नहीं ज़िंदगी’ और ‘तेरे बिना जिंदगी से’ जैसे अनगिनत यादगार गीत लिखने वाले गुलजार ‘आंधी’, ‘मौसम’ ‘मेरे अपने’, ‘कोशिश’, ‘खुशबू’, ‘अंगूर’, ‘लिबास’ और ‘माचिस’ जैसी फिल्मों का निर्देशन कर चुके हैं।गुलजार ने बतौर निर्देशक अपना सफर 1971 में 'मेरे अपने' से शुरू किया। 1972 में आयी संजीव कुमार और जाया भादुड़ी अभिनीत फिल्म 'कोशिश' जो एक गूंगे बहरे दम्पति के जीवन पर आधारित कहानी थी, ने आलोचकों को भी हैरान कर दिया। इसके बाद गुलजार ने संजीव कुमार के साथ आंधी(1975), मौसम(1975), अंगूर(1981) और नमकीन(1982) जैसी फिल्मे निर्देशित की। करीब चार दशकों से भारतीय सिनेप्रेमियों को अपने गीतों से गुदगुदाने वाले मशहूर गीतकार गुलज़ार ने ‘मेरे अपने’ के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। एक के बाद एक अलग-अलग विषयों पर लीक से हटकर वे फिल्में बनाते रहे। ‘कोशिश’ फिल्म में गूँगे-बहरे माता-पिता की इच्छा है कि उनका बेटा उन जैसा नहीं हो। ‘आँधी’ फिल्म में इंदिरा गाँधी के जीवन की एक झलक है। मौसम, किनारा, खुशबू, अंगूर, नमकीन, इजाजत, लेकिन, लिबास और माचिस जैसी फिल्मों में उन्होंने इंद्रधनुषी रंग बिखेरे हैं।
29 वर्ष की आयु में 'मोरा गोरा रंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे' जैसा परिपक्व गीत लिखने वाले गुलज़ार 75 वर्ष की आयु में 'कजरारे कजरारे' , 'बीड़ी जलइले जिगर से पिया' और 'कमीने' जैसे गीत भी लिखते हैं , यह उनकी जवाँ दिली को दर्शाता है। गुलज़ार साहब ने खुले मन से बदलते आधुनिक परिवेश को अपनाया है , यही कारण है कि युवा वर्ग भी उनके गीतों पर थिरकता है। युवा वर्ग की पसंद के नाम पर उन्होंने फूहड़ता को नहीं अपनाया। गुलज़ार के गीत भावुकता व संवेदनाओं से भरे होते हैं , स्त्री-पुरुष संबंधों की बारीकियां गुलज़ार की अपनी विशेषता है, उनके फ़िल्मी गीत कथानक के ताने-बाने में बुने होते हैं। गुलज़ार के गीतों का दर्शन है- कोई रिश्ता कभी ख़त्म नहीं होता, कोई रिश्ता कभी मरता नहीं है। संगीतकार आरडी बर्मन और गुलज़ार की जुगलबंदी ने अनेक हिट गीतों को जन्म दिया जो आज भी चाव से सुने जाते हैं।
उनके गीतों में अमीर खुसरो और ग़ालिब की-सी मिठास है यही कारण है कि वर्ष 2002 में उन्हें साहित्य अकादमी तथा 2004 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। वे अब तक 20 फिल्म फेयर पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं। इतना ही नहीं उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्लमडॉग मिलियेनर फिल्म के लिए लिखे गीत 'जय हो' के लिए अकेडमी अवार्ड से सम्मानित किया गया। इसी गीत के लिए आगे चलकर ग्रैमी अवार्ड दिया गया। गुलजार ने कई गीत लिखे हैं और कोई भी गीत कमजोर नहीं लगता। उनके हर गीत शब्दों के मामले में धनवान है। उनकी कल्पनाएं विस्मित करती हैं। शब्दों से खेलना भी वे अच्छी तरह जानते हैं। उनके गीत हिंदी फिल्मों की गीत परंपरा में अपनी पहचान खुद हैं। अगर हिन्दी सिनेमा जगत में किशोर कुमार के बाद किसी को संगीत और गाने के साथ विभिन्न और सफल प्रयोग करने के लिए जाना जाता है तो वह हैं गुलजार। गुलजार के काम को हम उनके अवार्डों और पुरस्कारों से जोड़कर नहीं देख सकते। हिन्दी सिनेमा में उन्होंने अभूतपूर्व सहयोग दिया है। उम्मीद है कि गुलजार इसी तरह बॉलिवुड के गीतों को गुलजार करते रहेंगे।
![]() |
| 25 अक्टूबर, वर्ष 2013 हिन्दू कॉलेज ऑडिटोरियम में गुलज़ार की पहली झलक |
सन्दर्भ:
-विकीपीडिया गुलज़ार
-विकीपीडिया दादासाहेब फाल्के पुरस्कार
-द टाइम्स ऑफ इंडिया
-बीबीसी हिंदी न्यूज
Subscribe to:
Posts (Atom)
रास्ते
मैं जहां भी गई भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...
-
खालीपन खुद के वज़ूद की तलाश जीवन की सार्थकता की तलाश कहाँ ले जायेगी? एक सुरंग जिसमें है अँधेरा और अंधापन जो संकरी है इतनी संकरी कि...
-
मुट्की! टुनटुन कहीं की”, “इतना खाएगी तो टुनटुन हो जायेगी” ,मेरी एक दोस्त की दादी उसे अक्सर यही कहती हुई पायी जाती थी. टुनटुन नाम से मेरा ...
-
“मुझे डर लगता है कि किसी दिन माँ और पिताजी मर जाएँगे”, “बड़ी-बड़ी लकड़ियों पर रखकर हम खुद उन्हें जलाएँगे लता...मुझे जलाना हो...














.jpg)