Wednesday, 8 February 2017

जैसे शाम

दिन का उजाला
सृजन को बेधता था
रातें काले सांप सी
मुझे
एक लंबा सांप
लिपटकर मेरी देह से
नापता हर इंच
कि निगल सके
समूचा

यूं रातें आती
और दिन चढ़ता

मैं निगलती बेबसी को
करती इंतज़ार
कि सुकून चलकर आए मेरे पास

वे सारी पीठें जो हर रोज़ रगड़ खाती हैं मुझसे
घिन्न भी उतनी तीक्ष्ण नहीं अब तो
कहीं आदत तो नहीं

आदतें एक दिन पैटर्न बन जाती हैं
उनका कोई ख़ास मतलब हो ज़रूरी नहीं
वे बस होती हैं
और हम ढलते जाते हैं
जैसे शाम .  

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