Monday, 27 November 2017

आकाश में तारों से बनाते एक चेहरा
दो आँखों वाला
देखकर मुस्कुराता वो हमें
अपने बनाए चेहरे को तोड़ना चाहते रहे हम उम्र भर
बग़ैर जाने कि उसका टूटना
बिखराव है

एक एक कर सब तारें टूट रहे हैं
चिंगारियों से आँखों की रोशनी कुछ हल्की हुई जा रही है
कि देखो आ जाओ
तुम आए और मैं न देख सकी
तो उसे मेरा ना देखना समझा जाएगा

चेहरा मुस्कुराता नहीं
मुस्कुराने की कोशिश में कुछ अटपटा विकृत सा हो जाता है
और हाथ बढ़ा आकाश से
मेरा गला जकड़ लेता है

ये हाथ किस चेहरे से हैं?
क्या तुम्हारे?
नहीं न?

हमारी नज़रों ने जिसे रूप आकार दिया
वह हमारे प्रति इतना क्रूर कब हुआ?
क्यारी ग़लत चुनी या बीज?
या सींच नहीं पाए ईमानदारी से?

कुछ कहो
ये तारें बोलते नहीं।

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