Thursday, 29 November 2018

"मृणाल"

मेरे घर में 
एक गिलहरी है
अखरोट खाती हुई 
इधर-उधर से आती है
और मेरी हथेली पर बैठ जाती है

जब मैं कहीं दूर जाने का सोचती हूँ
तो लगता है गिलहरी नहीं जा पाएगी वहाँ
अपनी जड़ों से दूर नहीं खिलते फूल

मैं उदास हो जाती हूँ
अपने ना जा पाने या उसके यूँ यहीं रह जाने के कारण नहीं
बल्कि ये सोचकर 
कि सुंदर गिलहरियाँ कैसे कितने रास्तों पर आगे नहीं बढ़ने देती होंगी
कितने ही सपनों को
मोह उनका बाँध लेता होगा

उस छोटी सी लड़की से कैसे कहूँ
कि सम्पूर्णता में प्यार बस उसी ने किया मुझसे
उसके सारे खेल मुझे ज़िन्दा करते हैं हर रोज़ 
जो पाया उससे शब्दों में नहीं बाँध सकती कभी

मैंने पूछा एकदिन नन्ही चिड़िया तुम क्या बनोगी बड़े होकर
उसने कहा बड़े आराम से
मैं "मृणाल" बनूँगी

मुझे लगा कितना मुश्किल है 
बड़े होने तक वही बने रहना जो हम हैं  
बच्चे लेकिन छोटी उड़ान नहीं भरते
पूरा आसमान नापते हैं। 

Tuesday, 27 November 2018

चुप्पियाँ

हम बार-बार बात करते 
कि कैसे हमने पहली बार सुना एक मित्र की मृत्यु का समाचार
और पूरी क्रूर संवेदनशीलता से ज़िन्दा किया उस मनहूस दिन को
फिर याद किया 
उसकी पसंद के रंग, खाने और कविता को
और 
नापसंदगियों को भी 

बातों के सन्नाटे में हमने 
झट से लपका अपना एकांत 
और सोचा ऐसा वक़्त 
जब हम खप चुके होंगे
एक लम्बे रीढविहीन जीवन के बाद 

सोचा कि कितना कुछ है जो जैसा है वैसा नहीं होना चाहिए
और अगली सुबह से करेंगे एक नई शुरुआत

वक़्त को गिनना 
जैसे गिनते हैं सोमवार से दिन
कि कब से नहीं आया शुक्रवार

और जीने के लिए पैसे बहुत कम हैं पास
कि कुछ और काम की ज़रुरत है जैसे
चार हाथ
या चालीस घंटे
किताबें पढ़ने के मिलते नोट
या चलने ही से शायद

जो बात जहाँ कहनी होती है 
वहाँ न कहने से
किसी ऐसी जगह कह बैठते हैं हम 
जहाँ 
सबसे ज़्यादा ग़लत ठहरती है 
सबसे सही बात

जो समझ जाते हैं 
फिर भी नहीं कहते

वे चुप रहते हैं
अंत तक।  

Friday, 12 October 2018

खुशबू

हम चलते हैं
चलता है साथ कोई
सुनता हुआ हमारे अफ़साने, रोने गाने
शिकायतें

वे जो मिलते हैं दूसरे से पहले के साथ
पहले को बताते हैं कि कितने खुश है दूसरे के साथ
छोड़ जाते हैं कुछ कीड़ें पहले के दिमाग में

दीवार पर टांगना चाहता है वो एक चेहरा
जहां से उतारा गया था 
दीवार कहीं और की थी
जहाँ दृश्य में चेहरा तो था
पर रंग सारे अजनबी थे

रंग
यूँ भी बदल जाते हैं 
उतर जाते हैं
असर?
वे भी 
चेहरों के

मेरी आँखों पर हथेलियाँ रख उसने कहा कि दिखाना चाहता है हमारा घर
जो अभी तक घर है नहीं
कुछ दूर तक मुझे याद है
समन्दर की खुशबू थी
फिर गुलाब
फिर शब्द हुए सब

आँख जब खुली तो एक मैदान था
साफ़ आसमान के नीचे
बड़ा सा मैदान
मैदान से भी बड़ी थी मेरी हैरानी
फिर बताया गया मुझे कि दीवार नहीं होगी हमारे घर में
क्योंकि जिस तरह पहली बार बताया था मैंने अपने नाम का अर्थ उसे
तभी उसने सोच लिया था 
एक ऐसा घर, जहां दीवारें न हों

मैदान में बहुत से बीज डाले हमने

दूसरे को पहले पर रेंगते कीड़े नहीं दीखते
जब तक
हला उनके साथ जीना सीख नहीं लेता
फिर दीवार पर टंगा चेहरा चीखता है
अपने अन्दर की सारी क्रूरता के साथ
पहला चाहता है उस चेहरे को उतारना 
जिसे उसने नहीं टांगा था

एक खिड़की पर खड़ी थी मैं
फिर एक हाथ से लटकी थी 
उसी खिड़की पर
नीचे लोग जमा थे 
मैं जानती थी कि
मरूंगी नहीं
बचा ली जाउंगी
लेकिन पूछा जाएगा मुझसे
कि मैंने क्यों किया आखिर ऐसा 
और मैं नहीं समझा पाउंगी कि मैं बस खड़ी थी
खिड़की पर। 

उगी तो बस दीवारें
चाही तो बस खुशबू।  

Friday, 14 September 2018

मुश्किल

सच वो आदतें नहीं
परवाह ही है
जो बनाती है असहाय

आदतें नई बन ही जाती हैं देर-सवेर
उतना मुश्किल नहीं था
किताब पढ़ना 2 बजे

या 4 बजे सड़क पर खेलते बच्चों की तस्वीर खींचना
पैरों के नीचे वर्गाकार टाइल्स पर
एक खेल-सा मन में बुनते हुए कदम बढ़ाना
और वे सब खेल याद करना जो हमने बनाए
एक साथ
जब गर्दन की एक नस जोर से दर्द करने लगी
तो मुझे ज़रूर लगा कि थोड़ी मुश्किल हो रही है
पर सच उतना मुश्किल नहीं था
6 बजे अपने कदमों की गिनती को देखना
या बादलों को देखकर सोचना कि
अब तक नहीं आया बारिश के बादलों को पहचानना
तब फिर कुछ याद आया
पर घर जल्दी पहुंचना खला नहीं
आराम भी और दिनों से कुछ ज्यादा किया
10 बजे रात के आकाश को देखा
अँधेरी छत पर अचानक बिल्ली कूद पड़ी
उसकी धपक से मैं डर गई
फिर मैंने कुछ गाने गाये
सात समंदर पार से....
पापा जल्दी आ जाना
तब मुझे लगा कि एक आँख से
लंबा सा आँसू बह गया
बहुत मुश्किल लगा

बहुत मुश्किल हुई
कि एक बार भी नहीं पूछ सकी कि दिन कैसा बीता
कुछ खाया
क्या पढ़ा
क्या लिखा
एक-दो चीज़ों पर नज़र पड़ी
जब फेसबुक खोला
सोचा क्या असर हुआ होगा तुमपर इसका
मुझे लगा शायद मेरे ना होने से तकलीफ बढ़ रही होगी तुम्हारी
मुझे होना चाहिए
पर कहाँ समझ पाते हैं हम
कि कब खुद की परवाह करने लगते हैं
ये जो इतनी मुश्किल हुई मुझे
उसका नतीजा ही हो ये बस
और कुछ नहीं
ना हो मेरी ज़रुरत
या मेरे होने ही से हो सारी परेशानियाँ
फिर तय भी तो यही था
कि शोर नहीं मचाना है
डरते रहे हैं हम सारी ज़िन्दगी
शोर से।




Wednesday, 12 September 2018

धरती सारी

दरवाज़ा किसी के जीवन में
खुद को समझ लें 
उस गुरूर से बचाना ईश्वर
कि  बंद करने को कुछ न रहे पास


दीवार ही सही
कमर टिकाई हो जिसपर कभी किसी कमज़ोर पल
उस पर थूक सकने की जहालत से भी बचाना 

पर वो साहस ज़रूर देना 
जो मुँह से बाहर निकलते दिल को पकड़ सके 
संभाल सके और कह सके 
कि जो पाया उसे लौटाने से ज़्यादा ज़रूरी है 
उस भूमिका को संभालना जो हम निभाते हैं 
अपने या किसी और के जीवन में 
माफ़ कर सकें उनसे ज़्यादा खुद को 


याद रख सकें बस इतना 

कि  विश्व के सबसे अलोकप्रिय लोगों ने बख़्शी जान हमें
उन्हें सबने नज़रंदाज़ किया
उनके पैरों में सारे आँसू वार दें
उनकी हथेली में बिखेर सकें सारी हँसी । 

जब  कह देना ही सबकुछ हो 

चुप रह सकें उस वक़्त 
कड़वी बात को यूं ज़ब्त कर लें 

नाखूनों में भर लें 

खुरचकर धरती सारी।  

Monday, 13 August 2018

हम ज़मी में एक गड्ढा कर 
दफ़न हो जाना चाहते थे
पर ये कोई बड़ी बात नहीं थी
जेब में कुछ सिक्के थे


हम रात के अँधेरे में 
छत से कूद जाना चाहते थे 
ये भी समस्या नहीं थी
जेब में कुछ सपने थे

हम रस्सी बाँध गले में 
झूल जाना चाहते थे
इस पर भी ऐतराज़ नहीं था
साथ में परिवार था

हम नसों को काटना
या किसी रेल के आगे कूद जाना चाहते थे
हम उन्हें बताना चाहते थे 
कि हम इनमें से कुछ नहीं चाहते
हम जीना चाहते हैं

हमें कहने नहीं दिया गया 
हमें अँधेरे को खोदने का फरमान मिला 
कुदाल दे दी हाथ में 
जंगल नहीं था वो
बियाबां सा कुछ शायद
अँधेरे में ठीक से देख नहीं पाती आँखें
लेकिन कुछ देर ही होता है ऐसा भी

थेगली से बंद किये सारे रास्ते 
जहां से चमक आती थी
खुशबू आती थी।   


Saturday, 21 July 2018

हम सबकुछ में अपना कुछ कुछ हिस्सा छोड़ते जाते हैं
जानते हुए
अनजाने में भी शायद
कुछ पढ़ते
खाली सा होकर बढ़ते

थोडा सा पीछे हटते
गिरा हुआ हिस्सा उठाते
और लगता कि इसका अस्तित्व मुझसे जुड़ा था ही नहीं

एक कतार सी लगी थी
एक ही चेहरे
उँगलियों के पोर देखकर
मैंने पहचाना तुम्हें।




माँ रोती रही
पिता के माथे के ठीक बाई ओर एक नस फड़क रही थी
गुस्से से तमतमाते हुए उन्होंने माँ को लात मारी
'भाई को पुलिस कहाँ ले जा रही है?'

पैर से ठेलते हुए एक पत्थर
रास्ता पार किया
एक कहानी बनाई
कुछ यूं हुआ होगा शायद
कि खेल खेल में जानना चाहा होगा कि
छुरा कितना तेज़ है
पिघलकर गिरती हुई आइसक्रीम को बचाते हुए
हँसी का ठहाका रहा होगा
या जोर की छींक शायद
और छुरा पेट से होते हुए पीठ में उतर गया होगा
13 साल का भाई हत्यारा नहीं हो सकता

भाई हत्यारे नहीं होते
जैसे पिता नहीं हो पाते बलात्कारी
लड़की ने खुद को समझाया |

Tuesday, 19 June 2018

मामूली सवाल

6 बजे के अलार्म के बजने का इंतज़ार
सुबह 5.30 से करती
या शायद पूरी रात करती
उठती, पानी पीती, टाइम देखती
और अंदाजा लगाती
कि कितनी देर और भुलाया जा सकता है
शोर और सन्नाटे को एक साथ

क्या कभी ऑफिस में
कड़क कॉटन की सारी पहने
काम करती हुई माँ का ग्रेस देखा है
जिसे बगलों और पीठ पर पसीने से गीली
एक पुरानी मैक्सी में
सुबह और शाम
बस रसोई में
देखने की आदत है?

बेटे, तुम छोटे हो
पर क्या इतने कि
मामूली सवाल तक अपने पिता से ना कर सको?

 

Tuesday, 15 May 2018

Miss/Mrs., Ms. और Mr.

        नौकरी के लिए फॉर्म भरो या फ्लाइट बुक करो, टाइटल के तौर पर नाम से पहले Miss/Mrs., Ms. और Mr. जैसे विकल्प का चयन करना होता है।  मुझे हर बार खटकता कि औरतों के वैवाहिक जीवन से जुडी निजी जानकारी का किसी से भी क्या मतलब है भला।  हालांकि Ms. का विकल्प भी यदा-कदा दिख जाता है। पर पुरुषों के लिए केवल एक ही विकल्प है Mr. । मतलब उनका विवाहित या अविवाहित होना मायने नहीं रखता ।

           मुझे यह बात इतनी चुभी तो लगा कि इतनी सामान्य बात ऐसा तो मुमकिन नहीं कि किसी और के मन में  खटकी नहीं होगी। जब मैंने और लोगों के विचार जानने की कोशिश की तो दुखद आश्चर्य हुआ कि इसका इतिहास इतना विडम्बनात्मक है कि जल्द से जल्द यह पद्धति बदली जानी चाहिए। 

          एक महिला के विवाहित होने या ना होने के निजी फैसलों में समाज की इतनी दखलंदाज़ी है कि अगर शादी नहीं हुई तो ये उस लड़की और उसके परिवार के लिए शर्म की बात है । लोग आपके बारे में क्या धारणा बनायेंगे यह इस बात पर निर्भर करेगा कि एक उम्र के बाद (उन्हीं की तय की हुई) आप Miss हैं या Mrs. । और अगर तलाकशुदा हैं तब तो एक अलग ही कहानी है ।  एकल/विधवा/तलाकशुदा जैसे कॉलम तक दिखाई देते हैं  ।  Religious belief और Gender भी मुझे बड़े बेतुके कॉलम लगते हैं ।  क्योंकि इस तरह के कॉलम भरने के लिए अनिवार्य होते हैं तो मन मारकर  Religious belief  में तो Others को चुन लेती हूँ लेकिन जेंडर स्पेसीफाई करना पड़ता है ।  मतलब जाति भी गैरज़रूरी है लेकिन आरक्षित स्थानों पर इस तरह की जानकारी के लिए तर्क जुटाए जा सकते हैं ।  लेकिन नौकरी में जहाँ कोई विशेष सुविधा लिंग, विवाहित, अविवाहित, विधवा या तलाकशुदा होने के आधार पर नहीं दी जा रही है इस तरह की जानकारी मांगने का क्या औचित्य है आखिर? बेहतर तो होता कि केवल प्रथम नाम ही काफी होता जिसमें पिता/पति के नाम की ज़रुरत ही न होती । खैर... 

Tuesday, 17 April 2018

ग्यारहवीं - A के लड़के/गौरव सोलंकी




         “मुझे डर लगता है कि किसी दिन माँ और पिताजी मर जाएँगे”, “बड़ी-बड़ी लकड़ियों पर रखकर हम खुद उन्हें जलाएँगे लता...मुझे जलाना होगा”, “माँ की आँखें भी जल जाएँगी लता...माँ के बाल..माँ की हथेलियाँ...”, “हम सब ट्रेन में अचानक मिल गए अजनबियों या दो सभ्य साथी कर्मचारियों की तरह ही उम्र भर बात करते हैं. हम कभी शरीर की बात नहीं कर पाते, न ही आत्मा की.” 

शब्द नहीं, केवल जज़्ब कर जाने को होती हैं, ऐसी कहानियाँ. मुझे लगता है कि कविताओं की तरह कहानियों के भी कई-कई अंतरपाठ होते हैं, हर बार अलग गाँठें खुलती हैं. जब क्लास में कविताओं की व्याख्या पढ़ाई जाती थी तो मुझे हमेशा लगता था कि कविताएँ पढ़ाए जाने का विषय नहीं हो सकती, अपनी पूरी प्रक्रिया में ये तो बस यात्राएं हैं- किसे कब कहाँ ले जाएँ. ये कहानियाँ भी दरअसल कविताएँ ही हैं, एक तरह की प्रक्रिया. जिसमें एक सिरे पर “पतंग” है तो दूसरा सिरा हवा में खुला छोड़ दिया गया है. एक कहानी पढ़ने के बाद अगली पढ़ने की उत्सुकता तो होती है पर जल्दबाज़ी नहीं क्योंकि कहानी ख़त्म होकर भी ख़त्म नहीं होती, मन में कहीं आगे बढ़ने लगती है, या पीछे चलने लगती है. ये कहानियाँ महज़ कल्पना या फैंटेसी का लेखन नहीं है, बल्कि इनमें साझी मनुष्यता की चिंताएँ भी मौजूद हैं.

इन कहानियों में जो सबसे ख़ास बात है वह है कि इनमें प्रेम, क्रोध, अपमान, दिखावा, बदला, घृणा और ईर्ष्या जैसी तमाम भावनाओं को जस का तस दिखाया है, जैसे वे मिलती हैं हमारे एकांत में हमसे, बिना कोई नैतिकता का रेकॉर्ड बजाते हुए.  कहानियों के विषय और पात्र थोड़ा असहज कर सकते हैं. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि एक समाज के तौर पर इन सब मुद्दों पर बात करने की हमारी आदत ही नहीं है.  ‘ग्यारहवीं-ए के लड़के’ की एक-एक कहानी बेहद बेहद ज़रूरी है, इन्हें पढ़ा जाना चाहिए. कई- कई बार. इन कहानियों को पढ़ते हुए शायद सभी को अपने-अपने चींटीपुर नज़र आ जाएँ.|


‘पतंग’ का ज़िक्र अलग से करना होगा क्योंकि ये कहानी मुझे लगा कुछ इस तरह गौरव सोलंकी के नाम के साथ जुड़ जाएगी जैसे मात्र 3 कहानियाँ लिखने वाले चंद्रधर शर्मा गुलेरी के साथ ‘उसने कहा था’ जुड़ी है. कहानी का कुछ हिस्सा :
  


                “इतने में माँ मुझे बुलाने के लिए छत पर आ गई. वह कुछ सामान लाने के लिए मुझे नुक्कड़ की दुकान पर भेजना चाहती थी. साथ ही वह कहने लगी कि मुझे पतंग नहीं उड़ानी चाहिए क्योंकि हमारे घर की छत पूरी तरह खुली हुई थी और मैं गिर सकता था. उसी सुबह पढ़ाई न करने पर माँ ने मुझे एक थप्पड़ मारा था और मैं उससे नाराज़ था. मैंने ऐसे दिखाया जैसे मुझे उसकी कोई बात न सुनी हो. मैं पतंग उड़ाने की अपनी कोशिश में लगा रहा. नीचे कुकर की सीटी बजी और आपने सुना होगा कि माँ ने कहा था, छत खुली हुई है. छत ऐसे खुली थी, जैसे आसमान. बस वह असीमित नहीं थी और माँ ऐसे गिरी, जैसे आसमान के किनारे से कोई तारा फिसलकर नीचे गिर जाए. सब्ज़ी में एक भी सीटी ज़्यादा लग जाती थी तो माँ घर में कहीं भी हो, बदहवास सी होकर गैस बन्द करने के लिए दौड़ पड़ती. तभी मेरी पतंग थोड़ी उड़ने लगी और मैं खुशी में बहरा अन्धा हो गया. सुख कभी-कभी हम पर ऐसा ही असर डालता है. माँ ने सँभलने के लिए फ़ुर्ती से हाथ-पैर चलाए होंगे. दस-बारह सेकंड के लिए मुँडेर की एक ईंट को वह पकड़े रही. वह चिल्लाई भी. उसने मेरा नाम पुकारा. वैसे, जैसे उसके सिवा कोई नहीं पुकारता था. मैं ख़ुश था और उससे अपनी नाराज़गी इतनी जल्दी ख़त्म नहीं करना चाहता था. इसलिए मैं मंत्रमुग्ध सा अपनी पतंग को देखता रहा और मैंने पलटकर नहीं देखा. मैंने नहीं देखा कि वह एक ईंट के सहारे झूल रही है. मुझे लगा कि वह आख़िरी सीढ़ी पर खड़ी होकर गुस्से से मुझे पुकार रही है. सुबह के सवा ग्यारह बजे थे और एक घंटा पहले ही हम सबने एक साथ ‘चन्द्रकांता’ देखा था.

           उन दस-बारह सेकंड में माँ ने क्या-क्या सोच लिया होगा? हम सबका पूरा अतीत और पूरा भविष्य शायद! वह कौनसी दृष्टि थी हे ईश्वर, जिससे उसने मुझे आखिरी बार देखा था? मैं बेफ़िक्र था और अपनी पतंग को देखता हुआ मुस्कुरा रहा था. वही उसके लिए दुनिया का आखिरी सीन होगा और फिर उसने आँखें बन्द कर ली होंगी. एक रुपए की वह ईंट मेरी माँ का बोझ नहीं सह पाई और उसे लेकर चालीस फीट नीचे जा गिरी.

           माँ तारा नहीं बनी कि शाम का खाना जल्दी-जल्दी निपटाकर हम आकाश की ओर मुँह फाड़कर उसे एकटक देख पाएँ. माँ पतंग बन गई और मैंने पहले उसे एक अख़बार में लपेटकर उस मिट्टी में गाड़ दिया, जिसमें वह गिरी थी. लेकिन मुझे उसकी इतनी याद आती थी कि तीसरे ही दिन मुझे वह पतंग निकाल लेनी पड़ी. मैं उसे अपने बस्ते में रखकर स्कूल ले जाना चाहता था. मैं नहाते हुए उसे बाथरूम के आले में रख देना चाहता था, ताकि वह देख सके कि मैं ठीक से रगड़-रगड़कर नहाता हूँ या नहीं. मैं कुहनी या गर्दन का मैल उतारना भूल जाऊँ तो वह मुझे याद दिला सके. आप समझने की कोशिश कीजिए कि एक दस साल का बच्चा, जिसे अब तक उसकी माँ नहलाती रही हो, बहुत कुशलता से अपने आप नहीं नहा सकता”. 

            “उन मुश्किल दिनों में, जब रात में चाँद पतंग के आकार का दिखता था, चाहे दूज हो या अष्टमी या पूर्णिमा, मैंने अपने जीवन की पहली चोरी की. क्लास में एक दिन मेरी आँखों से अचानक टपटप आँसू बहने लगे. मैं डेस्क पर रखे अपने बस्ते पर सिर रखकर बैठ गया, जैसे हम बच्चे अक्सर थककर बैठ जाते थे. गणित वाले सर क्लास में नहीं आए थे और सब बच्चे शोर मचा रहे थे. सर क्लास में आते तो एकदम से शांति हो जाती और तब मेरे सुबकने की आवाज़ सबको सुनने लगती. उनके आने पर सबके साथ मुझे भी खड़ा होना पड़ता और तब तो सबको मेरा आँसुओं से भीगा चेहरा दिख ही जाता. मैं ऐसा नहीं होने दे सकता था. उन कठिन दिनों में भी मेरा एक आत्मसम्मान था, जिसे मैं नहीं गँवा सकता था. मैंने अपने साथ बैठने वाले अर्जुन के बस्ते की जेब से उसका रोएँदार रुमाल निकाला और तेजी से अपना चेहरा पोंछकर उसे अपने बस्ते में रख लिया. मैं कभी भी रो सकता था. मेरी माँ मर चुकी थी और दुनिया में रुमालों की सबसे ज्यादा ज़रूरत मुझे ही थी”.



        “मैं रोना चाहता था” कितना मुश्किल था/है जी भर रो पाना. रोने से भी आत्मसम्मान को चोट पहुँचती है, काश हमारे लड़के रो सकते और आत्मसम्मान भी बचा रहता. गौरव सोलंकी ने जिस उम्र में ये कहानियाँ लिखी थीं, मुझे लगा कि ये तभी लिखी भी जा सकती थीं. इन्हें पढ़ना मेरे लिए बहुत ख़ास रहा, शायद पहली बार पढ़ते हुए दूसरी दुनिया में नहीं, अपने आस-पास की अपनी ही दुनिया में थी. सारे पात्र जैसे कभी गली-मोहल्ले में तो कभी स्कूल-कॉलेज में मेरे आस-पास रहे हैं.


        कहानियाँ पढ़कर मुझे लगा कि हम भीतर से कहीं मरे हुए लोग हैं. जब कोई कहता है “हिंदी वालों” की दुनिया संकुचित है ऐसी है या वैसी है तो मुझे कहीं बुरा लगता था पर ग़लत लगता था. “ग्यारहवीं-ए के लड़के” को अश्लील या फूहड़ कहने वाले अगर हिंदी वालों की दुनिया में हैं तो वाकई ये आश्चर्य और शर्मिंदगी की बात है उन सबके लिए जो खुद को इस दुनिया का हिस्सा मानते हैं. इन कहानियों को पढ़ते हुए मुझे कहीं मंटो का संघर्ष भी याद आता रहा.


        ये दौर ज़्यादा उलझा सा, गड्डमड्ड सा है, उसे गौरव सोलंकी ने शायद बहुत सीधे तौर पर कह भर दिया, सीधे और सच्चे रूप में. ये कहानियाँ चुभती हैं क्योंकि ज़माने भर को कोसने वाला पुल नहीं बनाती बल्कि ख़ुद को ग्लानि से भरती हैं.

“घाघ आदमियों के बीच
पेड़ थे सब लड़के”

Monday, 2 April 2018

श्रापित

मैंने खुद से बाहर कुछ नहीं देखा शायद
लिखा भी नहीं
जो कुछ पढ़ा वो भी खुद में
या खुद से जोड़कर

मेरे अंदर 'मैं'
इतना ज़्यादा महसूस करना
और उसका बहुत छोटा हिस्सा
कह पाना
बीमार सा करता है कहीं
कहीं थोड़ा मजबूत भी

मैंने उन लोगों से कभी नहीं कहा
कि  कभी कभी
जुगुप्सा जैसा कुछ महसूस होता है
अपनी कीमत तय करती हूँ
बिकने वाली नहीं
इच्छाओं और प्यार वाली
बेमोल कीमत

जुगुप्सा
शब्द किस प्रक्रिया से होकर बनते हैं
बोलने और पढ़ने से ही
अपने अर्थ की छवि खोल देते हैं,
अर्थ जैसे उनके होने में ही है
मैंने किन चीज़ों को सबसे ज़्यादा महत्त्व दिया
शायद शब्दों को

या उनके अर्थ को,
या शायद शब्द के स्रोत को
या व्यक्ति के भाव को

पैन से ज़्यादा पेंसिल को

होना
चीज़ों व्यक्तियों भावनाओं का नहीं
उनकी अधूरी परछाइयों में शायद

ये कविता नहीं
बड़बड़ जैसा कुछ
मैं इंतज़ार करती हूँ
अपनी भरसक ताकत से
चिल्ला सकने की शक्ति का

मैं छोड़ना चाहती हूँ
कई चीज़ों आदतों ? को
मैं ऊपर लिखी बात को मिटाना भी चाहती हूँ
मिटाना केवल यहां से नहीं
अपने दिमाग से भी

मैं माथा चाहे जितना रगड़ डालूं
मिटता कुछ नहीं
कितनी पुरानी बातों की लाशों का एक ढेर
मेरे चारों तरफ उग आता है

श्रापित हूँ मैं भूल ना सकने को। 
 






Friday, 23 March 2018

अधूरी कविताएँ - 5

दो बातें थी
कहना ना हो सका
ड्राफ्ट्स में पड़े-पड़े रो दी
खुद में प्यारी थीं
चिंगारी सी गर्म कहीं लेकिन
सच की आदत नहीं थी
चुप रहना गुण नहीं
हथियार था

हथियार कौन रखते हैं,
जानते हैं आप.

Wednesday, 21 March 2018

अधूरी कविताएँ - 4 बहनें

एक ही केंद्र पर
सिर टिकाये बैठी
त्रिज्या हुई जा रही बहनें
परिधि पर मिलकर कहीं
मुस्कुराती हैं
कि सखी मेरे बचपन की
रोने को बाकी समय बहुत है  

Tuesday, 20 March 2018

अधूरी कविताएँ - 3

हमने अलमारी में बंद रखी
मरे हुए आदमी की ज़िन्दा कविताएँ
और ज़िन्दा रखा उसे
मरी हुई कविताओं में !

Friday, 26 January 2018

अधूरी कविताएँ 2

आख़िरी रात
सबसे ज़्यादा थी चाह
फड़कती बाजुओं को तुम्हारी
दे सकती आराम
जो मेरे गले से लिपटी थीं
आँखे जो चेहरे पर थी टिकी
कि पसीने की बूँद में
मिलेगा समंदर का नमक
और एक आसूँ भी कहीं तो
मेरे क़त्ल से अगली रोज़
मैं बता पाती कि
सारी नफ़रत जो तुम्हारी उँगलियों
और मेरी गर्दन के बीच थी
उसमें पछतावें
दुलराना था तुझे एक आख़िरी बार
मेरे क़ातिल ।


रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...