हम सबकुछ में अपना कुछ कुछ हिस्सा छोड़ते जाते हैं
जानते हुए
अनजाने में भी शायद
कुछ पढ़ते
खाली सा होकर बढ़ते
थोडा सा पीछे हटते
गिरा हुआ हिस्सा उठाते
और लगता कि इसका अस्तित्व मुझसे जुड़ा था ही नहीं
एक कतार सी लगी थी
एक ही चेहरे
उँगलियों के पोर देखकर
मैंने पहचाना तुम्हें।
जानते हुए
अनजाने में भी शायद
कुछ पढ़ते
खाली सा होकर बढ़ते
थोडा सा पीछे हटते
गिरा हुआ हिस्सा उठाते
और लगता कि इसका अस्तित्व मुझसे जुड़ा था ही नहीं
एक कतार सी लगी थी
एक ही चेहरे
उँगलियों के पोर देखकर
मैंने पहचाना तुम्हें।