Saturday, 21 July 2018

हम सबकुछ में अपना कुछ कुछ हिस्सा छोड़ते जाते हैं
जानते हुए
अनजाने में भी शायद
कुछ पढ़ते
खाली सा होकर बढ़ते

थोडा सा पीछे हटते
गिरा हुआ हिस्सा उठाते
और लगता कि इसका अस्तित्व मुझसे जुड़ा था ही नहीं

एक कतार सी लगी थी
एक ही चेहरे
उँगलियों के पोर देखकर
मैंने पहचाना तुम्हें।




माँ रोती रही
पिता के माथे के ठीक बाई ओर एक नस फड़क रही थी
गुस्से से तमतमाते हुए उन्होंने माँ को लात मारी
'भाई को पुलिस कहाँ ले जा रही है?'

पैर से ठेलते हुए एक पत्थर
रास्ता पार किया
एक कहानी बनाई
कुछ यूं हुआ होगा शायद
कि खेल खेल में जानना चाहा होगा कि
छुरा कितना तेज़ है
पिघलकर गिरती हुई आइसक्रीम को बचाते हुए
हँसी का ठहाका रहा होगा
या जोर की छींक शायद
और छुरा पेट से होते हुए पीठ में उतर गया होगा
13 साल का भाई हत्यारा नहीं हो सकता

भाई हत्यारे नहीं होते
जैसे पिता नहीं हो पाते बलात्कारी
लड़की ने खुद को समझाया |

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...