Monday, 13 August 2018

हम ज़मी में एक गड्ढा कर 
दफ़न हो जाना चाहते थे
पर ये कोई बड़ी बात नहीं थी
जेब में कुछ सिक्के थे


हम रात के अँधेरे में 
छत से कूद जाना चाहते थे 
ये भी समस्या नहीं थी
जेब में कुछ सपने थे

हम रस्सी बाँध गले में 
झूल जाना चाहते थे
इस पर भी ऐतराज़ नहीं था
साथ में परिवार था

हम नसों को काटना
या किसी रेल के आगे कूद जाना चाहते थे
हम उन्हें बताना चाहते थे 
कि हम इनमें से कुछ नहीं चाहते
हम जीना चाहते हैं

हमें कहने नहीं दिया गया 
हमें अँधेरे को खोदने का फरमान मिला 
कुदाल दे दी हाथ में 
जंगल नहीं था वो
बियाबां सा कुछ शायद
अँधेरे में ठीक से देख नहीं पाती आँखें
लेकिन कुछ देर ही होता है ऐसा भी

थेगली से बंद किये सारे रास्ते 
जहां से चमक आती थी
खुशबू आती थी।   


रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...