और ये उस समय की बात है
जब लाल रंग का गिलगिला सा लोथड़ा काँपता सा
उसके आकार से नहीं मिलते सुराग उसकी पहचान के
ये विचारों की भ्रूण हत्या का दौर है
दो टाँगों के बीच दबाकर गला
पूछा जाता है हाल
दम साधकर कह दीजिए-
ठीक हूँ !
अब आगे बढ़िए जनाब
कि आप तो परछाई समझ बैठें !
बिला वज़ह यूँ छोटा ना कीजिए ख़ुद को
सूरज की दिशा बस बदलने ही वाली है !
जब लाल रंग का गिलगिला सा लोथड़ा काँपता सा
उसके आकार से नहीं मिलते सुराग उसकी पहचान के
ये विचारों की भ्रूण हत्या का दौर है
दो टाँगों के बीच दबाकर गला
पूछा जाता है हाल
दम साधकर कह दीजिए-
ठीक हूँ !
अब आगे बढ़िए जनाब
कि आप तो परछाई समझ बैठें !
बिला वज़ह यूँ छोटा ना कीजिए ख़ुद को
सूरज की दिशा बस बदलने ही वाली है !