Saturday, 9 April 2016

घंटी यूँ ही गूंजती रहेगी...



     उस दिन अक्षित और नीरजा के बीच कुछ तो हुआ था जिसे सतीश नहीं समझ पा रहा था. नीरजा का आँसुओं  में भीगा तमतमाया चेहरा सतीश के मन में अक्षित के लिए गुस्सा और नफ़रत भर रहा था. सतीश की आँखों से उपेक्षा का जो भाव टपक रहा था उसे अक्षित समझता था. वह समझ चुका था कि कारण बताये जाने पर भी सतीश की अदालत में वह अपराधी ही रहेगा. यूं  भी खुद को वह अपराधमुक्त नहीं समझता था. नीरजा बस इतना भर कह पाई कि....वह जीना नहीं चाहता ! यह सुनकर भी सतीश के मन में अक्षित के प्रति कठोरता कुछ और बढ़ गई . इस बेतुकी बात के लिए वह अक्षित को कोसता है और उसे नीरजा के दुःख का कारण समझता है. इस सबसे आहत अक्षित रुलाई में गुंथी हँसी हंसकर चला गया. दो रोज़ बाद वह सचमुच चला गया.



नीरजा अक्षित को चाहती थी. चाहना ऐसी जो आसमान में कड़कती  बिजली के जैसी है धरती को छुएगी तो कहर बनकर ही ! ऐसी ही तड़प नज़र आती थी इस चाह में. अक्षित ने ही पहले ज़ाहिर किया था कि वह नीरजा में एक साथी देखता है . नीरजा भी अक्षित को कुछ यूँ संजोती थी मानो उसे दुनिया से छिपाकर रखना ही एक विकल्प है. अक्षित जैसे कोमल लड़के के लिए परिस्थितियाँ कठोर ही जान पड़ती थीं . उसके कभी बहुत दोस्त नहीं रहे . होस्टल में भी बस दुर्ग्वेंद्र को ही उसके दोस्त की पहचान मिली थी . अक्षित को बहुत लोग जानते थे , पर क्या वे वाकई उसे जानते थे ! कितने ही लोग उसे जानने का दावा करते थे पर समझते नहीं थें. दुर्ग्वेंद्र और नीरजा के समीकरण भी अजीब थे . जैसे दोनों एक-दूसरे के प्रतिद्वंदी हों. यह प्रतिद्वंदिता नीरजा और दुर्ग्वेंद्र के साथ अक्षित भी समझता था. कॉलेज का दूसरा साल ख़त्म होने को था कि दुर्ग्वेंद्र और अक्षित के बीच बोलचाल ही ख़त्म हो गई. जाने क्या अनबन हुई कि इन दोनों दोस्तों ने एक दूसरे से दूरी बना ली. कोई और समय होता तो नीरजा चुप रह जाती पर तब जबकि वह खुद भी दुर्ग्वेंद्र को अक्षित के आस-पास नहीं देखना चाहती थी,ऐसे में उनके मन-मुटाव की वज़ह जानना उसे ज़रूरी लगा. शाम के धुंधलके में पढ़ते-पढ़ते पथराई आँखों को आराम देने के लिए अक्षित अधखुली किताब को अपने सीने पर सुलाकर लेट गया. सहमे कदमों से कमरे में कोई आहट किये बिना दुर्ग्वेंद्र ने आकर अक्षित के सूखे होंठों पर अपना चेहरा टिका दिया.




     हॉस्टल का खाना अक्षित को बिलकुल पसंद नहीं था. नीरजा अक्सर ही उसके लिए अपने घर से टिफ़िन ले आती थी. दुर्ग्वेंद्र का उस टिफ़िन और अक्षित दोनों पर अधिकार जताना नीरजा को कभी पसंद नहीं आया. उस दिन अक्षित नीरजा के लिए एक कविता लिखकर लाया था. डायरी नीरजा को दे ही रहा था कि दुर्ग्वेंद्र ने वह छीन ली और खुद पढने लगा. नीरजा और उसके बीच डायरी को लेकर खूब छीन-झपट हुई लेकिन अक्षित चुप खडा रहा. नीरजा के लिए अक्षित की दिनों-दिन गहराती चुप्पी कभी अपमान तो कभी क्रोध का सबब बनती जाती. दुर्ग्वेंद्र तृप्ति को पसंद करता था. तृप्ति की ना से वह क्षुब्ध था. नीरजा और अक्षित को साथ देखकर उसे अपना अकेलापन और भी खलता. इस भावना से बचने के लिए वह अक्षित की दोस्ती में ही अपनी दुनिया ढूँढने लगा.



     अक्षित भावनात्मक रूप से बेहद कोमल और कला-प्रेमी था. हर वस्तु, स्थिति, क्रिया, प्रतिक्रिया, क्षण, व्यक्ति, कृति को कला की नज़र से देखता. बचपन में छिपम-छिपाई खेलते हुए माँ के नाईट-गाउन में छिप जाने वाले अक्षित के लिए माँ की दुनिया बाकी दुनिया से बेहद अलग हो चली थी. स्त्री संरचना उसे बेहद आकर्षित करती. वह उस संसार में प्रवेश करना चाहता जिसे स्त्रियाँ हर दिन जीती हैं. हर उस परदे को हटा देना चाहता जो स्त्री और पुरुषों के लिए दो अलग संसारों को जन्म देता. वह कल्पना करता यदि वह स्वयं एक स्त्री होता ! वह समीकरण बनाता...वह और नीरजा...वह एक स्त्री और नीरजा, वह और दुर्ग्वेंद्र, वह एक स्त्री और दुर्ग्वेंद्र....वह निश्चित कुछ नहीं सोच पाता था . बेतरतीब सोच के  साथ उसके दिल और दिमाग में एक गुत्थम-गुत्थी चलती रहती. कभी वह दुर्ग्वेंद्र से सम्बन्ध ख़त्म करता तो कभी उसकी मानवीय  कमजोरियों को समझने की कोशिश में लग जाता.




     अक्षित की डायरी के पन्ने पलटते हुए नीरजा अचानक ठिठक गई. ‘अक्षित शशांक- १९९०-२०१२’ क्या मतलब था इसका. सवालों के जवाब भी सवाल बन जाते थे. हर तरफ सवाल थे. अक्षित, नीरजा, दुर्ग्वेंद्र और सतीश सभी के ज़हन सवालों से भरे थे. हॉस्टल में अक्षित मनोरंजन के लिए किताबों को चुनता, पाठ्यक्रम से ऊबता तो मनचाहा पढता. थपेड़ों के बीच मार्क्स को पढा, वाम दल का हिस्सा बना  और जल्द ही उससे भी विदा ले ली. जून की गर्मियों में लगभग २ माह बाद  दुर्ग्वेंद्र अक्षित के कमरे में आया. इस दो माह की अवधि में अक्षित के लिए दुर्ग्वेंद्र आँखों में खटकती काँच की किर्च नहीं रह गया था. उसकी हालत पर उसे कुछ ममता हो आई. दुर्ग्वेंद्र के आँसुओं में रही-सही खलिश भी धुल गई.




     ब्रायन कहीं खो गया, एक दिन अचानक वह लौट आता है. वह  बहुत बीमार है. छू देने से ही शरीर गलने लगता है. उसके जिस्म पर जगह-जगह ज़ख्म हैं, उनसे मवाद रिस रहा है. वह कहना चाहता है कि मुझे मत छूना...इतने में जस्टिन ने दौड़कर उसे गले लगा लिया वहीँ उसी क्षण में ब्रायन की पूरी देह पिघल कर तरल हो गई. ज़मीन धसकती जाती है जस्टिन उसमे गिरता जा रहा है, वह जितना बाहर आना चाहता है उतना ही और और और धंसता जाता है. वह चिल्लाना चाहता है पर आवाज़ बाहर नहीं निकलती. उसका दम घुटता जाता है. काला कीचड उसकी नाक और मूंह में भरने लगता है. अक्षित हडबडाकर उठ बैठा. उसकी कनपटियों से केशों से चू रहा पसीना झाँकने लगा. बीती रात जस्टिन-ब्रायन के बारे में सोचते-सोचते उसकी आँख लग गई थी. इस सपने में उसे लगा जैसे वह जस्टिन हो गया है, जो अब बच नहीं पायेगा. ब्रायन की देह का तेज़ाब उसे ख़त्म कर देगा. जो दुनिया अक्षित के बाहर थी उससे कहीं बड़ी दुनिया वह अपने भीतर लिए बैठा था.

                                              



     ‘नीरजा को बताना होगा कि मैं बंध नहीं सकता. किसी भी तरह का बंधन मेरी आत्मा को छीलता है’ अक्षित सोचता है. उसे कमरे की दीवारें कमोड पर पड़े खून के धब्बों से सनी हुई लगती हैं. जिसे वह चाहकर भी फ्लश नहीं कर पाता. खून से सनी दीवार पर नीरजा की आँखें उभर आती. उसे लगता जैसे उसके केश बढ़ते जा रहे हैं और उसी के गले में लिपटते हुए उसके प्राण ले लेंगे. एक और रात बीत जाती. एक और सुबह नज़र आती. दिन डूबता और रात फिर आती. अनंत...अंतहीन रातें. कमरे की दीवारें रोज़ और करीब आ जाती. ‘मुझे अकेले डर लगता है नीरजा ! बहुत डर लगता है ! मुझे अपने घर रख लो ! मैं यहाँ हॉस्टल में रहता हूँ तो आँखें बस पंखें पर टिकी रहती है’ ‘तुम यूँ दिन-भर कमरे में बंद मत रहा करो, और देखो जो आज-कल रात-रात भर कामू को पढ़ते रहते हो उसे भी कुछ दिन तक भूल जाओ समझे. और अकेले कैसे हो? कोई हो या ना हो मैं हूँ, समझे !’  नीरजा है...वो हमेशा रहेगी...पर उसे नहीं रहना चाहिए, वो नहीं जानती क्योंकि...वह है...उसे नहीं होना चाहिए...



    
     ‘आजकल तुम और दुर्ग्वेंद्र एक-साथ पढाई करते हो !’
‘हाँ वह रोज़ आता है.’
‘अच्छा’ संक्षिप्त संवाद के बाद नीरजा और अक्षित के बीच अब अमूमन मौन पसरने लगा था.
‘सुनो नीरजा, मुझे भी यूँ दुर्ग्वेंद्र का आना पसंद नहीं’
‘तुम मना कर सकते हो.’
‘हाँ, मना कर सकता हूँ.’
‘तुमने दिसंबर का नेट का फॉर्म भरा?’
‘नहीं, उसकी ज़रुरत नहीं पड़ेगी’
‘मतलब?’
‘२०१२ में क़यामत जो आने वाली है’
‘मुझे तुम्हारे ये बेतुके मज़ाक पसंद नहीं’
मुझे तुम्हारा यूँ मुझपर अकड़ दिखाना बहुत पसंद है. शादी के बाद गुलाम बनकर रहूंगा तुम्हारा, फिर चाहे कोई कुछ भी कहे हमें’
‘हाहा गुलाम बनकर रहोगे ! बड़े आये!’ खामोशी.
‘अक्षित ! तुम हमेशा रहोगे ना?’
‘तुम्हारा चेहरा देखकर कहता हूँ, मैं हमेशा रहूँगा.’
   




नीरजा सवेरे जल्दी ही उठकर तैयार हो गई. रात ही अक्षित ने कहा था बहुत देर मत करना, मैं इंतज़ार करूँगा. ‘अगला स्टेशन वेलकम  है, दरवाजें दाईं ओर खुलेंगे कृपया सावधानी से उतरें’ अक्षित फ़ोन नहीं उठा रहा है. शायद नहा रहा होगा, नीरजा ने सोचा. अगला स्टेशन शास्त्री पार्क.....अक्षित फ़ोन नहीं उठा रहा है....स्टेशन बीत रहे हैं....घंटी गूंज रही है....अगला स्टेशन कश्मीरी गेट है....


१०


     ‘हेल्लो सतीश! अक्षित ने.... और दो दिन पहले की सारी उपेक्षा, लानतें खुद सतीश पर आ गिरी है. अब अक्षित फ़ोन नहीं उठाएगा...घंटी यूँ ही गूंजती रहेगी....    
    




रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...