Thursday, 28 December 2017

अधूरी कविताएँ

नया सा
कोई पुराना दिन
पुरानी सी एक नई धुन
ता तई तई ता धित तई तई ता
ता का धी मी

कितना कितना कितना चाहा
कि आख़िर छोड़ दिया

तुम बनो कविता अंतिम
अनंतिम।   


रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...