Monday, 20 February 2017

अतिथियों लौट जाओ

अनुत्तरित सवालों पर खेद जताया

कई दोस्तों को व्हाट्सएप्प किया
कईयों की नाराज़गी उठायी 
अपनी लगातार अनुपस्थिति 
के कारण गिनवाएं
बेहिसाब सच के साथ कई झूठ बोले

जो कहती कि 
नहीं थी उपस्थित खुद अपनी देह में भी 
तो नहीं करते यकीन
सो गिनवाई व्यस्तताएँ

फिर एक रोज़ जब वे सब लौट आए
मैंने ताला लगा लिया भीतर से
और खूब हँसी
किस पर?
खुद में एक और शख्स का उग आना
वे दरवाज़े पीट रहे थे
मैं खुद को बचा रही थी

मैं बंद अँधेरे कमरे में 
अवांछित उपस्थितियों से घिरी थी
वे बाहर भीतर सब जगह थे
वे कहीं नहीं थे

ये मेरा निमंत्रण था
अतिथियों लौट जाओ।  

Saturday, 18 February 2017

हर उस जगह से खुद को हटाया
कि करो मुझे याद
याद नाम प्यार का

डिअर मैं और मेरी तुम

तुम हमेशा वैसी लड़की रही हो जैसी मैं होना चाहती हूँ, मैं तुम्हें बहुत पसंद करती हूँ इसीलिए जब भी परेशान होती हूँ तुम्ही को चिट्ठी लिखती हूँ। तुम्हे सारे जादू आते हैं, तुम कन्धों पर पंख लगाना जानती हो। मैंने हमेशा ही तुम्हें अपने सबसे करीब पाया है। आज फिर कुछ अजीब हुआ, तुम्हारे सिवा कौन है जिसे यह बता सकती हूँ। जानती हूँ कि जानकार तुम परेशान हो जाओगी लेकिन जानोगी नहीं तो मुझे बचाओगी कैसे। एक मामूली सी घटना है लेकिन जाने क्यों मैं घबरा गयी हूँ बहुत।
आज चलते-चलते ठोकर लगी और पाँव का नाखून उखड गया। खून भी बहा लेकिन दर्द नहीं हुआ। सच देखने में चोट जितनी गहरी थी उतना दर्द नहीं हुआ। फिर भी मैं फफककर रोई। मुझे ठोकरें खाने पर, बस के पीछे दौड़ते हुए और बाज़ार से सामान लाते हुए बोझ से उँगलियों में होने वाले असहनीय दर्द के बाद रुलाई फूटती है। कभी कभी गुस्सा आता है उन लड़कियों पर जो कहती हैं पति के पैसों पर मौज उड़ायेंगी, और सच कहूँ अपनी हालत देखकर घर बैठी गृहिणियों से भी रश्क़ होता है कि कितनी सुलझी और तयशुदा ज़िन्दगी है इनकी। रोज़ की वही एक दिनचर्या।
मैं नहीं चाहती ऐसे सोचना, मुझे मैं कमज़ोर भी लगती हूँ। एक पैर पर खड़े होकर मोची से चप्पल सिलवाते हुए सोचती हूँ कब उतना खाली वक़्त होगा जब घंटें गिनकर नहीं सोना होगा। जब समय निकालकर किताबें नहीं पढ़नी होगी बल्कि किताबों के बीच से ही रास्ते गुज़रेंगे। फिर तुम्हें देखती हूँ, कैसे तुम फाइल्स के बीच छिपाकर अपने मन की करती हो, कैसे आँख झपकते ही जंगल, पहाड़ और समंदर देख आती हो। तुम पंख लगाती हो और मैं अपने नाजुक कंधों को सहलाती हूँ। ये चिट्ठी किसी लाल डब्बे के हवाले नहीं करुँगी, अपने तकिये के नीचे रखकर सो जाऊँगी, ताकि जब सुबह तुम उठो तो मेरे रात के आँसू तुम्हारी सुबह की मुस्कान बन सकें।
यूँ खुद को भी तो कभी चिट्ठी लिखी जानी चाहिए कि बता सकें उस शख्स को जो हमेशा हमारे साथ है और हमें सबसे अच्छी तरह समझता है उसे हम कितना प्यार करते हैं।
तुम हमेशा याद रखना मैं तुम्हें, तुम्हारी ताक़त के साथ साथ तुम्हारी कमज़ोरियों को भी उतनी ही शिद्दत से चाहती हूँ क्योंकि तुम दुनिया में सबसे ताक़तवर होने की होड़ में नहीं हो।

-तुम और तुम्हारी मैं


कसैला स्वाद प्यार का

झुकती कमर पर
घन बजता रहा
लगातार
धम धम धम
सर पर होते वार कई
कि झुके कमर
आंसू नहीं दिखे जिन्हें,
कवि थे
दुःख एक कविता था
आसमान उड़ान सपने
कुल मिला कर
जिंदा रहने का सारा सामान था उनके पास
जो कुछ नहीं था वह होगा
तो क्या सज़ा मुकम्मल हो उन्हें
जो हो गए दुनिया
काम बहुत था
वक्त ज़रा कम
और प्यार
वह शायद नहीं था
प्यार ना मिलने की शिकायतें थी बहुत
प्यार से चिढ के साथ
एक बैग भरा था प्यार से
काँटे उसके चुभते थे आँख में
खूँटी पर टांगकर उसे
उसी दीवार को ताका
आँख से बहता है ख़ून
प्यार नहीं रे बाबा
मैंने पढ़े हैं वे प्रेम पत्र
जहाँ पत्र ना पात्र रूप
एक पत्र का इंतज़ार
मांगी हर चीज़ हाथ फैलाकर
भीख मिली किश्तों में
देने के हर भाव से भरी
लेना यूँ खला बहुत
तुम्हारी बात भीख
तुम्हारी आवाज़ भीख
तुम्हारा समय भीख
तुम्हारा प्यार भीख
अपने से आँखें उठाकर मैंने जब जब देखा
वहाँ ध्यान था, लाड-प्यार था
कैसे कमाते हैं लोग प्यार इतना
मैं झुकी यूँ हर बार
कि हाथ ना छूटे
चाहा तो यूं था कि
हर सपने को सुन तुम उसका हिस्सा बन जाते
हिस्सा मैंने बनाया
तुमने बस तोड़ा
दुख टकटकी लगाए देखता है
कि उसके हिस्से आई सिर्फ और सिर्फ  वितृष्णा
प्यार की उदात्तता जो पाखण्ड हो सकती है
से इनकार है
ईमान को बचा ले जाएँगे
कि दोष सारा तुम्हारा
कि प्यार सारा मेरा

स्त्री नहीं थी मैं
देह बचाती आत्मा खोकर
एक लड़की प्यार में
बिछती रही
आत्मा बचाने को
आँसू जिन्हें दिखते नहीं
स्तन उनसे छिपा लिए गए

कसैला स्वाद प्यार का
हलक पे पत्थर
ना
प्यार नहीं रे बाबा। 

Wednesday, 8 February 2017

जैसे शाम

दिन का उजाला
सृजन को बेधता था
रातें काले सांप सी
मुझे
एक लंबा सांप
लिपटकर मेरी देह से
नापता हर इंच
कि निगल सके
समूचा

यूं रातें आती
और दिन चढ़ता

मैं निगलती बेबसी को
करती इंतज़ार
कि सुकून चलकर आए मेरे पास

वे सारी पीठें जो हर रोज़ रगड़ खाती हैं मुझसे
घिन्न भी उतनी तीक्ष्ण नहीं अब तो
कहीं आदत तो नहीं

आदतें एक दिन पैटर्न बन जाती हैं
उनका कोई ख़ास मतलब हो ज़रूरी नहीं
वे बस होती हैं
और हम ढलते जाते हैं
जैसे शाम .  

Thursday, 2 February 2017

ओ नदी, बीच सड़क

मत रोना दोस्त
स्पर्श के अभाव में
उस ओर 
सुना है
दरवाजें नहीं होते 
जो रोक सकें 
होते हैं पर बंधन 
न पहुँच सकने के 
ऐसे अज्ञात में
जैसे हो आकाश बिना पंख 

खो देना पंख 
चुनाव भी तो सकता है हो 
मृत्यु हो सहेली
एक सखी चाँद की 
रहती है 
बहती है
सहती है 
ओ नदी, बीच सड़क 

मायने हैं कुछ जीवन के क्या 
मृत समक्ष 
 जीत के 
या सफलता के 
स्वयं समक्ष रिरियाते जीवन भी क्या 
'मृत्यु' से नहीं कोई आशा 
'अंत' से है जुडी
सब कुछ अंततः ख़त्म होगा 
आगे पडा शेष जीवन 
पीछे होगा 

जिसे दबे पाँव आना था 
डरते हुए 
कि है ये अपराध 
उसे यूँ पाला गोद में 
पुचकारा जैसे बेटी 
मैंने हर उस शख्स की हत्या की स्वप्न में 
जिसे चाहा कि वो रहे 

बर्फ पर लिखा जीवन 
रात भर देखा उस टुकड़े को 
फिर उगा सूरज.

Wednesday, 1 February 2017

गुनाहों का देवता - आँसुओं से भीगी एक प्रेम कहानी

गुनाहों का देवता-आँसुओं से भीगी एक प्रेम कहानी



गुनाहों का देवता- बगीचे में नरम घास पर लेटकर बादलों को देखती हुई दो सहेलियाँ- सुधा और गेसू . सुधा जो ज़िन्दगी को यूँ ही बादलों को देखते हुए बिता देना चाहती है और गेसू जो अपनी मंगनी हो जाने से बेहद खुश है.
हँसी ठहाकों के बीच सुधा का गेसू से यह पूछना कि हम लड़कियों को शादी-ब्याह से मुक्ति क्यों नहीं मिलती मुझे आज भी उतना ही प्रासंगिक लगता है जितना १९४९ में प्रकाशित धर्मवीर भारती के उपन्यास ‘गुनाहों के देवता’ की सुधा के लिए है या जितना १९३७ में प्रकाशित जैनेन्द्र के उपन्यास ‘त्यागपत्र’ की मृणाल के लिए था. लड़कियों के जीवन में तमाम अनिश्चितताओं के बावजूद अगर कुछ निश्चित मान लिया गया है तो वह है शादी !
चंदर और सुधा की कहानी पढ़ते हुए अगर 17 वर्ष की उम्र में आप बिलख-बिलखकर रोये हैं और सात वर्ष बीत जाने पर उसे कच्ची उम्र का असर मानते हैं तो एक बार फिर पढ़िए, पीड़ा के उन क्षणों में फिर उतरिये, मेरी तरह आप भी पायेंगे कि रोना बिला वज़ह तो नहीं आया था. वे आँसूं जो सुधा के लिए सुधा के साथ बहाए गए हैं वे कितने सच्चे और कितने पवित्र थे. गुनाहों का देवता पढ़ते हुए पम्मी का जीवन भी कुछ कम ध्यान आकर्षित नहीं करता, ‘एक कहानी लिखने के लिए कितनी कहानियों की ट्रेजेडी बर्दाश्त करनी पड़ती है’ पम्मी का चंदर को बोला गया यह वाक्य उसके जीवन का फ़लसफ़ा है. और मानुषिक जीवन का भी.
सुधा के बारे में जब भी सोचती हूँ, समानांतर रूप से मृणाल मेरे साथ चलती है . ‘मैं चिड़िया होना चाहती हूँ’ जैसी मासूम इच्छा वाली मृणाल. माता-पिताविहीन एक बच्ची, जिसने चुनाव किया, प्रेम किया, सही-गलत, पाप-पुण्य, नैतिक-अनैतिक की सामाजिक परिभाषाओं को एक फूँक से उड़ा दिया. खुद को बर्बादी के मंज़र तक धकेला पर अपनी चिड़िया होने की ख्वाहिश को आकाश दिया. सतरंगी पंखों वाली चिड़िया , मृणाल ! जाने क्या समानता है दोनों लड़कियों में कि इनसे दिल जुड़ जाता है. इसी समानता के लिए अज्ञेय ने लिखा होगा ‘जहां दुःख है/वहाँपर एक सुलगन/ पिघला कर हमें/ फिर जोड़ देती है.’ यहाँ यह दुःख ही है जो सुधा और मृणाल दोनों को एक ही धरातल पर ला खडा कर देते हैं.
भारती जी के शब्दों में ‘दुबली-पतली, नाटी सी साधारण-सी बहुत सुन्दर नहीं, केवल सुन्दर लेकिन बातचीत में बहुत दुलारी’ सुधा! पिता के सामने छोटी बच्ची जैसे जिद्द करती, और चंदर की माँ बन ध्यान रखने वाली सुधा ! जिसका ह्रदय विश्वास से भरा हो, ऐसा विश्वास जिसे बड़े से बड़ा तूफ़ान भी डिगा ना सके. चंदर को दिए वचन के साथ जो सच में इतनी ऊंचाई पर पहुँच गई जहां से खुद चंदर भी उसे नहीं छू सकता था.
मेरी तरह आपके दिल में भी सुधा के लिए वही दुलार उमड़ता होगा जो अपने आस-पास फुदकती किसी भी इठलाती, अल्हड़ता की आड़ में छिपी समझदार लड़की के प्रति उमड़ता होगा. जैसे कोई बचपन की साथी, जिसके साथ स्कूल में सबसे पीछे की लाइन के बेंच पर बैठकर छिपकर खाना खाया हो और मुँह दबाने पर भी हँसी का फव्वारा फूट पडा हो. जिसके साथ क्लास से बाहर निकाल दिए जाने पर भी आँखों की चमक फीकी ना पडी हो.
जिसके साथ कविताएँ पढ़ी हों, पहले-पहले प्यार की चुहल और छेड़ की हो. वही बचपन की सहेली सुधा जब दर्द से चीखती है तो कलेजा मुँह को आता है (यकीन मानिए कलेजा मुँह को आना का प्रयोग मैं पहली बार किसी घटना के लिए कर रही हूँ) और मैं आगे पढ़ते हुए घबराने लगती हूँ. नहीं सुधा के साथ ये नहीं हो सकता. ये वही पल था जब हॉस्पिटल में किसी अपने की चीखें आपको नास्तिक होते हुए भी एक मूर्ती के सामने हाथ जोड़ने पर विवश कर दे.
सुधा की चींख, कराह और चंदर के लिए पुकार कितनी रातों तक मेरे कानों में गूंजती रही. एक रात में किताब पढ़कर जब ख़त्म की तो सर भारी था, चेहरा आँसूओं से भीगा हुआ. सुधा जा चुकी थी. अगले दो दिन मातम में बीते, मैंने किसी अपने खो दिया था. यह कोई एतिहासिक कृति है ऐसा कोई दावा नहीं लेकिन असह्य पीड़ा की जो अनुभूति अपने पात्रों के साथ भारती जी पाठकों को करवा गए हैं वही इस उपन्यास की खासियत है.
संदेह, मांझे सा उलझा मन, खालीपन, आदर्शवाद, विश्वास और अविश्वास की जंग, अपराधबोध और सुधा की मृत्यु यही सब रहा जिसने आदर्शवाद की तलाश में फँसे एक युवक को गुनाहों का देवता बना दिया. हमें प्रेम का जो आदर्शवादी स्वरुप बताया जाता है वो उस ऊंचाई पर स्थापित है जहाँ से मनुष्य चोट ही खाता है. प्रेम बराबरी और साहचर्य है ऐसा कोई नहीं सिखाता. लेकिन प्रेम में त्याग और पवित्रता की बातें करना-सुनना हम सभी को पसंद आता है.
प्लूटोनिक लव की जो भावना चंदर और सुधा के बीच पनपती है वहाँ छिछलेपन के लिए कतई जगह नहीं थी. सुधा को किसी और से शादी के लिए मनाते हुए चंदर सुधा से पूछता है ‘हम लोगों ने स्वर्ग की ऊंचाइयों पर साथ बैठ कर आत्मा का संगीत सुना सिर्फ इसलिए कि उसे अपने ब्याह की शहनाइयों में बदल दें?’
प्रतिउत्तर में सुधा भी एक सवाल पूछती है- ‘मैं जानती हूँ कि मैं तुम्हारे लिए राखी के सूत से भी ज़्यादा पवित्र रही हूँ, लेकिन मैं जैसी हूँ मुझे वैसी ही क्यों नहीं रहने देते? मैं शादी नहीं करुँगी.’ प्रेम में देवत्व का जो आदर्श चंदर स्थापित करना चाहता था उसमें वह सुधा को साधारण लड़कियों की तरह भावुक नहीं देखना चाहता था वह खुद से सवाल करता है कि कहीं उसने सुधा का गलत मूल्यांकन तो नहीं किया ! कहीं सुधा में भी प्रेम और घृणा का स्तर सामान्य तो नहीं है !
प्रश्न है यह मूल्यांकन क्यों? देवत्व की चाह क्यों? सुधा की बलि देकर कैसा देवत्व ? सुधा की रुखाई पर भी चंदर सोचता है कि लड़कियां भावनाओं की बनी होती हैं, साधना करना उन्हें आता ही नहीं क्या . दूसरी तरफ वह यह भी भलीभांति जानता है कि सुधा उसकी आत्मा है और वह खुद अपने हाथों से अपनी आत्मा को घोंट रहा है. एक ह्त्या का पाप उसके सर चढ़ सकता है.
प्रणय-विवाह और त्याग-पवित्रता के अंतर्द्वंद में फंसा चंदर दरअसल साधारण नहीं हो पा रहा. यह देवत्व की चाह मनुष्य को मनुष्य नहीं रहने दे पाती. वही चंदर जो सुधा को त्याग और पवित्रता की राह दिखाता है आगे चलकर बिनती से कहता है कि कोई भी लड़की कितनी भी प्रतिभाशाली क्यों ना हो प्रेम में शरीर की चाह रखती ही है. सुधा का वैवाहिक जीवन के प्रति दुःख भी उसे एक ढोंग जैसा प्रतीत होने लगता है.
दरअसल हमेशा से सेक्स को भारतीय परिवेश में जिस नज़र से देखा गया है वही कंडीशनिंग पाकर चंदर उसे प्रेम का निकृष्ट रूप मान बैठा. बिनती के सेक्स को खाने-पीने-हँसने-बोलने जितनी एक स्वाभाविक प्रक्रिया कहने पर चंदर सोचता है – ‘ज़िन्दगी यह है-मांसलता और प्यास और उसके साथ-साथ अपने को छिपाने की कला…’ अपने अंतर्द्वंदों में फंसा चंदर खुद भी संवेदना का पात्र है- लड़कियों की कोमलता से उसे वितृष्णा सी होने लगती है –‘औरतों के रोने की कहाँ तक परवाह की जाये , वे कुत्ते, बिल्ली तक के लिए उतने ही दुःख से रोती हैं.’ चंदर की कटुता उसकी ज़द्दोज़हद का ही नतीजा थी.
वहीँ दूसरी ओर गाँव से आई छुईमुई लड़की बिनती जो अपनी बुआ से डांट खाकर रो दिया करती थी अब दबंगई के साथ अपनी बात कहने लगी और शादी करने से साफ़ इनकार कर दिया. और अपने स्वाभिमान की रक्षा की ज़िम्मेदारी खुद उठा ली. चंदर के व्यक्तित्व को गढ़ने में एक और कड़ी बनती है पम्मी. जिसके बाहुपाश में चंदर को एहसास होता है कि केवल सेक्स की इच्छा रख लेने भर से कोई निकृष्ट कोटि का नहीं हो जाता.
चंदर को देवता का स्थान देने वाली सुधा , जिसने कभी प्रेम का प्रतिदान नहीं चाहा. पीड़ा के अंतिम क्षणों में भी केवल चंदर को पुकारती है. उसके निश्छल प्यार ने कहीं ना कहीं चन्दर के प्रेम, प्रणय, पवित्रता और त्याग के आदर्शों को बौना बना दिया. आसुओं से भीगी यह प्रेम कहानी आत्मा को छीलती है और सवाल खडा करती है कि क्यों मनुष्य के नाजुक और भावात्मक कन्धों पर देवत्व का बोझ डाला जाता है. क्यों हमें कीचड भरी ज़मीन पर खड़े होकर सतरंगी पतंग उड़ाने को विवश किया जाता है और क्यों आखिर लड़कियों का जीवन लड़कियों जैसा तय कर दिया जाता है.

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...