Wednesday, 31 May 2017

हैंडराइटिंग

एक अलग ढंग से सुंदर लिखने की कोशिश
कर्सिव में
हर अक्षर को दूसरे से यूँ जोड़ना कि जैसे
अधूरे हों एक दूसरे के बिना
बढ़ते हुए आगे
एक लय में हो

हर बार बदल देना अपने लिखने का ढंग
कि जो लगे सबसे सुंदर
एक-एक अक्षर को अलग-अलग
मोती सा टांकना

परीक्षा ख़त्म होने से चंद मिनट पहले
लिखे हुए अपने ही अक्षरों को देख
हमेशा लगा कि
हकीक़त ये है मेरी
बाकी सब पाखण्ड

पेन्सिल से लिखे को मिटाने पर
पीछे कोरापन नहीं
कुछ रेखाएँ रह जाती हैं
ऐसी ही कुछ रेखाएँ
माथे पर गुद जाती हैं

बड़े होते समझ आया
कि लिखना एक जालसाजी है
तथ्यों को बदलने का एक तरीका भर
चाहे कितने ही सुंदर हर्फ़ों में पिरोया गया हो भले


एक तारीख  के सामने
तथ्य है कि तुम मर गए
कभी नहीं आओगे
मेरे पन्नों में फूलों की छाप के साथ
टूटे-बिखरे पत्तों के पीछे लिखा है
कि तुम आओगे बार-बार
बनाकर लिखी गई वह बात

कहीं खाल में गोदनी ना पड़े
एक हैंडराइटिंग से
एक चेहरे की झलक मिलती रहे
बस.



Friday, 19 May 2017

सिमोन


बाइबल नहीं तुम्हारा लिखा
क्योंकि धर्म में कुछ श्रेष्ठ नहीं हमारे लिए
कहते हैं एक उम्र के बाद पुरुष की कठोरता टूट जाती है
वह तलाशता है अपने दंभ को सहलाने वाला हाथ
और स्त्रियाँ ना झुकने का फैसला करती है
जिनकी कमर पर आजीवन घन बजा हो

किसी कंस्ट्रक्शन साइट पर
कोई दुर्घटना हो और चौथे माले से 
ढहने लगे सब ईंटें
ऐसे बरसते थे शब्द
जैसे स्वादिष्ट भोजन के बाद
गले में अटका रह गया हो
एक सूक्ष्म-सा रेशा
एक कोमल सी पलक मुड़कर धंस गयी हो आँख में
शूल की तरह
बातों का अंत

यूँ सोच पर बरसते रहे कोड़े लगातार
जो करना था उसे सोच में इतना झुठलाया कि
झूठ सच हो गया

और सच ये है कि
पिता से प्रेम पर चर्चा नहीं हो सकती

रात भर बाथरूम से
पानी के बहने की आवाज़ आई
रात भर खून बहा नालियों में
दो टाँगों के बीच सिमटता रहा अस्तित्व
और मृत्यु फिर मुस्कुराई

तुम जानती हो सिमोन
कॉलेज में तुम्हें पढ़कर
तुम्हारी तस्वीर देखी नेट पर
और अपना कवर लगा लिया
तुम कोई सहेली लगी
तुम्हारे नाम से छद्म नारीवाद के ताने भी सुने
लेकिन गर्व से
तुम मेरा गर्व रही

दुनिया की हर महत्वपूर्ण घटना से दूर
ज़मीं में कहीं भीतर
कहीं भी उपस्थित ना होकर
मैंने खुद को उगते हुए देखा.


वापसी

एक खुशबू की तलाश में
सपने में सब बह जाता
या शायद सपना ही बह जाता
जिसमें प्रवेश या वापसी
कोई चुनाव नहीं

ऐसा बहुत कुछ था
इर्द-गिर्द
जिसे नहीं मिला समय या ध्यान
सबकुछ सोख लिया
बस एक सवाल ने
वो सवाल भी ठीक ठीक कहाँ पता था
वापसी
कभी भी, कहीं से भी हो सकती थी
वापसी कहीं नहीं हो सकती थी.

कोई ठिकाना नहीं था लौटने के लिए

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...