Friday, 5 June 2015

..ग़र कहना है 'प्रेम'

ग़र कहना है 'प्रेम'
तो धीमे से कहो
ज़ोर लगाने पर
अक़्सर लग जाता है
आघात!
शब्दों को खो जाने दो
कहीं भीतर ही
शायद बचा रह जाए उनका
 महत्त्व!
मत खींचों
उधडन पर लगा
सेफ्टी पिन
वो थामे हुए है
एक ज्वार !
फटे हुए को फाड़ने का आनंद
छोटे छेद को करना बड़ा
सुई-धागे का जैसे
काम ही न हो
उधडन पर सिवन
अब बीते ज़माने की बात है
उत्तर आधुनिकता के इस दौर में
सांत्वना और हमदर्दी गाली हैं
प्यार छलावा
जानते हुए भी यह सच
हम निरंतर छलते रहते हैं खुद को!

Thursday, 4 June 2015

हम नासमझ

अकेलेपन और एकांत में
करना फ़र्क
और बदलना खुद को
एक अलग शख़्स में
एक बंद कमरे में उधेड़ना खुद को
और नए कलेवर में बुनकर
निकलना बाहर
ये जो मैं हूँ
ये दरअसल मैं नहीं हूँ
मेरा यह नहीं होना ही
मेरा होना है
खैर!
हमारे सिवा हमारा होना
क्या कभी कोई जान सकेगा!
न जानें।
हम ही ना जान सके
तो तक़लीफ़ होगी
कैसे हम ज़िंदा रहने के
तमाम औज़ार जुटा लेते हैं
क्या है ये!
मृत्यु से भय!
भय तो जीवन से है
और इस भय में
एक रोमांच
जब खुद के रक्त का स्वाद
जिह्वा को अच्छा लगने लगे
तो हमें डरना चाहिए खुद से
हड्डियों को घिसते हुए
अपने ही जबड़े से
रिसते हुए खून के स्वाद से
मदमस्त होते कुत्ते जैसी स्थिति
फिर ख़ून से भी जब
ऊब होने लगे तब क्या!
मवाद !
अपने प्रति हिंसक होने से अधिक क्रूर
कुछ भी नहीं
 खुद की बुनाई
प्यार-खूबसूरती-रौशनी-गरमाहट की अनुपस्थिति में भी
ऐसे करे कि हममें हम जैसा एक शख्स
बचा रह जाए
एक शख्स जो नासमझ है
कोसता है खुद को अपनी नासमझियों के लिए
और लड़ता है दुनिया से
उसी नासमझी को
बचाने के लिए!

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...