Tuesday, 24 November 2015

क्यों कभी वह खलनायिका नज़र नहीं आती !

कितने प्यारे होते हैं वे प्रेमी
जो हमारे नाम दुनिया-जहां का दुःख लिख जाते हैं
नहीं बोलते सांत्वना के अर्थहीन व बेजान कोरे वाक्य
नहीं करते प्रतिरोध ख़ुद को निर्जीव समझ लिए जाने का
वे जानते हुए कि नहीं बने रह सकते अब हमारा हिस्सा
नहीं निकालते खंज़र हमारे जिस्म से बाहर रोज़ थोडा-थोडा
वे इतना दुत्कारते हैं  कि
दुःख की मियाद पूरी हो सके
जो रोज़ लतीफे पढ़ते हैं मजबूरियों के
क्या दुःख कम कर पाते हैं !
दिन - महीने - साल उसी गर्त में धँसे हुए
बिताने को अभिशप्त किए रखते हैं
जब लौटाया जाता है वह सारा सामान
तो क्या बीता हुआ समय, भावनाएँ, प्यार
सबकुछ लौटा दिया जाता है !

उसे सोचते हुए. . .
क्यों कभी वह खलनायिका नज़र नहीं आती !


रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...