सच वो आदतें नहीं
परवाह ही है
जो बनाती है असहाय
आदतें नई बन ही जाती हैं देर-सवेर
उतना मुश्किल नहीं था
किताब पढ़ना 2 बजे
या 4 बजे सड़क पर खेलते बच्चों की तस्वीर खींचना
पैरों के नीचे वर्गाकार टाइल्स पर
एक खेल-सा मन में बुनते हुए कदम बढ़ाना
और वे सब खेल याद करना जो हमने बनाए
एक साथ
जब गर्दन की एक नस जोर से दर्द करने लगी
तो मुझे ज़रूर लगा कि थोड़ी मुश्किल हो रही है
पर सच उतना मुश्किल नहीं था
6 बजे अपने कदमों की गिनती को देखना
या बादलों को देखकर सोचना कि
अब तक नहीं आया बारिश के बादलों को पहचानना
तब फिर कुछ याद आया
पर घर जल्दी पहुंचना खला नहीं
आराम भी और दिनों से कुछ ज्यादा किया
10 बजे रात के आकाश को देखा
अँधेरी छत पर अचानक बिल्ली कूद पड़ी
उसकी धपक से मैं डर गई
फिर मैंने कुछ गाने गाये
सात समंदर पार से....
पापा जल्दी आ जाना
तब मुझे लगा कि एक आँख से
लंबा सा आँसू बह गया
बहुत मुश्किल लगा
बहुत मुश्किल हुई
कि एक बार भी नहीं पूछ सकी कि दिन कैसा बीता
कुछ खाया
क्या पढ़ा
क्या लिखा
एक-दो चीज़ों पर नज़र पड़ी
जब फेसबुक खोला
सोचा क्या असर हुआ होगा तुमपर इसका
मुझे लगा शायद मेरे ना होने से तकलीफ बढ़ रही होगी तुम्हारी
मुझे होना चाहिए
पर कहाँ समझ पाते हैं हम
कि कब खुद की परवाह करने लगते हैं
ये जो इतनी मुश्किल हुई मुझे
उसका नतीजा ही हो ये बस
और कुछ नहीं
ना हो मेरी ज़रुरत
या मेरे होने ही से हो सारी परेशानियाँ
फिर तय भी तो यही था
कि शोर नहीं मचाना है
डरते रहे हैं हम सारी ज़िन्दगी
शोर से।
परवाह ही है
जो बनाती है असहाय
आदतें नई बन ही जाती हैं देर-सवेर
उतना मुश्किल नहीं था
किताब पढ़ना 2 बजे
या 4 बजे सड़क पर खेलते बच्चों की तस्वीर खींचना
पैरों के नीचे वर्गाकार टाइल्स पर
एक खेल-सा मन में बुनते हुए कदम बढ़ाना
और वे सब खेल याद करना जो हमने बनाए
एक साथ
जब गर्दन की एक नस जोर से दर्द करने लगी
तो मुझे ज़रूर लगा कि थोड़ी मुश्किल हो रही है
पर सच उतना मुश्किल नहीं था
6 बजे अपने कदमों की गिनती को देखना
या बादलों को देखकर सोचना कि
अब तक नहीं आया बारिश के बादलों को पहचानना
तब फिर कुछ याद आया
पर घर जल्दी पहुंचना खला नहीं
आराम भी और दिनों से कुछ ज्यादा किया
10 बजे रात के आकाश को देखा
अँधेरी छत पर अचानक बिल्ली कूद पड़ी
उसकी धपक से मैं डर गई
फिर मैंने कुछ गाने गाये
सात समंदर पार से....
पापा जल्दी आ जाना
तब मुझे लगा कि एक आँख से
लंबा सा आँसू बह गया
बहुत मुश्किल लगा
बहुत मुश्किल हुई
कि एक बार भी नहीं पूछ सकी कि दिन कैसा बीता
कुछ खाया
क्या पढ़ा
क्या लिखा
एक-दो चीज़ों पर नज़र पड़ी
जब फेसबुक खोला
सोचा क्या असर हुआ होगा तुमपर इसका
मुझे लगा शायद मेरे ना होने से तकलीफ बढ़ रही होगी तुम्हारी
मुझे होना चाहिए
पर कहाँ समझ पाते हैं हम
कि कब खुद की परवाह करने लगते हैं
ये जो इतनी मुश्किल हुई मुझे
उसका नतीजा ही हो ये बस
और कुछ नहीं
ना हो मेरी ज़रुरत
या मेरे होने ही से हो सारी परेशानियाँ
फिर तय भी तो यही था
कि शोर नहीं मचाना है
डरते रहे हैं हम सारी ज़िन्दगी
शोर से।