Friday, 14 September 2018

मुश्किल

सच वो आदतें नहीं
परवाह ही है
जो बनाती है असहाय

आदतें नई बन ही जाती हैं देर-सवेर
उतना मुश्किल नहीं था
किताब पढ़ना 2 बजे

या 4 बजे सड़क पर खेलते बच्चों की तस्वीर खींचना
पैरों के नीचे वर्गाकार टाइल्स पर
एक खेल-सा मन में बुनते हुए कदम बढ़ाना
और वे सब खेल याद करना जो हमने बनाए
एक साथ
जब गर्दन की एक नस जोर से दर्द करने लगी
तो मुझे ज़रूर लगा कि थोड़ी मुश्किल हो रही है
पर सच उतना मुश्किल नहीं था
6 बजे अपने कदमों की गिनती को देखना
या बादलों को देखकर सोचना कि
अब तक नहीं आया बारिश के बादलों को पहचानना
तब फिर कुछ याद आया
पर घर जल्दी पहुंचना खला नहीं
आराम भी और दिनों से कुछ ज्यादा किया
10 बजे रात के आकाश को देखा
अँधेरी छत पर अचानक बिल्ली कूद पड़ी
उसकी धपक से मैं डर गई
फिर मैंने कुछ गाने गाये
सात समंदर पार से....
पापा जल्दी आ जाना
तब मुझे लगा कि एक आँख से
लंबा सा आँसू बह गया
बहुत मुश्किल लगा

बहुत मुश्किल हुई
कि एक बार भी नहीं पूछ सकी कि दिन कैसा बीता
कुछ खाया
क्या पढ़ा
क्या लिखा
एक-दो चीज़ों पर नज़र पड़ी
जब फेसबुक खोला
सोचा क्या असर हुआ होगा तुमपर इसका
मुझे लगा शायद मेरे ना होने से तकलीफ बढ़ रही होगी तुम्हारी
मुझे होना चाहिए
पर कहाँ समझ पाते हैं हम
कि कब खुद की परवाह करने लगते हैं
ये जो इतनी मुश्किल हुई मुझे
उसका नतीजा ही हो ये बस
और कुछ नहीं
ना हो मेरी ज़रुरत
या मेरे होने ही से हो सारी परेशानियाँ
फिर तय भी तो यही था
कि शोर नहीं मचाना है
डरते रहे हैं हम सारी ज़िन्दगी
शोर से।




Wednesday, 12 September 2018

धरती सारी

दरवाज़ा किसी के जीवन में
खुद को समझ लें 
उस गुरूर से बचाना ईश्वर
कि  बंद करने को कुछ न रहे पास


दीवार ही सही
कमर टिकाई हो जिसपर कभी किसी कमज़ोर पल
उस पर थूक सकने की जहालत से भी बचाना 

पर वो साहस ज़रूर देना 
जो मुँह से बाहर निकलते दिल को पकड़ सके 
संभाल सके और कह सके 
कि जो पाया उसे लौटाने से ज़्यादा ज़रूरी है 
उस भूमिका को संभालना जो हम निभाते हैं 
अपने या किसी और के जीवन में 
माफ़ कर सकें उनसे ज़्यादा खुद को 


याद रख सकें बस इतना 

कि  विश्व के सबसे अलोकप्रिय लोगों ने बख़्शी जान हमें
उन्हें सबने नज़रंदाज़ किया
उनके पैरों में सारे आँसू वार दें
उनकी हथेली में बिखेर सकें सारी हँसी । 

जब  कह देना ही सबकुछ हो 

चुप रह सकें उस वक़्त 
कड़वी बात को यूं ज़ब्त कर लें 

नाखूनों में भर लें 

खुरचकर धरती सारी।  

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...