Friday, 1 April 2022

रास्ते

मैं जहां भी गई 

भागकर खुद से

मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं
कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी

जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल
और जूता पैर काटता हो

कहीं देखना चाहूं तो लगता है
कितनी परतें हैं आंखों पर जमा
उन्हें छू दूं तो बह जाएं रंग इंद्रधनुषी

वो कहां पहुंचते हैं
जिन्हें पता नहीं होता
कि कहां के लिए निकलें हैं

जो नहीं याद रख पाते दिशाएं
घर ढूंढ़ते हैं उम्र भर

ऐसा करते हुए
शायद बहुत से रास्ते उनके साथ हो जाते हैं
लेकिन जो साथ है
उसके बारे में वे सोचते तक नहीं

वे तो क्योंकि भूल आएं हैं अपना घर।

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...