विचारों की ज़मीन कितनी भी पुख्ता हो, समय के साथ उनमें बदलाव आते ही हैं या यूँ कहा जाए कि उनकी नयी परतें खुलती हैं। अपने विचारों की कशमकश के चलते मैं भी कुछ और पहलूओं पर सोचने को विवश हो गई। एक घटना से उद्वेलित हो मैंने एक टीप फेसबुक पर लिखी थी, जो अक्षरशः इस प्रकार थी-
". . .और इस तरह एक और शादी होने को है।
'मेरी शादी होने वाली है', 'अरे वाह! कब? कौन है?', 'अप्रैल में। अरेंज्ड।', 'ओह अच्छा! तो लड़का क्या करता है?', 'पता नहीं, अपने पापा का कोई बिज़नेस संभालता है', 'हम्म ! तुम्हारी बात हुई उससे?', 'नहीं पापा ने पसंद किया है', 'मिली भी नहीं कभी?', 'नहीं, फोटो देखी है।', 'तुम्हे यह ग़लत नहीं लगता?' ,'ग़लत तो है पर कोई 'ऑप्शन' नहीं है।'.....ऐसा ही एक लम्बा संवाद। क्या वाकई कोई 'ऑप्शन' नहीं है? और अगर नहीं है तो भी क्या ग़लत के विरोध के लिए 'ऑप्शन' तलाशना ज़रूरी है? क्या यह 'ऑप्शन' एक 'पुरुष' या 'प्रेमी' है?
ऐसा नहीं कि यह शादी एक भयानक ग़लती साबित होगी, ऐसा दावा हो मेरा। मेरी तो यही कामना है कि शुरुआत जैसे भी हो रही हो, हर लड़की को वह सुख मिले जिसकी उम्मीद बाँधे वह ऐसे अनजान रास्तों पर सफ़र के लिए निकल पड़ती है।
लेकिन क्या ऐसी कामनाएँ फलीभूत होती हैं ! जिस 'ऑप्शन' के अभाव में यह निर्णय लिया, वह 'ऑप्शन' कल भी नहीं होगा, तब जब लानतें-मलामतें और क्रूरता का दौर शुरू होगा।
'ऑप्शन' के कॉलम में खुद को रखना होगा, खुद अपनी ज़मीन तलाशनी होगी, उस टुकड़ा भर ज़मीन पर अपने सपने बोने होंगे, उनकी जड़े मजबूत करनी होंगी।
विवाह-संस्था और प्रेम पर लम्बी बात की जा सकती है. . .अलग-अलग मत है लोगों के। मैं मेरी बात करूँ तो मेरे लिए बिना प्रेम और आपसी समझ के विवाह किसी अपराध से कम नहीं। चुनाव हमारी जिम्मेदारी है, अगर हम ऐसा नहीं करते तो निश्चय ही अपराध कर रहे हैं।
इससे इनकार नहीं कि ऐसी भी भोली-प्यारी लडकियाँ हैं जो अपने सपनों में अपना आस-पास बुनती हैं, उनका सपना ही यह है कि उनके माता-पिता उनका जीवनसाथी चुनेंगे और वे समाज की 'सबसे अच्छी लडकियाँ' होने का खिताब हासिल करेंगी। पर यह ख़िताब अस्तित्व में नहीं है और इस भोली सोच से यह भ्रम जिन्हें दूर करना चाहिए वे तो कह देते हैं "ग़लत तो है पर कोई 'ऑप्शन' नहीं है"
जो अनुचित है, उस पर सवाल उठाना ही 'ऑप्शन' है।"
मैं अपनी कही बातों को विस्तार देते हुए कुछ और बिन्दुओं को स्पष्ट करना चाहूँगी - हम जिस समाज में जी रहे हैं वह वास्तव में हमें प्रेम करने की इजाज़त नहीं देता, बेटियों को पंख फैलाने के लिए खुले आसमां में छोड़ते हुए भी माता-पिता कहते हैं- ' तुम पर बहुत विश्वास है बेटा , ख्याल रखना। ' यह विश्वास क्या है और ख्याल किस बात का रखा जाना यह सोच का विषय है। दरअसल विश्वास यह है कि तुम प्रेम नहीं करोगी और ख्याल भी यही रखना है कि कहीं आपको प्रेम ना हो जाए ! मानो समाज को एक ही चीज़ से ख़तरा है जिसके खिलाफ एकजुट होकर खड़े हो जाना है और वह खतरनाक चीज़ है- 'प्रेम' !
फिर भी जहां प्रेम को पनपना होता है , वहां वह पनप ही जाता है। बात समाज , व्यवस्था या परंपरावादियों पर दोषारोपण कर देने भर से समाप्त नहीं होती है। 'प्रेम' का संघर्ष केवल समाज से ही नहीं होता , यह संघर्ष दोतरफा बल्कि चौतरफा होता है। सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने के लिए संघर्षरत होना अपेक्षाकृत सरल है, बनिस्पत उस लड़ाई के जो निरंतर खुद से लड़ी जानी है। जो बातें , जो डर हमारे भीतर कूट-कूटकर भर दिए जाते हैं उनसे लड़ना ज़रूरी होता है।
स्वयं अपने लिए चुनाव करने के साथ ही हमारे तथाकथित शुभचिंतक हमारे दुःख और पीड़ा के क्षणों में यह कहते पाए जाते हैं- 'किया है तो भुगतो ' यक़ीनन अपने लिए हुए हर निर्णय के लिए हम स्वयं ज़िम्मेदार होते हैं और यदि भविष्य में वही निर्णय ग़लत सिद्ध हो तो उसके लिए भी साहस जुटाकर एक नई शुरुआत के लिए पुनः संघर्षरत होना भी हमारी ही ज़िम्मेदारी होगी। शायद इसीलिए अपने निर्णय लेने की स्वतंत्रता से भी पहले ज़रूरी है खुद को आर्थिक रूप से सशक्त करना और आत्मनिर्भर होना। हमें अपनी बात कहनी है और इस तरह कहनी है कि वह सुनी जाए, साथ ही यह भी स्मरण रखना है कि जब हम समाज कि भूमिका में हों तब सुन सकें कि क्या कहा जा रहा है। कहे और सुने जाने की समस्या का अंत ही स्वस्थ संवाद की परिस्थितियाँ बनाएगा।