Saturday, 28 May 2016

माँ

जिस मोड़ से
आगे बढ़ गयी थी माँ
वहाँ से मैं कुछ और माँ जैसी हो गयी थी
माँ की साडी में लिपटकर
सारे रंग बिखर गए थे मेरी देह पर
माँ सा हो पाना बस एक ख़्वाब है

घर लौट लौट आना होगा
 वो घर को सहेजे रखेगी
कि शाम तक सारे पंछी
किस्सों की दुनिया से आएँगे
और वो सुनकर बस मुस्कुरा देगी

आसमान का आखिरी टुकड़ा वो बचाकर रखेगी
मेरी हर उड़ान के लिए
मेरा सारा स्नेह बस इस कविता तक सिमटकर रह जाएगा

उस मोड़ पर आँसू अब भी होगा क्या
उन कमरों में छूट गया सामान अब कहाँ होगा
सोते हुए कितनी निरीह लगती है माँ
सूखे अधखुले होंठ
जिन्हें चूमने से खरगोश के जैसे चौंक जायेगी माँ

कितनी बड़ी तसल्ली है कि
सब तरफ से ठुकराये जाने पर
गले से लगा लेगी माँ
मेरी चंदा कहकर
छिपा लेगी ।

Wednesday, 25 May 2016

लिए जाती है कहीं एक तवक़्क़ो ग़ालिब

अभी कुछ दिन पहले दिल्ली से लौटते हुए एक अजीब अनुभव हुआ। अचानक से विमान टूटी सड़क पर चलते  टू व्हीलर की तरह हिचकौले खाने लगा। सीट बेल्ट्स के संकेत दिए गए। यात्रियों को अपनी सीट पर बैठे रहने और टॉयलेट ना जाने के निर्देश दिए गए। मौसम खराब होने के कारण आधा घंटा विमान बादलों में घूमता रहा। मुझे लगा अगर आज यह विमान क्रैश हो जाए तो क्या हो ! मुझे डर नहीं लगा एक रोमांच हो आया। मैं रौशनी से भरे बादलों को आँखों में भरने लगी और विमान दुर्घटना में खुद को मृत समझने लगी (ये ख्याल बाद में आया कि मेरे अलावा भी विमान में जीवन से लबालब भरे लोग हैं जो कहीं पहुंचना चाहते हैं) मैंने चाहा कि मैं सोचूँ कि मेरे न होने से मुझसे जुड़े किस व्यक्ति को क्या फर्क पड़ेगा। एक रील आँखों के सामने चल पड़ी, एक के बाद एक चेहरा आँखों के सामने दौड़ गया लेकिन हैरानी तब हुई जब खुद का चेहरा आँखों में आ टिका। अमूमन मैं चाहूँ भी तो अपना चेहरा नहीं सोच पाती हूँ, लगता है कि कभी अपने हमशक्ल से सामना हुआ तो अजनबी की तरह गुज़र जाऊँगी। पर वह मेरा ही चेहरा था अपने शव के सामने बैठकर रोता हुआ। अपनी अधूरी इच्छाओं पर बिलखता हुआ। उन जगहों का अफ़सोस करता हुआ जहाँ मैं नहीं हो सकी। उन तस्वीरों पर आँसू गिराता हुआ जिनमें मैं मुस्कुरा नहीं सकी। उन पलों को भिगोता हुआ जिन्हें मैंने अभी तक जिया ही नहीं। क्या हमसे ज़्यादा प्यार हमें कोई कर सकता है ! मुझे लगता मेरा मुझसे सच्चा दोस्त कोई नहीं। मैं खिड़की से बाहर देखते हुए  अपनी काल्पनिक मृत्यु पर आँसू बहा रही थी और खुद को मन ही मन दुलार रही थी। ज़िन्दगी सचमुच अपने निकृष्टतम रूप में भी मृत्यु से बेहतर है वर्षा वशिष्ठ ! 

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...