Monday, 21 September 2020

दुनिया

कहते हैं

दुनिया ठीक वैसी ही नज़र आती है

जैसे हम होते हैं

ऑटो वाला लंबा रास्ता चुनता है

मीटर भागता है

सहकर्मी अपना काम आपकी मेज पर खिसका जाते हैं

जो जैसे जितना फायदा उठा सकता है

उठाता है

हम देखते हैं

चुप रहते हैं

शायद एक पेड़ को वे बस पेड़ की तरह देखते होंगे

या नहीं जानते होंगे

चिड़िया का एक नाम चहक भी होना चाहिए

पेड़ का हरा

और बचपन का खुशी

किताब का रेगमार

हंसी आयी?

जो दिमाग का जंग साफ करे

वही रेगमार


तो क्या जो दिखाई देती है 

वो है मेरे अंदर की दुनिया

या वो जो मैं बनाती हूं अपने मन में

हर रोज़

थोड़ी और सुंदर

पिछले दिन से

वही है बस असली दुनिया



रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...