Sunday, 26 July 2015

चिंटू

हर दिन
ले आता है
नयी स्फूर्ति चिंटू
चहक कर बताते-बताते सब-कुछ
अचानक रुक जाता है चिंटू
चारों ओर सन्नाटा
उसने जो कुछ कहा
मानो सुना ही ना जा रहा हो
उसके उत्साह में नहीं घुलता उत्साह कोई
अब सन्नाटे से कर ली
दोस्ती उसने
अब सबको इंतज़ार है
शब्दों का
खामोशी का बाँध टूटता नहीं
और शब्दों का पुल बनता नहीं
कहीं कोई खतरा नहीं
एक दुनिया
जो अब पल रही है कहीं भीतर ही उसके
उसका हिस्सा कोई नही।

Monday, 20 July 2015

क्या मैं सुन्दर हूँ ?

उस लड़की का  संघर्ष 
तुम उस लड़की की आँख से देखते हो जिसे 
संघर्ष का अर्थ भी नहीं पता 
वो जो तुमसे अक्सर ही पूछ बैठती है 
'क्या मैं सुन्दर हूँ'
और तुम्हें ज़वाब देने में कठिनाई होती है 
मैं उस लड़की को बताना चाहती हूँ 
मैंने भी इस सवाल का सामना किया है 
जवाब कोई नहीं दे पाया 
तुम्हें भी नहीं मिलेगा 
बस प्यार करना होगा 
खुद से 
तुम जो शिकायतें करती हो 
वो उम्मीदें हैं दरअसल 
दूसरों से 
यही उम्मीदें तुम्हें खुद से रखनी होंगी 
खुद अपनी ज़मीं तलाश कर 
अपनी पसंद के रंग का आसमां चुनना 
तुमपर कोई प्रेमी 
शायद कभी कविताएं नहीं रचेगा 
पर तुम प्रेम रचना 
कविता से ज़्यादा ज़रूरी है प्रेम 
ऐसा कितना कुछ है 
जो कहना है मुझे तुमसे 
क्योंकि इस दिखावे की दुनिया में भी तुम 
शिकायतें करती हो दूसरों से 
यहां तो मुस्कुराया जाता है 
मन में खलिश बची रहती है 
पर मुस्कुराकर मिला कर लड़की 
समझदारी का लेबल चाहिए तो मुस्कुरा |

तुम सुन्दर हो!
जैसे सब होते हैं 
पर सब बचा नहीं पाते अपनी खूबसूरती 
या दूसरों की नज़रों में 
सुन्दरता का काँच नहीं पिघला पाते 
यक़ीनी तौर पर नहीं कह सकती कि
सुन्दरता से मुलाक़ात कभी हुई है मेरी 
पर कुछ भला सा काम कर 
मैंने खुद को सुंदर महसूस किया 
और 
कभी मन की कचोट के बीच 
बेहद कुरूप 
यक़ीनी तौर पर तो 
जीवन का पक्ष भी नहीं लिया जा सकता 
तय तो खुद ही करना होगा .

Sunday, 5 July 2015

'मामूली' ज़ख्म

पाँव में लगा एक मामूली ज़ख्म
जिसके उपचार की ज़रुरत
कभी समझी ही नहीं गयी
उससे ख़ून का स्राव
नहीं दिखा कभी
तक़लीफ़ भी तो नहीं पहुँचाई थी उसने कभी
वो बस एक ज़ख्म था
एक मामूली ज़ख्म
समय ही उसका उपचार समझा गया
पर एक लम्बी अवधि बीत जाने पर
जब उसी ज़ख्म पर
नज़र आए कीड़ें
माँस के  लोथड़े पर रेंगतें
कीड़ें !
ज़ख्म में सुराख़ करते
देते जन्म
और लिए जाते जीवन
हर सुबह तक़लीफ़ का थोड़ा और बढ़ जाना
उपचार की हर तकनीक का विफल हो जाना
बढ़ती पीड़ा
बहता रक्त मिश्रित पीला पदार्थ
चाहना ऐसी कि मसलकर दूर कर दें
अपनी बेचैनी
हर रात नींद को पुकारना
और करना विनती
कि अब कभी नहीं खुलना
यह कोई दुःस्वप्न नहीं
कल्पना नहीं
कोई मनोरोग भी नहीं
यह नज़रंदाज़ करते जाने वाली
वह मासूम(?) अदा है हमारी
जो
किसी भी 'मामूली' ज़ख्म का
यही हश्र करेगी।   

Friday, 3 July 2015

जीवन ! तुम बहुत सुन्दर हो !

वे जो सिखाते हैं हमें
कविता की खूबसूरती
बताते हैं
कि कैसे लिखी जाती है कविता
छंद, लय और व्याकरण का
देते हैं ज्ञान
जीवन के व्याकरण से जिनका
नहीं कोई सम्बन्ध
खोजते हैं
 हमारे अर्थहीन जीवन की कविता में
सुन्दर शब्दों का मायाजाल
आप बताइये जीवन की खूबसूरती
फेर लें नज़र विसंगतियों से
लेकिन
हमसे ये उम्मीद ना रखिये
कि
हम लिखेंगे फूलों की क्यारी,
चाँद का टुकड़ा ,
 भँवरें और तितली
चहकती चिड़िया
खिलखिलाता बचपन ,
 प्रेम में वृद्ध दरख़्त
बसंती हवा, बरसात, सावन, झूलें
और जाने क्या-क्या
कहेंगे
कि नहीं देखा कभी
किसी बचपन को बिलखते
नहीं देखा किसी चिड़िया को जून की गर्मी में प्यास से मरते
नहीं देखा बारिश से उजड़ती बस्तियों को
नहीं देखा सडकों पर बिकते जीवनहीन फूलों को
नहीं देखी कभी लू
कुछ नहीं देखा
कुछ भी नहीं
देखा तो यही कि
जीवन !
तुम बहुत सुन्दर हो !


रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...