Tuesday, 29 August 2017

लौट आओ!

एक लड़की, जो एम.ए. में पढ़ रही थी। बहुत चुलबुली, दिलखुश लड़की। फिर महीनों हॉस्पिटल के चक्कर लगाते बीते। बीच में जो हुआ वो जानना मेरे लिए खुद बेहद डिप्रेसिंग रहा। लड़की किसी से बात नहीं करती, रिएक्ट ही नहीं कर पाती। कुछ दोस्त हैं जो बस उसे इस डॉक्टर से उस डॉक्टर तक दिखाते फिरते हैं। 

दरअसल लड़की लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप में थी। लड़का किसी एम.एन. सी. में काम करता था। लड़की अपने कॉलेज के दोस्तों के साथ जब भी कहीं घूमने जाती, लड़के को भी बुलाती। वहाँ वो उसी लड़के के साथ रहती। दोनों ने शादी का फ़ैसला कर लिया था, बात घरवालों तक पहुँची। हरयाणा की लड़की। लड़की के घरवालों ने मारा-पीटा उसे। वो नहीं झुकी। वापस दिल्ली आई, और फोन पर घरवालों को कह दिया कि दोबारा घर नहीं आएगी। परिवार ने सारे रिश्ते तोड़ दिए। शायद दुख हुआ होगा उसे, लेकिन भविष्य को लेकर आश्वस्त थी कहीं न कहीं। लड़का छुट्टियाँ लेकर दिल्ली आता और दोनों एक साथ घूमते-फिरते। हमेशा की तरह लड़की जब अपने दोस्तों के साथ शिमला गई तो लड़का भी वहीं पहुँचा। दोनों एक अलग होटल में ठहरे । फिर लड़का अपने शहर और लड़की वापस दिल्ली। फिर कुछ महीने तक दोनों नहीं मिले। फ़ोन पर बातें होती। लड़की को धीरे-धीरे लगा कि लड़का बात करना अवॉयड कर रहा है। और जैसे अक्सर होता है, लड़की उसे मनाने खुश रखने की कोशिशें करती। वो लड़ता गालियाँ देता। उसके साथ एक ही होटल में ठहरने को लेकर वेश्या तक कह दिया। फिर फ़ोन उठाना तक बंद कर दिया। सब तरफ से निराश लड़की ने उससे मिलने जाने और उसका अंतिम फैसला जानने की सोची। घर की ख़बर तो थी नहीं सो ऑफिस पहुँची। वहाँ समय गवाएँ बिना ही लड़के ने साफ़ बता दिया कि उसकी शादी हो चुकी है। घरवालों ने ज़बरदस्ती की थी जैसे बहाने बनाए। लड़की ने पूछा कि उसने अपने घर पर या अपनी पत्नी से उसके बारे में कभी ज़िक्र किया क्या? लड़के ने कहा हाँ हाँ सबको पता है, मैंने किसी से कुछ नहीं छिपाया। लड़की लौट आई। वापस अपने हॉस्टल। उसी कमरे में। क्या हुआ है समझने की कोशिश सी करती हुई। यक़ीन करना मुश्किल रहा होगा। लेकिन उसके लिए बात यहाँ ख़त्म नहीं हुई। फिर जैसे अमूमन हम सोचते हैं, उसने भी मामले की स्क्रूटनी करनी शुरू की, सोशल मीडिया से आसान क्या हो सकता था। उसने जो कभी नहीं किया था प्यार में, वो अब किया। एक-एक कर उसकी फ़्रेंडलिस्ट की सभी लड़कियों के प्रोफाइल चेक किए। देखते-देखते वो वहाँ पहुँची जहाँ पहुँचना चाहती थी, पर शायद जहाँ पहुँचना नहीं चाहिए था। लड़के की अब हो चुकी पत्नी। उसकी सगाई (गोट एंगज्ड) लड़की और लड़के की आखिरी शिमला ट्रिप से पहले हो चुकी थी। शिमला से लौटने के दो महीने के अंदर शादी भी। लड़के और पत्नी के कुछ फ़ोटोज़ उस समय के भी थे जब वह लड़का इस लड़की के साथ भी रिश्ते में था। लड़की के परिवारवालों ने अपना फ़र्ज़ निभाया और ख़ूब ताने दिए। जिसके लिए इतने हूँकार भर रही थी उसी के पास जा। यहाँ तुझे रोने को कोई नहीं बैठा। लड़की रात-रात भर बड़बड़ाती रहती। उसकी बातें कुछ ऐसी थी कि बहुत घिनौने ढंग से उसका इस्तेमाल किया गया। इंसान भी नहीं समझा। इस बात को वक़्त बीत चुका कुछ, बेहतर तो है पर पूरी तरह से उबरी नहीं है वह। (जानती हूँ कि ये सब मुझे बताया गया है मैंने दोनों पक्षों को भी नहीं सुना है, किसी एक के पक्ष में बोलने का भी शायद हक़ नहीं, पर छल और धोखे को दिल कैसे झेल पाता होगा, मुझे सोचकर ही घबराहट होती है, एक पत्थर सा गले में अटक जाता है)

इस बात का ज़िक्र इस दुआ के साथ आज, कि लड़कियाँ जो ब्रेकअप के बाद हॉस्पिटल पहुँची या डीएक्टिवेट हो गईं, कहीं खो गईं, लौट आएँ।

Tuesday, 22 August 2017

क्या सब करना है तय करते
एक लंबा वक्त गुज़ारा
कुछ किताबें
कुछ शहर
कई पहाड़ और समंदर
बहुत से छोटे सुख
और बहुत कम बड़े दुःख

फिर
क्या नहीं करना है तय करना चाहा
वो सब होता गया जो नहीं करना तय था
वहाँ खड़े थे हम
जहाँ सब थूकते मुँह पर
दीवार समझकर

अब पता नया है
घर कोई और।

Monday, 21 August 2017

कुछ बातें समय रहते दर्ज करना बेहद ज़रूरी होता है
एक वक़्त के बाद जब वे अपना अर्थ खो देंगी
तब भी किसी और कालखंड का अमिट सत्य रहेंगी
हम उस वक़्त में नहीं उन शब्दों और उन भावों में लौट सकेंगे शायद
या शायद नहीं
कुछ सवाल बदलेंगे
कुछ जवाब
या शायद नहीं
वक़्त सब तय करेगा
तुम्हारे अपराध
और मेरे गुनाह भी
एक ही सफ़र में जब पीछे भेड़िया हो
और रात एक दौड़ में बदल जाए
फिर दिन में बस घबराहटें
किसी को ना कह पाना
कि तुम जानते नहीं कि मेरी आत्मा छीलने से
तुम्हें हासिल कुछ नहीं होगा
एक दिन बस वो ख़त्म हो जाएगी
शायद नहीं
तुम्हारे लिए
मेरे लिए भी शायद
फिर जो होगा उसे हम पहचानेंगे नहीं
या शायद एक नई पहचान के साथ पहचान सकें
पर पुराना नहीं होगा वह चाहे जो हो
शायद इतने अच्छे लोग
जीने नहीं देंगे
दुनिया को थोडा और बदतर होना था
मेरी दुनिया को
या माँगने की फितरत ना होती अपनी
या अपना कोई छिपा हुआ अर्थ
या स्टूल के नीचे थोड़ी ज़्यादा जगह
और थोडा ज़्यादा अँधेरा
थोड़ी ठण्ड कम होती
थोडा ये होता
और थोडा वो भी
या फिर कुछ ना होता

क्या ऐसा हो सकता है कि कुछ ना हो?



Tuesday, 15 August 2017

सीढ़ी

बहुत तेज़ी से आस-पास लोग गुज़र रहे थे
सभी को कहीं पहुँचना था
सभी का ध्यान अपने अँगूठे पर था
उसकी एक छाप के इर्द-गिर्द थी सारी सुबहें

अँगूठा नहीं गिना
जब भी गिनी सेकंड्स
गिनती
एक दो तीन.....दस..पचास..सौ
समय का यूँ बीतना
जेबों का भरते जाना
ये कब हुआ
सोचने को ज़रा देर रुक पाते
कुछ सांस आती

एक सीढ़ी पर कई पायदान चढ़ने पर भी
ऊँचाई में फ़र्क नहीं पड़ता
बस दम उखड़ता जाता.

एक थी टुनटुन…

मुट्की! टुनटुन कहीं की”, “इतना खाएगी तो टुनटुन हो जायेगी” ,मेरी एक दोस्त की दादी उसे अक्सर यही कहती हुई पायी जाती थी. टुनटुन नाम से मेरा पहला परिचय यही रहा. इस लेख को लिखने का मकसद अगर कुछ है तो बचपन में मिले इस परिचय को खारिज करना. बतौर गायिका हिंदी सिनेमा में कदम रखने वाली उमा देवी खत्री को मोटापे की मिसाल नहीं बल्कि बतौर कलाकार देखने की कोशिश….


11 जुलाई 1923 को उत्तरप्रदेश में जन्मी उमा देवी महज़ तेइस वर्ष की उम्र में गायन के क्षेत्र में हाथ आजमाने मायानगरी में आ गई थी. यहाँ तक पहुँचने के अपने सफ़र को उमा ने बताया “मुझे याद नहीं कि मेरे माता-पिता कौन थे और कैसे दिखते थे. मैं कोई दो-ढाई बरस की रही होंगी जब वे गुज़रे थे. मुझसे बड़ा एक भाई था जिसका नाम हरि था, वह मेरा बेहद ख्याल रखता था लेकिन एक रोज़ वह भी गुज़र गया और दो वक्त की रोटी के एवज़ में रिश्तेदारों के लिए 24 घंटे की नौकरानी छोड़ गया. अब रिश्तेदारी-बिरादरी में जहां कहीं भी शादी-ब्याह, जीना-मरना हो काम के लिए मुझे भेजा जाने लगा. गाने का शौक मुझे बचपन से था, लेकिन गुनगुनाते हुए भी डर लगता था क्योंकि उन लोगों में से अगर कोई सुन लेता था तो मार पड़ती थी. सन 1947 में काम की तलाश में मैं कारदार के स्टूडियो पहुंची और बेरोक-टोक उनके कमरे में घुस उन्हीं से पूछ बैठी, कारदार कहाँ मिलेंगे मुझे गाना गाना है. दरअसल ना तो मैं कारदार को पहचानती थी ना फ़िल्मी तौर-तरीकों से वाकिफ थी. शायद मेरा यही बेतकल्लुफ्फी अंदाज़ कारदार को पसंद आया जो बिना ना नुकुर किये उन्होंने नौशाद साहब के असिस्टैंट गुलाम मोहम्मद को बुलाया और मेरा टेस्ट लेने को कहा. गुलाम मोहम्मद ढोलक लेकर बैठे तो मैंने उनसे ठीक से बजाने को कहा. मेरे बेलाग तरीके से वे भी हक्के-बक्के थे. बहरहाल मैंने फिल्म जीनत का नूरजहाँ का गाया गीत “आंधिया गम की यूँ चली..” गाकर सुनाया जो सबको बहुत पसंद आया और मुझे 500 रुपये महीने की नौकरी पर रख लिया गया.”
उमा देवी माने टुनटुन ने कई बेहतरीन गीत गाये, उनका पहला गाना फिल्म दर्द से ‘अफसाना लिख रही हूं दिले बेकरार का‘ इतना बड़ा हिट साबित हुआ कि आज भी टुनटुन को इसी से पहचाना जाता है , आज भी गुनगुनाया जाता है. तकरीबन 40-45 गीत गाने के बाद पारिवारिक समस्याओं के चलते उनके करियर में एक ब्रेक आ गया, इस बात से अनजान कि यह अल्पविराम उनके गायन के लिए पूर्णविराम भी साबित हो सकता है उमा देवी जब लौटी तो उन्हें बतौर गायक काम नहीं मिल सका. ऐसे में उन्हें अभिनय की सलाह मिली और यहाँ से उमा का नया सफ़र शुरू हुआ जिस सफ़र को हम टुनटुन का सफ़र मानते हैं.
हास्य के लिए टुनटुन हों, या मुकरी अपने शरीर को अपनी ताकत बना लिया. वर्तमान में भारती सिंह भी मानो उन्ही पद-चिह्नों पर चल रही हैं. दरअसल सिनेमा आसमान सरीखा एक अनंत कैनवास है. जिसपर अलग-अलग रंग और बेरंग पेंटिंग्स की गई हैं. बेमतलब और अर्थहीन कुछ नहीं. जैसे एब्सर्ड पेंटिंग्स से गहरे अर्थबोध निकल आते हैं वैसे ही सिनेमा में भी सबकुछ का मतलब है. कहते भी हैं कि सिनेमा सभी कलाओं का संगम है. ज़रुरत है तो बस इसके सदुपयोग को समझने की. एक ऐसे समाज में जहां मोटा व्यक्ति केवल हंसी का पात्र हो सकता है वहाँ टुनटुन उर्फ़ उमा इसी को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लोगों के मनोरंजन के लिए प्रस्तुत हो गई.
हास्य कलाकार जब आपको हंसाते हैं तो सोचिये कि कहीं मेरा नाम जोकर की तरह आप उनके जीवन कि ट्रेजेडीज़ पर तो नहीं हंस रहे! देखा जाए तो यह विडम्बना ही है कि फिल्मों में मोटा, बेडौल, छोटा, नाटा, गोरा, काला, हकलाता व्यक्ति, बहरा व्यक्ति, नेत्रहीन व्यक्ति और विकलांग सब हंसी का पात्र हो गए. परिस्थितिजन्य हास्य बिरला ही देखने को मिलता है. ऐसे में बिना किसी झिझक और शर्म के अपने शरीर को स्वीकार कर कला के प्रति टुनटुन का समर्पण काबिल-ए-तारीफ़ तो है ही. जो ख्याति टुनटुन को मिली वह शायद उमा देवी को नहीं मिल पायी जबकि जबकि खुद टुनटुन कि पसंद गायिका उमा देवी थीं. खूबसूरत और हरफनमौला टुनटुन को उनकी पुण्यतिथि पर नमन.

आख़िर तुम ब्राह्मण हो !

नॉर्थ कैम्पस, दिल्ली विश्वविद्यालय का हिंदी विभाग! मौक़ा था हमारे एम. फिल इंटरव्यू का, लिखित परीक्षा अच्छे अंकों से पास कर लेने पर अपनी पांच सालों की पढ़ाई पर थोड़ा भरोसा लेकर हम इंटरव्यू हॉल में पहुंचते हैं। वहां पांच पुरुष-प्रोफेसर्स के बीच सुशोभित अकेली महिला-प्रोफेसर आश्वस्त करती है कि संख्या कम है लेकिन है। उनकी मेज़ पर चाय बिस्कुट और समोसे ! वे इतने भूखे थे कि सवालों के बीच ही में समोसा खाते और चाय सुड़कते।
मुझसे पहला सवाल पूछा रसिक आलोचक महोदय ने ‘आपका स्पेशलाइज़ेशन किसमें है?’ अब सोच रही हूं कि अभी कहां स्पेशलाइज़ेशन! ख़ैर जवाब दिया कि मुझे फलाँ फलाँ लेखक कवि पसंद हैं। ‘अच्छा नागार्जुन! उनकी अकाल और उसके बाद सुनाइए’ सुनाने से पहले ही एक महानुभाव बोले ‘सुबह से बहुत बार यही सुन रहे हैं तुम भी यही सुना दो’ और ज़ोरदार ठहाका ! मैंने बचपन में मम्मी पापा के किसी रिश्तेदार के सामने पोएम सुनाने को कहा जाने पर ‘देखो एक डाकिया आया, चिट्ठी कई साथ में लाया’ वाले अंदाज़ में कविता शुरू कर दी, गलती तब हुई जब नागार्जुन जी की कानी कुतिया को सुलाने के बजाय रुला दिया मैंने। जैसे ही यह पंक्ति गलत बोली मैंने ‘कई दिनों तक कानी कुतिया बैठी रोई उसके पास’ पूरा हॉल ठहाकों से गूँज गया। और अभी तक जिस महिला-प्रोफेसर की उपस्थिति आश्वस्त कर रही थी उनकी टिपण्णी आई ‘ये तो डुबो देगी’ और भी ज़ोर से ठहाका लगा। फिर रसिक आलोचक जी ने तफ़री ली ‘अरे नहीं नहीं मैडम! समय के साथ कविता में बदलाव भी ज़रूरी है, हाँ बेटा तुम आगे सुनाओ।’ वे हंसी दबा रहे थे या मुझे सुना रहे थे पता नहीं। इस तरह के अपमान के लिए मैं तैयार नहीं थी लेकिन।
इस घटना के बाद मुझसे पूछे गए सवाल मेरे कानों तक पहुँच ही नहीं पाये। मानो कानों में पिघला हुआ सीसा डाल दिया गया हो। मुझे अंतिम सवाल याद है ‘अन्ना केरेनिना किसने लिखी है?’ यह किताब मैंने इस तरह पढ़ी थी कि अन्ना के साथ सारे द्वंद्व जिए थे। उसकी मौत पर आँसू बहाए थे। लियो टॉलस्टॉय का नाम लेने के लिए भी मेरा मुँह नहीं खुल सका। ‘बच्ची घबरा गई है’ कहकर मुझे इंटरव्यू समाप्ति की सूचना मिली और दरवाज़े के बाहर निकलते हुए भी मेरी पीठ पर उनकी हंसी गूंज रही थी।
ये गूँज कितने दिनों तक मेरे कान में गूंजती रही, वे लोग नहीं समझेंगे। मेरा चयन नहीं होगा इसे लेकर मुझे ज़रा संशय नहीं था। पर गुरुजी के चरणों में नतमस्तक ऐसे शिष्यों का चयन जिन्हें अन्ना केरेनिना नामक कोई पुस्तक भी है की जानकारी ना हो, ने हैरान किया। हिंदी विभाग में जुगाड़ के बिना कुछ नहीं होता ऐसा कहने वाले बहुत लोग मिले लेकिन मैं हमेशा सोचती थी कि काबिलियत को कोई दरकिनार भला कैसे कर सकता है। तब मेरी मुलाक़ात एक ऐसे सज्जन से हुई जिन्हें मुझसे पूरी सहानुभूति थी। ‘अरे रे! तुम तो ब्राह्मण हो फिर भी नहीं लिया? अगली बार इंटरव्यू से पहले मुझे सूचित करना’ मैं उस दिन समझी कि क्या फ़र्क़ पड़ता अगर कानी कुतिया रोई होती या सोई होती ! चयन तो निर्धारित था। सज्जन ने मेरे ज्ञान-चक्षु खोलते हुए यह भी समझाया कि कितनी सीट्स पर उनका कब्ज़ा है (अर्थात् उनके द्वारा भेजी गई कितनी सिफारिशों पर सुनवाई होगी) ‘अपना रोल नंबर और पूरा नाम भेज देना अगर उधर से कोई बड़ी सिफारिश नहीं आई तो हम तुम्हारा करवा देंगे, आखिर तुम ब्राह्मण की संतान हो’ मैंने मेरे जीवन में मेरे घर परिवार दोस्तों में कहीं ब्राह्मण शब्द का ऐसा प्रयोग नहीं सुना था।
मेरे ज़हन में उदय प्रकाश की पीली छतरी वाली लड़की के हिंदी प्रोफेसर साहब आने लगे। ये ब्राह्मणवादी स्वरुप से मेरा पहला आमना-सामना था, मुझे शर्मिंदगी हुई ! मेरे एक मित्र ने एक दिलचस्प मगर दुखद किस्सा सुनाया, हुआ यूँ कि एक छात्र नियमित रूप से प्रोफेसर के घर के काम, उनकी पत्नी के लिए सब्ज़ी तरकारी खरीदना, बीच वार्तालाप में पाँच बार पाँव छूना वगैरह वगैरह करता…प्रोफेसर ने भी कह दिया कि तुम्हारी सीट पक्की है। बस भूल यह हुई कि ‘कैटेगरी’ पूछे जाने पर उसने सकपकाकर ‘जनरल’ कह दिया(संभवतः गुरूजी को वह भी भली-भांति समझ-बूझ गया होगा) लेकिन जब इंटरव्यू लिस्ट में उसके नाम के साथ OBC लिखा देखा तो गुरूजी ने एडमिशन तो नहीं ही दिया डपटा सो अलग !
जाति किस कदर दिल्ली विश्वविद्यालय के अंदर तक खोखले हिंदी विभाग का अंग है ये हिंदी विभाग से जुड़ा कोई भी शख्स जिसके अन्दर लेशमात्र भी ईमानदारी बची है नकार नहीं सकता। लाल झंडे वाले भी अपना कैंडिडेट तैयार रखते हैं। न्याय की बात करने वालों का अपना तर्क है कि उन्हें संख्या-बल चाहिए, अपनी विचारधारा वाले। मेरिट किस चिड़िया का नाम है ! योग्यता गई तेल लेने ! मेरी एक मित्र को अपने चयन पर भरोसा था और चयन हुआ भी। और भरोसा क्यों ना हो आख़िर 10000 रुपये तक के गिफ्ट्स जो महिला-प्रोफेसर के चरणों में अर्पित किये थे। (ध्यातव्य है कि ये डंके की चोट पर वाम सपोर्टर हैं) माने हमाम में सभी नंगे हैं। एक तो करेला उसपर नीम चढ़ा वाली बात यह है कि ऐसी बेशर्मी ये लोग लुक-छिपकर नहीं करते।
ख़ैर, ऐसे अनुभवों के बाद मोहभंग हो जाना स्वाभाविक ही था। फेसबुक के माध्यम से मिली जानकारी है कि इस जूता-चाट चयन-प्रक्रिया पर सवाल उठाया था दिल्ली विश्वविद्यालय के गोल्ड-मेडलिस्ट छात्र अभय मिश्रा ने! उन्होंने हाई-कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसे वे हार चुके हैं। फेसबुक पर 2016 की उनकी एक पोस्ट भी काफी चर्चा में रही थी जिसे यहां लगाया जा रहा है।
अभय मिश्र द्वारा 15 सितम्बर 2016 को फेसबुक पर लिखी गई पोस्ट 

चयन मेरिट पर आधारित हो। मूल्यांकन में पारदर्शिता होनी चाहिए। यह चेतनाविहीन विभाग कितने सपनों के साथ खेलता है और कितने ही छात्रों को अवसाद की गर्त में धकेलता है! कमलानगर और मुखर्जीनगर के उन सीलन भरे कमरों में कितने सपने दम तोड़ते हैं। गाँव में दूर अपने 24-25 वर्षीय बच्चों से आस लगाए बैठे माँ-पिता से महीने का खर्च माँगते हुए कितनी बार गले में फाँस अटकती है, ये असंवेदनशील गुरु-घंटाल क्या भला कभी समझ सकेंगे ! मठ और गढ़ जाने कब टूटें और कब जाने न्याय हो ! छात्र संघर्ष ज़िंदाबाद ! बिना लाल सलाम!

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...