Tuesday, 27 November 2018

चुप्पियाँ

हम बार-बार बात करते 
कि कैसे हमने पहली बार सुना एक मित्र की मृत्यु का समाचार
और पूरी क्रूर संवेदनशीलता से ज़िन्दा किया उस मनहूस दिन को
फिर याद किया 
उसकी पसंद के रंग, खाने और कविता को
और 
नापसंदगियों को भी 

बातों के सन्नाटे में हमने 
झट से लपका अपना एकांत 
और सोचा ऐसा वक़्त 
जब हम खप चुके होंगे
एक लम्बे रीढविहीन जीवन के बाद 

सोचा कि कितना कुछ है जो जैसा है वैसा नहीं होना चाहिए
और अगली सुबह से करेंगे एक नई शुरुआत

वक़्त को गिनना 
जैसे गिनते हैं सोमवार से दिन
कि कब से नहीं आया शुक्रवार

और जीने के लिए पैसे बहुत कम हैं पास
कि कुछ और काम की ज़रुरत है जैसे
चार हाथ
या चालीस घंटे
किताबें पढ़ने के मिलते नोट
या चलने ही से शायद

जो बात जहाँ कहनी होती है 
वहाँ न कहने से
किसी ऐसी जगह कह बैठते हैं हम 
जहाँ 
सबसे ज़्यादा ग़लत ठहरती है 
सबसे सही बात

जो समझ जाते हैं 
फिर भी नहीं कहते

वे चुप रहते हैं
अंत तक।  

2 comments:

  1. कहीं ये चुप्पियां ....
    कहीं बेबाक हो जाना
    ये बातें ही तो बातें हैं
    न हो ये फिर तो क्या ज़िंदा
    --------------

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  2. शर्मा जी, क्या बात ! <3

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