Tuesday, 15 August 2017

एक थी टुनटुन…

मुट्की! टुनटुन कहीं की”, “इतना खाएगी तो टुनटुन हो जायेगी” ,मेरी एक दोस्त की दादी उसे अक्सर यही कहती हुई पायी जाती थी. टुनटुन नाम से मेरा पहला परिचय यही रहा. इस लेख को लिखने का मकसद अगर कुछ है तो बचपन में मिले इस परिचय को खारिज करना. बतौर गायिका हिंदी सिनेमा में कदम रखने वाली उमा देवी खत्री को मोटापे की मिसाल नहीं बल्कि बतौर कलाकार देखने की कोशिश….


11 जुलाई 1923 को उत्तरप्रदेश में जन्मी उमा देवी महज़ तेइस वर्ष की उम्र में गायन के क्षेत्र में हाथ आजमाने मायानगरी में आ गई थी. यहाँ तक पहुँचने के अपने सफ़र को उमा ने बताया “मुझे याद नहीं कि मेरे माता-पिता कौन थे और कैसे दिखते थे. मैं कोई दो-ढाई बरस की रही होंगी जब वे गुज़रे थे. मुझसे बड़ा एक भाई था जिसका नाम हरि था, वह मेरा बेहद ख्याल रखता था लेकिन एक रोज़ वह भी गुज़र गया और दो वक्त की रोटी के एवज़ में रिश्तेदारों के लिए 24 घंटे की नौकरानी छोड़ गया. अब रिश्तेदारी-बिरादरी में जहां कहीं भी शादी-ब्याह, जीना-मरना हो काम के लिए मुझे भेजा जाने लगा. गाने का शौक मुझे बचपन से था, लेकिन गुनगुनाते हुए भी डर लगता था क्योंकि उन लोगों में से अगर कोई सुन लेता था तो मार पड़ती थी. सन 1947 में काम की तलाश में मैं कारदार के स्टूडियो पहुंची और बेरोक-टोक उनके कमरे में घुस उन्हीं से पूछ बैठी, कारदार कहाँ मिलेंगे मुझे गाना गाना है. दरअसल ना तो मैं कारदार को पहचानती थी ना फ़िल्मी तौर-तरीकों से वाकिफ थी. शायद मेरा यही बेतकल्लुफ्फी अंदाज़ कारदार को पसंद आया जो बिना ना नुकुर किये उन्होंने नौशाद साहब के असिस्टैंट गुलाम मोहम्मद को बुलाया और मेरा टेस्ट लेने को कहा. गुलाम मोहम्मद ढोलक लेकर बैठे तो मैंने उनसे ठीक से बजाने को कहा. मेरे बेलाग तरीके से वे भी हक्के-बक्के थे. बहरहाल मैंने फिल्म जीनत का नूरजहाँ का गाया गीत “आंधिया गम की यूँ चली..” गाकर सुनाया जो सबको बहुत पसंद आया और मुझे 500 रुपये महीने की नौकरी पर रख लिया गया.”
उमा देवी माने टुनटुन ने कई बेहतरीन गीत गाये, उनका पहला गाना फिल्म दर्द से ‘अफसाना लिख रही हूं दिले बेकरार का‘ इतना बड़ा हिट साबित हुआ कि आज भी टुनटुन को इसी से पहचाना जाता है , आज भी गुनगुनाया जाता है. तकरीबन 40-45 गीत गाने के बाद पारिवारिक समस्याओं के चलते उनके करियर में एक ब्रेक आ गया, इस बात से अनजान कि यह अल्पविराम उनके गायन के लिए पूर्णविराम भी साबित हो सकता है उमा देवी जब लौटी तो उन्हें बतौर गायक काम नहीं मिल सका. ऐसे में उन्हें अभिनय की सलाह मिली और यहाँ से उमा का नया सफ़र शुरू हुआ जिस सफ़र को हम टुनटुन का सफ़र मानते हैं.
हास्य के लिए टुनटुन हों, या मुकरी अपने शरीर को अपनी ताकत बना लिया. वर्तमान में भारती सिंह भी मानो उन्ही पद-चिह्नों पर चल रही हैं. दरअसल सिनेमा आसमान सरीखा एक अनंत कैनवास है. जिसपर अलग-अलग रंग और बेरंग पेंटिंग्स की गई हैं. बेमतलब और अर्थहीन कुछ नहीं. जैसे एब्सर्ड पेंटिंग्स से गहरे अर्थबोध निकल आते हैं वैसे ही सिनेमा में भी सबकुछ का मतलब है. कहते भी हैं कि सिनेमा सभी कलाओं का संगम है. ज़रुरत है तो बस इसके सदुपयोग को समझने की. एक ऐसे समाज में जहां मोटा व्यक्ति केवल हंसी का पात्र हो सकता है वहाँ टुनटुन उर्फ़ उमा इसी को अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लोगों के मनोरंजन के लिए प्रस्तुत हो गई.
हास्य कलाकार जब आपको हंसाते हैं तो सोचिये कि कहीं मेरा नाम जोकर की तरह आप उनके जीवन कि ट्रेजेडीज़ पर तो नहीं हंस रहे! देखा जाए तो यह विडम्बना ही है कि फिल्मों में मोटा, बेडौल, छोटा, नाटा, गोरा, काला, हकलाता व्यक्ति, बहरा व्यक्ति, नेत्रहीन व्यक्ति और विकलांग सब हंसी का पात्र हो गए. परिस्थितिजन्य हास्य बिरला ही देखने को मिलता है. ऐसे में बिना किसी झिझक और शर्म के अपने शरीर को स्वीकार कर कला के प्रति टुनटुन का समर्पण काबिल-ए-तारीफ़ तो है ही. जो ख्याति टुनटुन को मिली वह शायद उमा देवी को नहीं मिल पायी जबकि जबकि खुद टुनटुन कि पसंद गायिका उमा देवी थीं. खूबसूरत और हरफनमौला टुनटुन को उनकी पुण्यतिथि पर नमन.

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