Thursday, 15 September 2016

हम फूल खिलाने निकले थे !

हम लगातार भाग रहे थे
अँधेरों से दूर
अँधेरा कालापन छोड़ते हुए चिपक गया था हमारी चमड़ी पर
दो अलग शहरों में रहते हुए हम चार शहरों में जी रहे थे
हिस्सों में आधे-अधूरे
हम भूख दबाते थे
किताबों में नए नए बुकमार्क सजाते थे
उस दिन भी वही बच्ची खिड़की पर खड़ी थी
जिसकी तस्वीर तुमने भेजी थी
यहां उसका नाम बदल गया था
हर शहर एक नया नाम देता है इन बच्चियों को
और शहर बदलने के साथ
मैं बहुत ज़ोर डालने पर भी
वो पुराना नाम याद नहीं कर पाती
उसके एक हाथ में गर्म रोटियों का भरा डब्बा
सिर पर भाप उड़ाते चावल
 एक पतली सी लट
आँखों में चुभ रही है
सुनो बच्ची
कुछ कर पाने से पहले ही सब धूल हो गया
सब धूल होता जाएगा


हम फूल खिलाने निकले थे !

Sunday, 4 September 2016

एक शाम के इंतज़ार में

आसमान से जैसे दिखाई देती है धरती
वैसे ही दिखते हो तुम
मेरे घर
मैं अगर न लौट सकूँ
तो तुम हाथ बढ़ा देना
हाथ थाम लूँ ज़रूरी तो नहीं
पर तसल्ली रहेगी

आगे सारा फैलाव
कदम कदम
जितना था आगे सब पार किया
जो ख़त्म किया
अब पीछे है

अकेला होना उतना बुरा नहीं

एक शाम के इंतज़ार में
चौराहें सारे देखेंगे !





रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...