Tuesday, 27 August 2013

तलाश

खालीपन
खुद के वज़ूद की तलाश
जीवन की सार्थकता की तलाश
कहाँ ले जायेगी?

एक सुरंग
जिसमें है अँधेरा
और अंधापन
जो संकरी है
इतनी संकरी कि
एक अंगुली हिलाने
की भी गुंजाइश नहीं
साँसे उखड रही है
दम  घुट रहा है
पर चलना है
आखिरी सिरे तक पहुँचना है
इस उम्मीद के साथ
कि नज़र आएगा
खुला नीला आकाश
कैसा होगा वह खुलापन?

जब पलटकर देखेंगे कि
साथी उस सुरंग में
कहीं खो गए
वे चींखें
जिन्हें नज़रंदाज़ कर
हम आगे बढ़ते गए
कानों को चीरेंगी
लौटने का कोई
रास्ता न होगा
क्या पा लेंगे?

कहीं वह घुटन
और भी अधिक सघन
होकर बढ़ तो न जायेगी !
या कि बेहूदगी से
जश्न मनाएंगे ?

और भी काला
गहरा काला तम
चारों और पसर जाएगा !
या कि लम्बे समय से
अँधेरे की अभ्यस्त आँखें
चकाचौंध से अंधी हो जायेगी!

 कुछ भी न पा सकेंगे
पायेंगे तो केवल
एक नई तलाश
और
खालीपन।

Wednesday, 3 July 2013

तुम्हारी याद

प्रेम रस सूखने पर
जब मन की धरती
बंजर हो जाती है
तब
केवल एक सहारा
तुम्हारी याद आती है
और
ज़िन्दगी फिर तैरने लगती है। 

Friday, 14 June 2013

ये आँखें

सफ़र की थकान
मायूसी
और खालीपन
की दास्ताँ हैं
ये आँखें
अब सोना चाहती है
कभी न जागने के लिए
पर डरती हैं
उस डर से जो
इस गहरी नींद से
जागना चाहता है। 

Wednesday, 12 June 2013

. . .झुककर ना गुज़रना पड़े

सब कुछ छोटा है
छोटा दरवाज़ा
छोटी खिड़की
छोटा आदमी
छोटी सोच
कब होगा सब बड़ा
इतना बड़ा
जिसमें से
झुककर ना गुज़रना पड़े। 

Tuesday, 11 June 2013

अतीत का मकबरा

वो  दिन भी आएगा
जब फटेगा
अतीत का मकबरा
और
उसमें दफ़न 
यादें
अपनी सारी सामर्थ्य
से चीख उठेंगी
पूछेंगी सवाल
आखिर क्यों
उन्हें इतनी बेरहमी से
भुला देने की
साज़िश रची गई !

रास्ते

मैं जहां भी गई  भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...