मत रोना दोस्त
स्पर्श के अभाव में
उस ओर
सुना है
दरवाजें नहीं होते
जो रोक सकें
होते हैं पर बंधन
न पहुँच सकने के
ऐसे अज्ञात में
जैसे हो आकाश बिना पंख
खो देना पंख
चुनाव भी तो सकता है हो
मृत्यु हो सहेली
एक सखी चाँद की
रहती है
बहती है
सहती है
ओ नदी, बीच सड़क
मायने हैं कुछ जीवन के क्या
मृत समक्ष
जीत के
या सफलता के
स्वयं समक्ष रिरियाते जीवन भी क्या
'मृत्यु' से नहीं कोई आशा
'अंत' से है जुडी
सब कुछ अंततः ख़त्म होगा
आगे पडा शेष जीवन
पीछे होगा
जिसे दबे पाँव आना था
डरते हुए
कि है ये अपराध
उसे यूँ पाला गोद में
पुचकारा जैसे बेटी
मैंने हर उस शख्स की हत्या की स्वप्न में
जिसे चाहा कि वो रहे
बर्फ पर लिखा जीवन
रात भर देखा उस टुकड़े को
फिर उगा सूरज.
No comments:
Post a Comment