Monday, 20 February 2017

अतिथियों लौट जाओ

अनुत्तरित सवालों पर खेद जताया

कई दोस्तों को व्हाट्सएप्प किया
कईयों की नाराज़गी उठायी 
अपनी लगातार अनुपस्थिति 
के कारण गिनवाएं
बेहिसाब सच के साथ कई झूठ बोले

जो कहती कि 
नहीं थी उपस्थित खुद अपनी देह में भी 
तो नहीं करते यकीन
सो गिनवाई व्यस्तताएँ

फिर एक रोज़ जब वे सब लौट आए
मैंने ताला लगा लिया भीतर से
और खूब हँसी
किस पर?
खुद में एक और शख्स का उग आना
वे दरवाज़े पीट रहे थे
मैं खुद को बचा रही थी

मैं बंद अँधेरे कमरे में 
अवांछित उपस्थितियों से घिरी थी
वे बाहर भीतर सब जगह थे
वे कहीं नहीं थे

ये मेरा निमंत्रण था
अतिथियों लौट जाओ।  

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