Saturday, 18 February 2017

डिअर मैं और मेरी तुम

तुम हमेशा वैसी लड़की रही हो जैसी मैं होना चाहती हूँ, मैं तुम्हें बहुत पसंद करती हूँ इसीलिए जब भी परेशान होती हूँ तुम्ही को चिट्ठी लिखती हूँ। तुम्हे सारे जादू आते हैं, तुम कन्धों पर पंख लगाना जानती हो। मैंने हमेशा ही तुम्हें अपने सबसे करीब पाया है। आज फिर कुछ अजीब हुआ, तुम्हारे सिवा कौन है जिसे यह बता सकती हूँ। जानती हूँ कि जानकार तुम परेशान हो जाओगी लेकिन जानोगी नहीं तो मुझे बचाओगी कैसे। एक मामूली सी घटना है लेकिन जाने क्यों मैं घबरा गयी हूँ बहुत।
आज चलते-चलते ठोकर लगी और पाँव का नाखून उखड गया। खून भी बहा लेकिन दर्द नहीं हुआ। सच देखने में चोट जितनी गहरी थी उतना दर्द नहीं हुआ। फिर भी मैं फफककर रोई। मुझे ठोकरें खाने पर, बस के पीछे दौड़ते हुए और बाज़ार से सामान लाते हुए बोझ से उँगलियों में होने वाले असहनीय दर्द के बाद रुलाई फूटती है। कभी कभी गुस्सा आता है उन लड़कियों पर जो कहती हैं पति के पैसों पर मौज उड़ायेंगी, और सच कहूँ अपनी हालत देखकर घर बैठी गृहिणियों से भी रश्क़ होता है कि कितनी सुलझी और तयशुदा ज़िन्दगी है इनकी। रोज़ की वही एक दिनचर्या।
मैं नहीं चाहती ऐसे सोचना, मुझे मैं कमज़ोर भी लगती हूँ। एक पैर पर खड़े होकर मोची से चप्पल सिलवाते हुए सोचती हूँ कब उतना खाली वक़्त होगा जब घंटें गिनकर नहीं सोना होगा। जब समय निकालकर किताबें नहीं पढ़नी होगी बल्कि किताबों के बीच से ही रास्ते गुज़रेंगे। फिर तुम्हें देखती हूँ, कैसे तुम फाइल्स के बीच छिपाकर अपने मन की करती हो, कैसे आँख झपकते ही जंगल, पहाड़ और समंदर देख आती हो। तुम पंख लगाती हो और मैं अपने नाजुक कंधों को सहलाती हूँ। ये चिट्ठी किसी लाल डब्बे के हवाले नहीं करुँगी, अपने तकिये के नीचे रखकर सो जाऊँगी, ताकि जब सुबह तुम उठो तो मेरे रात के आँसू तुम्हारी सुबह की मुस्कान बन सकें।
यूँ खुद को भी तो कभी चिट्ठी लिखी जानी चाहिए कि बता सकें उस शख्स को जो हमेशा हमारे साथ है और हमें सबसे अच्छी तरह समझता है उसे हम कितना प्यार करते हैं।
तुम हमेशा याद रखना मैं तुम्हें, तुम्हारी ताक़त के साथ साथ तुम्हारी कमज़ोरियों को भी उतनी ही शिद्दत से चाहती हूँ क्योंकि तुम दुनिया में सबसे ताक़तवर होने की होड़ में नहीं हो।

-तुम और तुम्हारी मैं


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