दिन का उजाला
सृजन को बेधता था
रातें काले सांप सी
मुझे
एक लंबा सांप
लिपटकर मेरी देह से
नापता हर इंच
कि निगल सके
समूचा
यूं रातें आती
और दिन चढ़ता
मैं निगलती बेबसी को
करती इंतज़ार
कि सुकून चलकर आए मेरे पास
वे सारी पीठें जो हर रोज़ रगड़ खाती हैं मुझसे
घिन्न भी उतनी तीक्ष्ण नहीं अब तो
कहीं आदत तो नहीं
आदतें एक दिन पैटर्न बन जाती हैं
उनका कोई ख़ास मतलब हो ज़रूरी नहीं
वे बस होती हैं
और हम ढलते जाते हैं
जैसे शाम .
सृजन को बेधता था
रातें काले सांप सी
मुझे
एक लंबा सांप
लिपटकर मेरी देह से
नापता हर इंच
कि निगल सके
समूचा
यूं रातें आती
और दिन चढ़ता
मैं निगलती बेबसी को
करती इंतज़ार
कि सुकून चलकर आए मेरे पास
वे सारी पीठें जो हर रोज़ रगड़ खाती हैं मुझसे
घिन्न भी उतनी तीक्ष्ण नहीं अब तो
कहीं आदत तो नहीं
आदतें एक दिन पैटर्न बन जाती हैं
उनका कोई ख़ास मतलब हो ज़रूरी नहीं
वे बस होती हैं
और हम ढलते जाते हैं
जैसे शाम .
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