Wednesday, 14 October 2015

आत्महत्या

अद्भुत मुखौटा है
हँसता  है और
आँखों से लहू बहता है
उसे सज़ा मिली है
सज़ा मुस्कुराने की
मासूमियत की परतों को छील देती है
सिद्धांतों की धार
अपना सही बचाते बचाते एक दिन
हम गलत हो जाते हैं
और हमारे हिस्से सजाएँ आती हैं
फिर भी कहा जाता है
कि करो ख़ुद को साबित
निरपराध
विचित्र चुनौती है
सज़ा से भी कम नहीं होते गुनाह
गुनाह जो कभी किये ही नहीं गए
एक झरना फूटता है
पिघलती रौशनी का झरना
आदर्शों से भरी दुनिया में
सिमटता है सबकुछ
एकांत है
खामोशी
एक लम्हा आकर पास बैठ गया
सुनाने लगा कहानी अपनी
आँख से लहू के आँसू धुल जाए शायद
और वही नमकीन पानी फिर बह निकले
आज वह अपनी सज़ा की आख़िरी किश्त अदा कर रहा है
वह मुस्कुराता है
इस आदर्शों, सिद्धांतों से भरी मूल्यविहीन दुनिया पर
पहचानता है खुद के कुछ मूल्य
जो उसके अपने हैं
एक घटना ही तो है
आत्महत्या !
  

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