Saturday, 3 October 2015

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और यूँ ही एक दिन एक कहानी कह दी गई...एक कहानी अधूरी मगर पूरी मगर अधूरी..। शब्दों के पार...जहाँ इंसान सुनाई पड़ते हैं उनकी बातें नहीं। हर आवाज़ कुछ कह रही होती है..कीबोर्ड के बटन...लगातार हिल रहे पैर के जोड़ के चटकने की आवाज़...दिखाई देती है जहाँ से एक हवाई दुनिया...और सुनाई पड़ते हैं वे लोग जो साँसों को थोडा हल्का करें ..जहाँ से कोई खींचकर ना ला सके उन हवाई ख़ाबों से..कि चींखना ना हो खुद को सुनाने के लिए..जहाँ 'हाँ' पर 'ना' की ना हार हो ना जीत..जहाँ अभिव्यक्ति कभी आख़िरी ना हो..जहाँ बचा रह जाए कुछ जानने-समझने को...जहाँ नहीं लिखी जाती कोई कविता..शिकारी और परिंदों के सनातन बैर से परे का आकाश...जहाँ से दीखती हो तारों भरी धरती..एक ऐसी ही दुनिया की कहानी...कि ये एक कहानी ही थी..जिसे सुना जाना चाहिए था।

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