इस ब्लॉग को जब 2010 में बनाया गया था तो मेरी उम्र 18 वर्ष थी , साहित्य से परिचय था पर एक आत्मीय रिश्ता बनना अभी बाकी था। खुद में सिमटे हुए से, बाहरी दुनिया से सहमे से लेकिन ऊर्जा से लबरेज़ वे कॉलेज के सुनहरे दिन थे। तब दोस्तियाँ आखिरी सांस तक निभाने के वादे थे , भविष्य के बड़े-बड़े रोडमैप थे, लगता था जीवन को पूरी तरह समझ चुके हैं बस अब इस रोडमैप पर चलना भर है। असाइनमेंट्स , प्रोजेक्ट्स , परीक्षाएँ, कक्षाएँ, कैंटीन, लाइब्रेरी, समोसा और चाय यही सब काफी हो जाया करता था। आज खुद अपनी उस मासूमियत पर प्यार आता है। पुरानी तस्वीरें देखकर उस भोलेपन को याद कर आँखें भर आती हैं। उन्हीं दिनों ज़िन्दगी की सबसे बड़ी नेमत को बहुत करीब से देखने का दौर शुरू हुआ... मैंने किसी को प्यार में पड़ते हुए देखा। उस उम्र में प्यार को जिस तरह समझा जाता है, ठीक वैसे ही समझा मैंने भी। प्यारा और खूबसूरत! लड़की के चेहरे पर नूर था कि दिनोंदिन बढ़ता ही जाता था और लड़के की वैचारिकी और भी पैनी और भावपूर्ण होती जाती थी। दोस्त छेड़ते थे , ये लजाते थे। दिन बीतते जा रहे थे और ये किताबों में फूल खिला रहे थे। किताबें ताउम्र अपनी पनाह में रख पाती तो अच्छा था। खैर इसका ज़िक्र फिर कभी.… तब इस ब्लॉग को बनाते हुए सोचा था यहाँ केवल साहित्य , समाज और राजनीति होगी , अपने व्यक्तिगत जीवन को यहाँ लेकर नहीं आना है। पाँच सालों में पता चला कि खुद के अनुभवों से अलग कुछ है ही नहीं ! पता नहीं हम जीवन से मृत्यु की तरफ बढ़ते हैं या मृत्यु से जीवन की तरफ। बस इतना तय है कि जहाँ अभी इस पल हैं , दुबारा वहाँ नहीं होंगे। कितनों को पुकारना था , कितनों के पुकारने पर लौट जाना था। इस गुज़रते समय का सच ये है कि खुद ही खुद के गले लगकर रात भर रोते हैं.…आज़ादी आज़ादी चिल्लाते हुए गला सूख जाता था अब इतनी दूर निकल आये हैं कि कुछ ऐसा बचा ही नहीं जो बाँधता हो। अब 2015 के अंत के करीब पहुँचकर लगता है नेमतों को दूर ही से सलाम कर नहीं समझा जा सकता....!
अपना कोना !
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