Friday, 16 October 2015

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बहुत दर्द होता है
दुःख नहीं कहा जा सकता इसे
ये दर्द ही है
थूक को बामुश्किल सटकते हुए
ऑंसुओं को घोटते हुए
समझना उस हर स्थिति को
जब नहीं रखा गया हमारा ख़्याल
जब सिखाया गया कि कितना ज़रूरी है ख़ुद की परवाह करना
तब क्यों नहीं बताया गया
कि इस क्रम में भी तुम बहुत बाद में हो
कि करनी पड़ती है कोशिश तुम्हे देखने के लिए
नायकत्व की कोई चाह कभी नहीं रही
एक बेहद साधारण सी ज़िन्दगी
जहाँ सिमोन को साथ लेकर
आलू और प्याज़ के बढ़ते दाम पर भी करना था गौर
पर ख़ुद अपनी कहानी में भी
हाशिये पर धकेल दिए जाने का दर्द
ख़ुद की कलम भी जब कहे कि तुम कौन?
सारे शब्द पहचानने से इनकार कर दें जिन्हें ख़ुद हमने चुना था
और अभी इस क्षण
हर एक हर्फ़ धुंधला है
कि कुछ है जो मिट नहीं सकता
कि कुछ है जो मिट जाएगा
कि जानते हुए भी सब कुछ मैं अनजान ही हूँ
अब क्यों लगता है कि क़त्ल की तैयारी है
और सबसे नर्म गर्दन पर ही चलेगी धार !

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