और यूँ ही एक दिन एक कहानी कह दी गई...एक कहानी अधूरी मगर पूरी मगर अधूरी..। शब्दों के पार...जहाँ इंसान सुनाई पड़ते हैं उनकी बातें नहीं। हर आवाज़ कुछ कह रही होती है..कीबोर्ड के बटन...लगातार हिल रहे पैर के जोड़ के चटकने की आवाज़...दिखाई देती है जहाँ से एक हवाई दुनिया...और सुनाई पड़ते हैं वे लोग जो साँसों को थोडा हल्का करें ..जहाँ से कोई खींचकर ना ला सके उन हवाई ख़ाबों से..कि चींखना ना हो खुद को सुनाने के लिए..जहाँ 'हाँ' पर 'ना' की ना हार हो ना जीत..जहाँ अभिव्यक्ति कभी आख़िरी ना हो..जहाँ बचा रह जाए कुछ जानने-समझने को...जहाँ नहीं लिखी जाती कोई कविता..शिकारी और परिंदों के सनातन बैर से परे का आकाश...जहाँ से दीखती हो तारों भरी धरती..एक ऐसी ही दुनिया की कहानी...कि ये एक कहानी ही थी..जिसे सुना जाना चाहिए था।
Saturday, 3 October 2015
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रास्ते
मैं जहां भी गई भागकर खुद से मेरे सपनों की किर्चें मेरे साथ गईं कहीं भी कभी भी चुभती हुई सी जैसे लंबा सफर तय करना हो पैदल और जूता पैर काटता ...
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खालीपन खुद के वज़ूद की तलाश जीवन की सार्थकता की तलाश कहाँ ले जायेगी? एक सुरंग जिसमें है अँधेरा और अंधापन जो संकरी है इतनी संकरी कि...
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मुट्की! टुनटुन कहीं की”, “इतना खाएगी तो टुनटुन हो जायेगी” ,मेरी एक दोस्त की दादी उसे अक्सर यही कहती हुई पायी जाती थी. टुनटुन नाम से मेरा ...
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“मुझे डर लगता है कि किसी दिन माँ और पिताजी मर जाएँगे”, “बड़ी-बड़ी लकड़ियों पर रखकर हम खुद उन्हें जलाएँगे लता...मुझे जलाना हो...
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