Tuesday, 24 March 2015

विश्वास

मानो अनगिनत सालों से
हम उदास थे
उदासी
जो पहाड़-सी
अड़ियल और स्थिर थी।

उदासी
जो शाम में झरते पत्तों-सी टूटती थी
उदासी
जो फिर भी टूटती नहीं थी
हँसी की तलाश में
निकलने ही नहीं देती थी।

कबूतरों के पंख-सी
नोंच ली गई ख़ुशी
जैसे कभी वापस नहीं आएगी!

और वापस आई भी नहीं,
पर कुछ तो है
जो लौट आया है
शायद विश्वास !

विश्वास
कि पंछी सभी
पिंजरों से बाहर होंगे।

विश्वास
कि सुख-दुःख जो भी हो
ज़िन्दगी को एक
कविता बना देंगे।

वे सारे पेंच ढीले पड़ जाएँगे
जो हमें कसे हुए हैं

उदासियों की ज़िद्द के आगे
लगातार
बार-बार
कमज़ोर पड़ती ख़ुशी को
विश्वास ने बचा लिया।

और अब विश्वास है
कि
सुंदर-सुंदर सब सँजो लेंगे
और
असुंदर को सजा
सुंदर कर लेंगे।

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