Friday, 8 May 2015

पहचान

कभी कुतरा
तो कभी जलाया
ईंधन भी मैं
चारा भी
इस पर भी जब
तुम मुस्कुराते हो
तो चमकते दाँतों
और क्रूर भावों के
पीछे की दंतवन भी मैं।

इतना-भर भी
काफी न हुआ
मैं 'विकास' में बाधा बना
बाधाओं को मार्ग से हटाना
फितरत है तुम्हारी
सो काटा मुझे।

बड़े फ्लाईओवर
फुटओवर ब्रिज
और जहाँ-तहाँ फैलते
बिजली के तारों के रास्ते में
एक मैं ही रुकावट था
सो हटाया मुझे।

सभ्यता के विकास की सीढ़ी
तुम चढ़ते जाना
आधुनिक होने का
भ्रम भी पालते रहना
अनास्थाओं में बह जाना
और सारे अर्थ खो देना
एक-दूसरे में बीमार साँसें फूंकना।

जीवन की आपा-धापी में
मैं तुम्हारी बालकनी में रखें
उन गमलों में स्थान पाने लगा
और अपने अस्तित्व को हर-पल
मिटते हुए देखने लगा
आइडेंटिटी क्राइसिस तो समझते हो न तुम
आधुनिक जो ठहरे!

संकट मैं ही हूँ
तो मार गिराओ मुझे
क्योंकि जीवन से बढ़कर भी कुछ है
कुछ वृहत्तर.....बड़ा..
श्रेष्ठ....महान...
जिसके लिए
जीवन दिया जा सकता है
आज़ादी !!!

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