Sunday, 5 July 2015

'मामूली' ज़ख्म

पाँव में लगा एक मामूली ज़ख्म
जिसके उपचार की ज़रुरत
कभी समझी ही नहीं गयी
उससे ख़ून का स्राव
नहीं दिखा कभी
तक़लीफ़ भी तो नहीं पहुँचाई थी उसने कभी
वो बस एक ज़ख्म था
एक मामूली ज़ख्म
समय ही उसका उपचार समझा गया
पर एक लम्बी अवधि बीत जाने पर
जब उसी ज़ख्म पर
नज़र आए कीड़ें
माँस के  लोथड़े पर रेंगतें
कीड़ें !
ज़ख्म में सुराख़ करते
देते जन्म
और लिए जाते जीवन
हर सुबह तक़लीफ़ का थोड़ा और बढ़ जाना
उपचार की हर तकनीक का विफल हो जाना
बढ़ती पीड़ा
बहता रक्त मिश्रित पीला पदार्थ
चाहना ऐसी कि मसलकर दूर कर दें
अपनी बेचैनी
हर रात नींद को पुकारना
और करना विनती
कि अब कभी नहीं खुलना
यह कोई दुःस्वप्न नहीं
कल्पना नहीं
कोई मनोरोग भी नहीं
यह नज़रंदाज़ करते जाने वाली
वह मासूम(?) अदा है हमारी
जो
किसी भी 'मामूली' ज़ख्म का
यही हश्र करेगी।   

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